Tuesday, December 30, 2014

जब हम रो पड़े थे यूँ ही अनायास ।

नव वर्ष मंगलमय हो !सरस्वती जोशी
दुआ
जब हम रो पड़े थे यूँ ही अनायास ।
तब सोचा नहीं था कौन खड़ा है पास ।
पर जब कई आँखों की नमी देख हमें होश आया ।
तो सच मन दुखी हुआ कि हमने इतनों को रुलाया ।
माफ़ करना हमें मित्रो ! हमारा यह करना सही नहीं था ।
हँसी दें न दें, पर गमों का वितरण तो करना ही नहीं था ।
हम निपट स्वार्थी हैं, सो कहेंगे ज़रूर जो बात मन में है आई ।
आप से आई करुणा की बूँदों ने हमें अजब तसल्ली है दिलाई ।
हम अकेले नहीं अबसे, कोई है अपना कह पायेंगे ।
गर आये कोई विपदा तो अवश्य पार कर जायेंगे ।
डूबने से पहले यदि हम फैलायेंगे हाथ ।
तो है विश्वास कुछ मित्र आ दे देंगे साथ ।
अगर हमने बेबस हो मदद को पुकारा ।
तो रहने न देंगे वे हमें निपट बेसहारा ।
कैसे करें अदा इस मित्रता का शुक्रिया !
आप के लिये होगी बस हमारी हर दुआ !
- सरस्वती जोशी

Monday, December 29, 2014

मेरी सासजी स्वर्गीया श्रीमती तुलसी देवी शास्त्री को सादर समर्पित -

मेरी सासजी स्वर्गीया श्रीमती तुलसी देवी शास्त्री को सादर समर्पित -
म्हैं तो सुणी रे ! म्हैं तो सुणी रे !
म्हैं तो सुणी रे थूँ तो मन को रे मोहन !
जो मेरो मनड़ो लुभा ले तो जाणूँ रे !
म्हैं तो सुणी रे थूँ तो घट-घट वासी !
जो मोरे घट बस जावे तो जाणूँ रे !
म्हैं तो सुणी रे थूँ तो तारण हारो !
जो म्हने तार बता दे तो जाणूँ रे !
म्हैं तो सुणी रे थूँ तो बड़ो रे केवटियो !
जो म्हने पार लगा दे तो जाणूँ रे !
म्हें तो सुणी रे थूँ तो लाज बचावै !
जो मेरी लाज बचा दे तो जाणूँ रे !
म्हैं तो सुणी रे थें तो गीता रचाई !
जो म्हने ज्ञान सिखा दे तो जाणूँ रे !
म्हैं तो सुणी रे थूँ तो दीनाँ को वत्सल !
जो मो सो दीन बता दे तो जाणूँ रे !
हे दीनानाथ ! थारा शरणा में आई हूँ !
जो मेरो हाथ पकड़ ले तो जाणूँ रे !
दरश की प्यासी कद से द्वार खड़ी हूँ !
जो मोंहे दरस दिखा दे तो जाणूँ रे !
हे करुणाकर ! कद से पुकारूँ रे !
जो म्हने परचो दिखा दे तो जाणूँ रे !
सरस्वती जोशी

हे मनमोहन !

हे मनमोहन ! थारा चरणाँ में आई हूँ,
गोविंद-माधव ! मोसे मुख मत मोड़ो रे !
टूटी-सी नाव मझधार में अड़ी है,
करुणाकर ! पतवार मत छोड़ो रे !
भव-सागर को गेहरो-गोहरो पाणी,
डूबे है नाव हरजी ! जल्दी से दौड़ो रे !
पकड़्यो है नाथ ! म्हैं तो थारो सहारो,
भगत-वछल ! पार कर दो नी बेड़ो रे !
हे रघुनंदन ! म्हैंतो दासी हूँ थारी,
दीनदयाल ! मोसे नातो मत तोड़ो रे !
सरस्वती जोशी

Tuesday, December 16, 2014

उनकी तस्वीर

उनकी तस्वीर
आज फिर मुस्कुराये उनकी तस्वीर में उन्हें पाने के लिये ।
आँसुओं ने बहने का तकाजा किया हमें रुलाने के लिये ।
हालाँके समंदर के खारे जल को पी पाना इतना सरल नहीं !
फिरभी हम पीने लगे उसे चुपचाप दर्द छिपाने के लिये ।
कुछ पल को मधुर स्मृतियों में डूब जाने के लिये ।
खुद हँस कर उन्हें फिर अपने साथ हँसाने के लिये ।
लेकिन विफल हो गये हम, बूँदें टपकने ही लगीं तस्वीर पर !
उन्हें पोंछने के प्रयास में सुखाते रहे अपने अंतर में भरा समंदर !
- सरस्वती जोशी

Sunday, December 14, 2014

शब्द बाण

शब्द बाण
कभी-कभी कुछ लोगों के,
शब्द बाण चुभ जाते हैं ।
चीर हमारे सीने को,
रक्त-धार बहाते हैं ।
रोक न पाते हैं निज को तो,
शब्दों का जाल बनाते हैं ।
कुछ अच्छी-सी मीठी बातो से,
उन घावों को सहलाते हैं ।
फिरसे वार न कर दे जगती,
यह सोच-सोच डर जाते हैं ।
इसीलिये मुस्कानों से भर,
मृदु-मधुर शब्द सुनाते हैं ।
भर शालीनता की रस धार,
वाणी का पाठ पढ़ाते हैं ।
शायद खुद को ही बहलाने को,
हम रिसता दर्द छिपाते हैं ।
उर की पीड़ा के दंशन से,
जब व्याकुल से हो जाते हैं ।
तो केंद्रित कर अपने मन को,
विष अमृत सम पी जाते हैं ।
कब तक सहें यह भार भला
जब घावों की पहल जगती से आई ।
हमने तो मूक शालीन भाव से,
केवल मन की बात बताई ।

Saturday, December 13, 2014

जीवन के रंग

जीवन के रंग
विश्व के चित्रपट पर देखते हैं,
नित्य इस जीवन को ।
जो लगता है चलचित्र सा ।
देता है आभास जैसे,
हो किस्सा किसी और का ।
अनजान से राहगीर का ।
जिसको नहीं हम जानते ।
अपना नहीं हम मानते ।
न वैसी लगती उसकी कथा ।
जिसकी थी हमें अपेक्षा ।
सहसा नेत्रपट खुल जाते हैं ।
उसके अनगिन पात्रों के बीच,
कहीं ख़ुद को ही खड़ा पाते हैं !
वेदना से भर कर,
कुछ सहम से जाते हैं !
फिर उसमें दिखते हुए,
किसी भग्न हृदय मानव पर,
हँस नहीं हम पाते हैं !
उस चल चित्र में जीवन के,
विभिन्न रंग दिख जाते हैं ।
हर रंग का कोई निशाँ,
हम अपने वसनों पर पाते हैं !
इन रंगों के भ्रमरजाल में,
कुछ ऐसे खो जाते हैं ।
के अपने-पराए का भान भूल,
सब रंगों में समा जाते हैं ।
ऐसे ही फँस कर भ्रमित हो,
संपूर्ण जीवन बिताते हैं ।
जग कर्ता की इस माया को,
समझ नहीं हम पाते हैं !
गर कभी भाग्य चमक उठता,
औ ज्ञान प्रकाश को पाते है ।
जाने क्यों कर अवहेलना,
हो मौन कहीं सो जाते हैं ।
जब जगते हैं तो होता है,
अपनी भूलों का आभास ।
पुन: एक मौका पाने का,
करने लगते हैं प्रयास ।
पर भूल-सुधार का मौका,
सबको नहीं मिल पाता है ।
और यूँ ही पछताता मानव,
छोड़ जगत को जाता है ।
पुन: प्रकट होने की आस में ।
अगली बार सतर्क रहने के,
मन में बँधे विश्वास में ।
पर "अगली बार" कब होगी ?
होगी भी या नहीं होगी ?
कोई नहीं है जानता ।
फिरभी मानव जाने क्यों,
सत्य को पहचान कर भी,
उन सत्यों से दूर भागता !
अंत:करण की आवाज़ तक को,
सुनकर भी नहीं मानता ।
- सरस्वती जोशी

Monday, December 8, 2014

असफल प्रणय के बंधन (हर पीड़िता नारी को)

असफल प्रणय के बंधन (हर पीड़िता नारी को)
परंपरा के आदर से, या आधुनिकता के जोश से,
जाने या अनजाने से, या किसी दबाव से या रोष से,
ग़रीब मांं-बाप के पास हुई पैसों की कमी से,
या उनकी आँखों से बिखरी नमी से,
जाने कितने कारण हैं, जिनके घेरे में फँस गये ।
कुछ ऐसे प्रभावित से हुए, ग्रह चक्कर में धँस गये ।
ऐसे बंधन में बँध गये गये जो तकदीर को भाये नहीं ।
किसी तरह जाल से निकले मगर पूरे निकल पाये नहीं ।
काले साये स्मृतियों के मन पर ऐसे असर करने लगे ।
हँसने के सारे द्वार मानो सहसा ही बंद से दिखने लगे ।
असफल प्रणय के बंधन टूटे पर ऐसी छापें छोड़ गये ।
के बाकी जीवन के हर सपने की सारी उमंगें तोड़ गये ।
माना के यह सच है अक्सर प्राणी संग ऐसा ही होता है ।
पर क्या जीवन का यही मूल्य ? क्या यह इतना सस्ता होता है !
किसी एक के प्यार में बँध कर इतने गुलाम हो गये,
कि जीवन भर केलिये प्यार के शब्द ही बदनाम हो गये ?
अब आगे किसी का कैसा भी सरल स्नेह हो !
उर में कही भरा करुणा का मेह हो ।
उसे अपनी ओर आते देख कर ही डरते हो !
क्या अभी भी तुम उस अन्यायी पे मरते हो ?
गर नहीं तो क्रोध क्यों स्नेह के खिलाफ ?
किसी का क्रोध किसी पर यह भला क्या बात !
गर किसी एक ने किया कभी था छल ।
तो क्या तोड़ लोगे अपना ही मनोबल ?
भूलना अतीत को होता नहीं सरल !
पर खोओ वर्तमान को क्या यह इसी काबिल ?
जो नहीं तो सर पर यह काली सी चादर किस लिये ?
किसके लिये ? किस संताप में ? क्यों ? किसकी आस में ?
ये मनोबल को गिराने वाले साधन-प्रसाधन किस लिये ?
जो डिज़र्व नहीं करते उनके लिये ? उनके डर से ?
या उर में उठते आक्रोष के निर्झर से ?
यह उदासी की ओर जाती राह क्यों ?
यह दीन बन याचना में बढ़ी बाँह क्यों ?
उठो ! तुम किसी की माँ हो, बेटी हो, बहन हो, सखी हो !
कितना कुछ पास है उसे क्यों खो रही हो ?
- सरस्वती जोशी

वे चुभते शूल

वे चुभते शूल
उन पथ के काँटों को,
या उन्हें बिछानेवालों को धन्यवाद कैसे बोलें ?
उन शूलों को "अनायास ही आई बाधा" कर-कर के कैसे तोलें ?
है मालूम हमें के उनको सोच-सोच बिछाया था ।
पग-पग पर इसी तरह से यह मार्ग अगम्य बनाया था ।
उन्हें पार करने में आँचल आँसू से भर-भर आया था ।
पग-पग पर गिरते अश्रु देख, मुक्त कंठ से उपहास उड़ाया था ।
हमें रोकने का एक सबल, दृढ़ स्वप्न भी सजाया था ।
बेबस से होकर मदद हेतु यह हाथ भी बढ़ाया था ।
पर हमने अपने को उस पल में निपट असहाय ही पाया था ।
औ कर साहस आगे बढ़े तो कदम भी लड़खड़ाया था ।
माना के आज उन्हीं काँटों से, कंटक पर चलना सीख लिया।
शक्ति जुटाने की ट्रेनिंग पा, मार्ग बनाना सीख लिया ।
पर उनसे उभरे घावों का उपचार कहीं ना मिल पाया ।
उस पीड़ा को हर पाये ऐसा वैद्य नज़र नहीं आया ।
फिरभी उन चुभते शूलों को सादर शीश झुकाते हैं ।
उनसे रिसता दर्द सदा ही इन रचनाओं में पाते हैं ।
- सरस्वती जोशी

मोह का भ्रम-जाल

मोह का भ्रम-जाल
जब वे आये थे जीवन में, तो उनके प्रथम दर्शन ने ही,
कुछ ऐसा अहसास दिया के हमें अपना, अपने,
अपनी मंजिल, सब कुछ उन्हीं में दिखने लगा । 
जग औ जग को मान मिथ्या, अनासक्त बन जीने का,
हर बार, हर उपदेश हमको फीका सा लगने लगा ।
मान अपने जप-तप का फल, हम उनमें ही डूब गये ।
दिन महीने बरस कितने बस ऐसे ही बीत गये ।
भूल कर हर सत्य जगत का सब सपने उनसे जोड़ दिये ।
अपने हँसने के सब बहाने बस उनकी दिशा मे मोड़ दिये ।
उनमें ही रब दिखने लगा, बाकी सब अरमाँ छोड़ दिये ।
रिश्तों के उस मोह-जाल में प्रभु से भी नाते तोड़ लिये ।
भूले क्षणभंगुर जीवन की बातें, उनने कुछ ऐसा प्यार दिया ।
जग के मोह में भ्रमित हुआ मन, हर अरमाँ उन पर वार दिया ।
पर धीरे-धीरे, जैसे-जैसे रिश्तों की परतें खुलती रहीं ।
सत्य का प्रकाश बिखरा मन में, आशा की धूनी जलती रही ।
हर परत को खुलते देख, पीड़ा की कसक जब हुई।
प्रश्नों का इक जाली सी आ-आ सामने बिछती रही ।
मानते हैं हमें इसका अहसास होना चाहिये था ।
बन कर के दूरदर्शी, सजग रहना चाहिये था ।
हम मोह-जाल में फँसे-फँसे शोषित होते ही रहे ।
माना हमारी मूर्खता थी, हम अपना सब खोते ही रहे ।
आया अचानक होश जब औ नींद से आँखें खुलीं ।
परोपकारिता, दया-धरम के उदेश खोखले से लगे ।
किस पर भरोसा करें किस पर नहीं ? ये प्रश्न उठने से लगे ।
हर खुलता परत, नया अनुभव ले, स्पष्ट सामने आ-आ कर,
नये सिरे से खोल रहा था नई जड़ता की कहानी ।
चकित उदास विकल हृदय से, आँसू से घावों को धोकर,
अबसे बुद्धू ना बन, कुछ साँसें निज हेतु ही जीने की हमने ठानी ।
हालाँ के संकल्प लिया था हमने, पर सत्य तो कुछ और है ।
निभा नहीं पाये हम उसको, संकल्प टूटता ही रहा ।
फिर कोई नई आस, मिथ्यापन होने पर भी ज्ञात,
हावी सी होती रही औ निज हेतु जीने का वादा पीछे छूटता ही रहा ।
बस अरमानों को पूरा करने को, उनमें ही लीन होते गये ।
अपने लिये सोचे क्षण सारे आगे सरकते ही गये ।
हर वर्तमान के अमूल्य क्षण औरों को देते ही गये ।
पड़ भ्रम में कभी भाई, कभी बहन, कभी बेटा, कभी बेटी,
कभी कुछ और नाम आ-आ कर के सूची में जुड़ते ही गये ।
सब कुछ दूरी तक के हमसफर ! दूर होते ही गये ।
और जब आँखें खुलीं तो निपट तन्हा रह गये ।
घिर आई है शाम औ दूर बहुत है अभी किनारा ।
सुध तो आ गई तारक की, हमने उसे है पुकारा ।
पर पूछ रहा है आज हमसे बार- बार हृदय हमारा :
"क्या उसको बुद्धू समझा है, क्या वह आ देगा सहारा ?"
- सरस्वती जोशी

जीवन के सत्य का अहसास

जीवन के सत्य का अहसास
हर जाती साँस के साथ,
हर अधूरी आस के साथ,
जीवन के सत्य का,
होता जाता है अहसास ।
घटता जाता है जिंदगी का दायरा ।
अनपढ़ हो या हो विद्वान ।
उसे हो जाता है इसका ज्ञान ।
फिर भी उसके मन में रह जाती,
इक अनबुझी सी प्यास ।
कभी कुछ और पाने की कामना,
कभी कुछ खो जाने का भय ।
आँखों में भरा समंदर,
जीता है मन में ले कर संशय ।
हर पग पर माँगता जगत से मुक्ति ।
फिर भी जीने की साध में लगाता,
कर-कर संचय सारी शक्ति ।
विचित्र सी विडंबना है ।
फिर भी उसको जीना है ।
सब संत मार्ग बताते हैं ।
जग मिथ्या समझाते हैं ।
हर प्राणी मन में जानता है ।
फिर भी न इसको मानता है ।
काश प्रभु न बुनते यह माया-जाल ।
तो सत्य को समझ कर मानव,
बदल पाता अपना कुछ हाल ।
- सरस्वती जोशी

Sunday, November 30, 2014

मित्रों का आभार

मित्रों का आभार 
मेरे मित्रो ! आप सबने जाने या अनजाने में,
पता नहीं पर कितने तन्हाई के क्षणों को आबाद किया।
कितने अश्रु भरे उदास पलों को अपनी हँसी से भर दिया ।
इन स्नेह सिक्त माधुर्य भरे हर क्षण का यह सुंदर उपहार ।
जो अविरत देते रहना सबने किया हँस-हँस सहर्ष स्वीकार ।
इसमें जो अपनत्व भरा उसमें कुछ ऐसी हमदर्दी है घुली ।
इस मानस पर छाती निराशा औ गिरते मनोबल को,
अपना मान हाथ पकड़ने से शक्ति अलौकिक है मिली ।
इन अमूल्य स्नेह कणों का मानूँगी सदा आभार ।
अपने अंतर मन से भेजूँगी दुआएँ अनेक बार-बार !
- सरस्वती जोशी

Friday, November 28, 2014

क्यों आते वे िदन िफर याद ?

क्यों आते वे िदन िफर याद ?
क्यों आते वे िदन िफर याद ?
कहते सब: "बीती बातों को भूलो, मत वह बात करो ! "
जो कुछ पाया है मधुमय, बस उसको तोलो माप करो..." 
िफर इस मधुमय रस के भीतर, लगता क्यों कुछ कड़वा स्वाद ! ...
सुनते हैं : "है प्यार भरा, यह रसमय सारा ही संसार ।
जीवन है हँस-हँस जीने को, करते जाअो सब को प्यार ।"
हँसते-हँसते ही आ जाता, क्यों िफर नयनों में यह खार ! ...
सुनते जब उपदेश िकसीके, सीने में क्यों उठता ज्वार ?
क्यों इस मन का कोई कोना, व्याकुल हो करता चीत्कार ?
क्यों मन करता कोई सुन ले, कभी बैठ कर मन की बात ? ...
क्यों दे कोई भला िकसीको, अपनी मुस्कानों के कुछ क्षण ?
िफर भी जाने-अनजाने में, यही चाहता है पागल मन ।
कहीं िमले कोई अपना जो, दे दे कुछ क्षण की सौगात ! ...
िकतना चाहें अब न करें हम, कभी कहीं दुखड़े की बात ।
झोली भर मुस्कानों की हम, खुिशयों की कर दें बरसात ।
पर िनर्धन के बस में है क्या, दे दे मुस्कानों का मोल ?
कैसे चुकाए, कैसे पाए, कौन सुने उसकी फरियाद ?...
क्यों आते वे िदन िफर याद ?
- सरस्वती जोशी

Friday, November 14, 2014

प्रात:कालीन पूजन

प्रात:कालीन पूजन
बहुत देखते हैं हम हर रोज़ सुबह आते हुए संदेश ।
कितने रसों का भरा होता है इनमें समावेश ।
कितने ही विविध विचार, कितने सारे समाचार । 
कितनी कविताएँ, कितने गाने, कभी नये, कभी पुराने ।
कितने हँसी के गुंजन । कितने शोक भरे क्रंदन ।
वृद्धों का हर लेते एकाकीपन । युवकों का करते मनोरंजन ।
नीति धर्म की लिख हर शिक्षा, देते हैं ये अद्भुत दीक्षा ।
किंतु न जाने क्यों कुछ ऐसा है जिसे मैं ढूँढती हूँ बार-बार ।
लेकिन वह मुझे दिखता है बस केवल कभी-कभार ।
आज सुबह ही पढ़ने में आया : "सब चिंताओं से मुँह मोड़,
सारी झंझटबाजी छोड़, हर टेंशन से नाता तोड़ ।
बस हरि की तुम करो साधना, हो जाएगा सच हर सपना ।..."
सच में मन को बहुत ही भाया, हाथ जोड़ कर शीश नमाया ।
सोचा : बच्चों को भी पढ़वाऊँ, यह सुंदर संदेश सुनाऊँ ।
पर कर न मैं ऐसा पाई, लगा : अभी न इसकी उमर आई ।
यह समय है भावी-निर्माण का, पुस्तकों में बसे ज्ञान का ।
बस वही इनका भगवान है, इसमें ही इनका कल्याण है ।
अब न बीसवीं सदी रही, कि काम मिल जायगा कहीं न कहीं ।
अंकों का हर प्रतिशत ही है अभी तो इनकी हर माला ।
गणित का हर सवाल ही है इनकी तो बस कर माला ।
उसी में बसा इनका भगवान । अच्छे अंक ही गीता का ज्ञान ।
सोचते समय मन में हुआ कुछ कंपन ।
फौरन प्रभु के आगे था किया नमन ।
गीता की पुस्तक भी उठाई । बार-बार सर से लगाई ।
मन ही मन की क्षमा याचना । भय वश की कुछ अजब कल्पना ।
पर जो उर में बात उठी उसको मिटा नहीं पाई ।
क्योंकि मन कहता यही रहा : "यही इस युग की सच्चाई ।"
छोड़ गीता व मास-पारायण, लिया हाथ में इंगलिश व्याकरण ।
छोड़ सुबह का सब पूजन, बच्चों को करवाने लगी रिवीज़न ।
कुछ मन में खटका भी आया । कुछ मन भारी सा हो आया ।
पर लगा कि मेरे मेडिटेशन का समय अभी तक नहीं है आया ।
अनायास कुछ गया मिल । मन मेरा सहसा गया खिल ।
लगा मानो पूरे हो गये मेरे सभी माला औ जप ।
जैसे मेरे लिये यही वह मार्ग कहते जिसे हैं सब तप ।
बच्चों से जिसका पाठ कराया । माँ शारदा का ध्यान धराया ।
हर शब्द जो मैंने पढ़ाया । उसमें ओम नज़र आया ।
गायत्री का था गुंजन । सरस्वती का था वंदन ।
अजब शांति का आभास था । चारों ओर प्रकाश था ।
बहुत शांत था मेरा मन । मानो कर लिया पूजन ।
पूर्ण हो गया जैसे पारायण । मिल गये मानो मेरे मन-मोहन ।
- सरस्वती जोशी

कुछ प्रश्न (उस प्रभु से)

कुछ प्रश्न (उस प्रभु से)
हे प्रभु ! तुझे मन से अपना मानने पर भी,
न जाने क्यों कुछ प्रश्न मुझको सताते हैं बार-बार ?
अपनी करुणा का दान देने से पहले,
मुझे इस कदर झुकाना क्यों ज़रूरी था बार-बार ?
कुछ कण मुस्कुराहट के देने से पहले,
मुझे इस कदर रुलाना क्यों ज़रूरी था बार-बार ?
अपना वरद हस्त मेरी ओर बढ़ाने से पहले,
मुझे इस कदर तरसाना क्यों ज़रूरी था बार-बार ?
अपनी मुरली का मधुर संगीत सुनाने से पहले,
मेरा विरह राग गाना क्यों ज़रूरी था बार-बार ?
- सरस्वती जोशी

दूध को रोता बालक

दूध को रोता बालक
"दूध-दूध !" कह रोता बालक, माँ के आँचल में चिल्लाया ।
धरती तो धरती, अंबर तक उसके क्रंदन से थर्राया ।
विद्युत का वज्र कठोर हिया, इक पल करुणा से भर आया ।
पर मानव को मानव-सुत की, इस दीन दशा का होश न आया ।
हे शिव शंकर ! बस यह बतला यह कैसी तेरी माया ?
तूने भेज जगत में उसको, कैसा प्रभुवर खेल रचाया ?
- सरस्वती जोशी

Thursday, November 13, 2014

कुछ प्रश्न (उस प्रभु से)

कुछ प्रश्न (उस प्रभु से)
हे प्रभु ! तुझे मन से अपना मानने पर भी,
न जाने क्यों कुछ प्रश्न मुझको सताते हैं बार-बार ?
अपनी करुणा का दान देने से पहले,
मुझे इस कदर झुकाना क्यों ज़रूरी था बार-बार ?
कुछ कण मुस्कुराहट के देने से पहले,
मुझे इस कदर रुलाना क्यों ज़रूरी था बार-बार ?
अपना वरद हस्त मेरी ओर बढ़ाने से पहले,
मुझे इस कदर तरसाना क्यों ज़रूरी था बार-बार ?
अपनी मुरली का मधुर संगीत सुनाने से पहले,
मेरा विरह राग गाना क्यों ज़रूरी था बार-बार ?
- सरस्वती जोशी

Tuesday, November 11, 2014

ये खोये लम्हे

ये खोये लम्हे
जिंदगी के जो पहलू पुस्तकें सिखा सकती थीं ।
जिस दिशा में हाथ पकड़ हमको ले जा सकती थीं ।
हम उनके ज्ञान भरे शब्दों को पूरा सुन पाये नहीं ।
उनमें भरे संगीत स्वर ख़ुश हो गुनगुनाये नहीं ।
जग के इंद्र धनुषी जालों को पूरा समझ पाये नहीं ।
वक्त पर उनके बंधन से बाहर निकल पाये नहीं ।
आज जब ये जाल सारे हैं स्वत: ही टूट गये ।
वे सारे आकर्षक बंधन हैं कहीं पीछे छूट गये ।
जीवन के कटु सत्य सामने आ खड़े बन कर विशाल ।
तो हर बीता पल खड़ा सामने लिये हुए प्रश्नों के जाल ।
अतीत की हर शिक्षा जिसे हमने नगण्य था माना ।
उसका हर महत्व प्रकट हो प्रश्न पूछता मनमाना ।
अब तो सब कुछ समझ चुके हैं, चाहें : सपने हों साकार ।
पर जो खोया उसको पा लें फिर से यह आशा तो है बेकार ।
जो खाई हम बना चुके अब उसको तो भर नहीं सकते ।
जो कमी रख दी जीवन में उसको पूरा कर नहीं सकते ।
खीज आती है खुद पर ही मानव जीवन खो देने पर ।
सुरभित गुलाब की जगह यहाँ केवल काँटे बो लेने पर ।
अतीत की हर क्षिक्षा आ कर खड़ी सामने कुछ पूछ रही ।
पर कैसे कुछ बोलें अब उससे है उसकी हर बात सही ।
जो बीत गया वह तो हमको वापस कभी न मिल पायेगा ।
यह जीवन तो अब ऐसे ही यूँ पछताने में ही जाएगा ।
गर प्रभु फिरसे देख दया दे देगा हमको मानव का तन ।
तो शायद अगले जनम में कर पाएँ कुछ ऐसा साधन ।
के मानव-जीवन यह हमारा सफल जीवन कहलाए ।
ऐसी स्मृतियाँ कुछ छोड़ सकें जो लोगों को याद आएँ ।
मोक्ष क्या है नहीं जानते लेकिन यह सदा से हैं सुनते ।
जो जीवन में कुछ कर जाते वे मर कर भी नहीं मरते ।
हे प्रभु ! तुम से विनय यही : इतनी करुणा तुम कर देना ।
थोड़ा कुछ जग में कर पायें, बस एक जनम फिर दे देना ।
- सरस्वती जोशी

Sunday, November 2, 2014

माँ के समान हितैषी नहीं, माँ के समान गुरु नहीं !

माँ के समान हितैषी नहीं, माँ के समान गुरु नहीं ! 
एक बहुत धनवान, धर्मात्मा, सर्वगुण संपन्न व्यक्ति था । उसकी वृद्ध माँ उसके साथ रहती थी । वह अपनी माँ का बहुत ध्यान रखता था । माँ की हर ज़रूरत पूरी करता, लोग उसकी बहुत सराहना करते थे । एक दिन उसकी माँ को यह आभास हुआ कि बेटे को कुछ गर्व होने लगा है तो माँ ने कहा : "बेटे! क्या तुम्हें मालूम है कि तुम्हारे जीवन की इस अद्वितीय सफलता का रहस्य क्या है ? तुम्हारे पिता एक महात्मा थे । जब मैं गर्भवती हुई तो पूरे दिन होने पर उन्होंने मुझको बताया कि यदि अमुक दिन, अमुक समय पर बालक हुआ तो वह बहुत भाग्यशाली होगा । लेकिन उनके बताए समय से कुछ समय पहले ही मेरे प्रसव पीड़ा प्रारंभ हो गई । मुझे पता चला कि यदि इन कुछ घंटों में बालक हो गया तो वह मंद-बुद्धि व मंद-भागी होगा । तो मैंने दाई को बुला कर कहा : "तुम मुझे पैर ऊपर करके उल्टा लटका दो, कुछ भी हो जाए, मुझे कितनी भी पीड़ा सहनी पड़े, पर अमुक समय से पहले मेरे बच्चा नहीं होना चाहिये ।" दाई मेरे कहने के अनुसार करती रही और मैं प्रसव पीड़ा सहती हुई शुभ समय की प्रतीक्षा करती रही । धीरे-धीरे शुभ घड़ी आई और शुभ ग्रहों में तुम्हारा आगमन हुआ । बेटे ! मैंने तुम्हारे कल्याण हेतु जो पीड़ा सही तुम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते सो यदि तुम मेरे साथ यह सदव्यवहार मेरा रिण चुकाने की मंशा से कर रहे हो तो वह रिण तुम कभी नहीं चुका पाओगे । यदि तुम मेरे लिये जो कुछ भी कर रहे हो वह मेरे प्रति स्नेह के वशीभूत हो कर कर रहे हो तो मैं तुम्हारे इस स्नेह की सदा रिणी रहूँगी और मुझे सदा तुम पर गर्व होगा, पर यह मत भूलना कि संसार का कोई भी पुत्र माँ का रिण नहीं चुका सकता ।" माँ की बात सुन कर बेटा बोला : "माँ ! तुझे कैसे पता चला कि मेरे मन में सचमुच गर्व का बीजारोपण होने लगा था ? सच ही कहा है कि माँ के समान कोई हितैषी नहीं, माँ के समान कोई गुरु नहीं !
- सरस्वती जोशी

Thursday, October 30, 2014

जीवन पथ के विभिन्न आयाम,

जीवन पथ के विभिन्न आयाम,
हमें याद आते हैं !
वे हमें याद आते हैं !
आते चले जाते हैं ।
अतीत के पल फिर से आ कर, 
स्मृतियों में स्थिर हो जाते हैं ।
और आज भी हम उनको,
कभी हँस कर जी पाते हैं ।
कभी पलकों में भर उनको,
चुप-चुप ही पी जाते हैं !
और जीवन के बदलते से रंगों में,
जाने कहाँ खो जाते हैं !
कभी कभी कुछ कहते हैं :
अतीत के पल अतीत हो जाते हैं ।
लेकिन वे फिर अनायास ही,
स्मृतियों में लौट आते हैं ।
अपना महत्व जताने को ।
कभी रोतों को हँसाने को ।
कभी हँसतों को रुलाने को ।
कभी निराशा में डुबाने को ।
कभी सोई आस जगाने को ।
मन करता उनसे दूर रहें ।
क्यों बीती यातना फिर से सहें ?
पर वे हावी से हो जाते हैं,
अपना प्रभाव दिखाने को ।
प्राणी को अतीत से जोड़,
फिर पीछे ले जाने को ।
या फिर उसे उत्साह दिला,
कुछ आगे को बढ़ाने को ।
उर की सुप्त चेतना को,
झकझोर कर जगाने को ।
अपनी विचित्र माया से,
मन को भ्रमित बनाने को ।
भूत और वर्तमान में,
एक कड़ी बन जाने को ।
शायद इसीलिये उसको,
भूत की संज्ञा देते हैं ।
प्रयत्न कर कर के ख़ुद को,
दूर बनाये रहते हैं ।
- सरस्वती जोशी

काश हर होनेवाला अहसास,

काश हर होनेवाला अहसास,
अहसास न रह सत्य बन जाए !
जिसके लिये हम तड़पते हैं,
वह और कुछ नहीं तो सपने में आ जाए ।
कुछ पल जीवन के मुस्कुराते गुजर जाएँ ।
कुछ स्वप्न हकीकत में बदल जाएँ ।
सुनते हैं वे गोपियों के सपनों में आते थे ।
राधा के आँसू दुपट्टें से पोंछ जाते थे ।
काश कभी हमारे आँसू भी दिख जाएँ ।
करुणा के कुछ कण इधर भी बिखर जाएँ !
तो जगती में आना अपना सफल हो जाए ।
इस मन के अरमान अधूरे न जाएँ ।
पर हर सपना कभी साकार नहीं होता ।
हर अधूरा अरमाँ आकार नहीं लेता ।
जानते हैं हम और खुद को समझाते हैं ।
लेकिन वही भ्रम बार-बार उभर आते हैं ।
जाने क्यों जगती की यह विचित्र रीत है ।
हारती सदा से आई हर "प्रीत" है ।
- सरस्वती जोशी

Friday, October 17, 2014

क्या सारे गमों को जगती लिख पाती है ?

क्या सारे गमों को जगती लिख पाती है ? 
क्या दीवारें परदुख समझ पाती हैं? 
मैंने सुना : वे रोती नहीं, तत्काल ही औरों को सुनाती हैं ।
परदुख को परिहस की सामग्री बनाती हैं ।
उन हासों-परिहासों से नींद और जल्दी जग जाती है । 
उर को और अधिक विचलित सा कर जाती है ।
बस फिर आँखें नींद से दूर जा आँसू बहाती हैं ।
दीवारों की कठोरता पर चकित सी हो जाती हैं ।
और अपने भोलेपन पर मन ही मन पछताती हैं ।
- सरस्वती जोशी

Saturday, October 11, 2014

एक कवि का जीवन

एक कवि का जीवन 
तुम बसोगे घर-घर के नित्य के इतिहास में । 
हर घर के हर सदस्य के हर अश्रु में हर हास में । 
चाहे तुमने बन केशव-सूर उनसे ऊँचे पद ना पाये । 
चाहे बना दूत मेघों को प्रेम संदेशे ना भिजवाए । 
सीता के संग बैठ कुटी में लव-कुश के संग खेल न पाए ।
पर तुमने हर टूटी छत के नीचे जा-जा उसके दर्द बँटाए ।
लेखनी है तुम्हारी जिस पीड़ा का अनुभव कर रही ।
वह केवल गीतों का विषय नहीं, वही जीवन का सत्य सही !
- सरस्वती जोशी

Wednesday, October 8, 2014

प्रेम की याचना

प्रेम की याचना 
क्यों माँगें हम याचक बन-बन हर समय प्रेम की भीख ? 
क्या वेदना की तड़प से नहीं पाये हम कुछ सीख ? 
क्यों न रँगलें चुनर अपनी हम स्वयं खुद के लिये ? 
क्यें न हम ख़ुद ही जलालें अंत:पुर में कुछ ऐसे दिये ?
कि फिर न तरसे उर हमारा यूँ किसी के भी लिये !
क्यों करें यह पराधीनता इस तरह झुक कर स्वीकार ?
कि कर सके कोई हमारा इस तरह इतना प्रतिकार !
क्या जीवन नाम इसी का है, करते रहें अपना समर्पण ?
और बदले में मिले पग-पग पर विरह की ज्वलित तपन !
नहीं ! अब और नहीं ! यह एक तरफ का अविरत अर्पण !
एक तरफा मिलते सदा से ये निरंतर थोपे बंधन !
हम मुक्त हो कर साँस लेंगे इक स्वच्छ नीले से गगन में ।
अब नहीं यूँ हम धरेंगे शीश झुक-झुक कर चरण में ।
माना वे उन्नत शिखर से, विशाल नील अंबर से हैं ।
पर हम भी धरा से धैर्यवान, गंभीर विस्तृत सागर से हैं ।
अब न हम यूँ याचना कर-कर झोली को फैलाएँगे ।
गर पड़े चलना अकेले तो वह भी हम सीख जाएँगे ।
शक्ति कहलाते आये हैं क्यों भूलें यूँ अात्म-सम्मान ?
क्यों पग-पग पर भुगतें भला यह अवहेलना भरा अपमान ?
सरस्वती जोशी

Monday, October 6, 2014

जिनकी मैं सदा रिणी रहूँगी -

प्रोफेसर श्रीमती कैथरीन तोमा को सस्नेह,
जिनकी मैं सदा रिणी रहूँगी -
कुछ मित्र मिले ऐसे मिले जीवन में,
दे दिया कुछ यूँ सहारा ।
डूबती सी नाव को भी,
मिल गया अपना किनारा ।
उनको यह मालूम नहीं,
कर दिया कितना उपकार ।
केवल करुणा के वश होकर ही,
लगा दिया नैया को पार ।
उनके रिण से दबा है कोई,
यह भी ज्ञात नहीं उनको ।
केवल कुछ पल साथ रहे बस,
फिर ना मिले कभी हमको ।
जाने कौन राह पकड़ी फिर,
यह तक हमको नहीं पता।
दूर-दूर से भेजेंगे पर,
उन्हें दुआ अपनी सदा ।
-सरस्वती जोशी

समय उर का सहज सलिल छीन,

समय उर का सहज सलिल छीन, 
खारे अश्रु दे गया । 
वह चिंता मुक्त शांत से पल,
सारे चुन कर ले गया ।
जीवन का यथार्थ देख,
मन हमारा डोल गया ।
ज़िंदगी के सभी रिश्तों की,
परतें वह खोल गया ।
जीवन के हर पल का मोल,
एक पल में बोल गया ।
मिला हमे निज के अंतर से,
बता गया सत्य वह कितना !
औ समझ में आया यह जग,
है कितना विचित्र सपना !
सब में जहाँ वही ईश्वर,
है सबसे हमें जुड़ना ।
किंतु सच में न कोई अपना ।
सबसे हमें होगा बिछुड़ना !
- सरस्वती जोशी

Friday, September 26, 2014

हम उत्साह दिला-दिला देखते गये ।

* हम उत्साह दिला-दिला देखते गये । 
वह हँस-हँस के आगे लिखते गये । 
भूखे पेट, पानी पी-पी कर भी,
हमको साहित्य रच हँसाते गये । 
वाह-वाह के नशे में डूब,
अपने होश गँवाते गये ।
बीबी की बुड़बुड़ हुई,
बच्चे ने गुहार लगाई ।
पर यह आवाज़ें उसको,
इक पल भी रोक न पाईं ।
कर अनसुना, गैरों के दुखों को अपना बना,
कर-कर के वर्णन बताते रहे ।
कभी आलनी की भाजी औ मक्की की रोटी,
कभी राब पी कर घर चलाते रहे ।
जनता को इससे मतलब नहीं था,
वह कविता से सब को हँसाते रहे ।
सब सुन-सुन के ताली बजाते रहे ।
उन्हें तान पर सब चढ़ाते रहे ।
घरवाले आँसू बहाते रहे ।
निकम्मा मान ताने सुनाते रहे ।
कविताओं पे कविताएँ आती रहीं ।
पर एक दिन अचानक कुछ होश आया !
बेटे का फटा कुर्ता नज़र आया,
तो शरमा गये ख़ुद पर ही रोष आया ।
पैबंदों से भरी थी पत्नी की साड़ी !
नही ! नहीं चल सकती यूँ मेरे घर की गाड़ी ।
राब में कुछ और पानी बढ़ गया,
तो वाह-वाह का सारा नशा झड़ गया ।
अपनों पे लिखने को कलम थी उठाई ।
पर कागज़ पे पड़े आँसू से फैल गई स्याही ।
तोड़ कर कलम घर से गये निकल ।
उर में थी हलचल, मन था विकल ।
नहीं ! अब नहीं, मैं सब छोड़ दूँगा ।
कहीं नौकरी या कुछ भी करूँगा ।
बीबी औ बच्चों का पेट तो भरूँगा ।
अध्यात्म औ साहित्य से काम ना चलेगा ।
इससे न मेरा परिवार पलेगा ।
माँ शारदा की छबि मन में आई ।
बिल्कुल वही जिस पर थी कविता बनाई ।
इक पल को फिर से मन उनका डोला ।
पर बच्चे के आँसू से जब दुख को तोला ।
तो सब भूल कर बस निकले वे बाहर ।
तब से खोजते हैं कुछ जा इधर से उधर ।
उम्मीद है उन्हें कुछ तो मिल जायेगा ।
कोई साहित्य प्रेमी तो काम आयेगा ।
घर में ठीक से चूल्हा जल पायेगा ।
कवि फिर कोई कविता रच सुनाएगा ।
कुछ नहीं तो अपनी कहनी ही गाएगा ।
पर इस बार शायद हँसी की जगह वह,
आँसू का वितरण कर-कर के जाएगा !
सरस्वती जोशी

Monday, September 22, 2014

२१वीं सदी की नारी

२१वीं सदी की नारी
(१) श्रीमती ट्विंकल जी द्वारा प्रेषित कविता तथा,
२) सरस्वती जोशी द्वारा उसी संदर्भ में की गई प्रार्थना
कई बार कितना भ्रम में, समझ कर भी न समझने का भाव दिखाते हुए जीवन बिताने को विवश हो जाता है प्राणी ! प्रेमचंद की "प्रेम की होली" नामक कहानी याद आने लगती है । नवरात्रि में जिन नारियों व कन्याओं के आगे शीश झुकेंगे क्या वह छबि इस उपरोक्त संघर्षों से जूझ, बंधनों को तोड़ आगे बढ़नेवाली नारी की होगी ? यही नहीं, क्या इस नारी को किसी उत्सव, व्रत या उद्यापन में "गोरणी", "सवासणी" बनाया/माना जायगा ? क्या उसे शक्ति की प्रतीक कन्याओं, महिलाओं की पंक्ति में स्थान मिलेगा, किसी शुभ संस्कार, पूजन आदि के बाद होने वाले प्रथम प्रणाम को प्राप्त करने का सम्मान व अधिकार मिलेगा ? उसने जो-जो खो दिया उसकी सूची बनाने बैठें तो ग्रंथ बन जाएँ ! यह बड़े साहस की बात है कि उसने कष्टों के कारागार से निकल बंधनों को तोड़ने की हिम्मत की, पर क्या अब अग्नि-परीक्षा पूर्णतया समाप्त हो गई ? क्या भविष्य की सब समस्याएँ हल हो गईं ? क्या उसकी शिक्षा, पद, योग्यता, सम्पन्नता, भगवद्भक्ति, सब मिल कर भी उसे आम कन्या या सुहागिन से भिन्नवाली श्रेणी की होने के अहसास वाले जीवन से बचा पाएँगे ? उसे इतना सशक्त बना पायेंगे कि वह रास्ते में पग-पग पर आने वाले काँटों की चुभन को महसूस न करे, उन्हें रौंदने के अहसास के साथ मुस्कुराती आगे बढ़ जाए? कितने प्रश्न मुँह बाये खड़े होजाते हैं सामने मन को विचलित करने के लिये ! पर कहाँ ढूँढें उत्तर, किससे पूछें, काश इन नारियों को उनका सही diserved स्थान पुन: प्राप्त होने का कोई मंत्र या साधन मिल सके इन्हें ।
(१) श्रीमती ट्विंकल जी द्वारा प्रेषित कविता
१) हाँ उतार दी मैंने वे चूड़ियाँ जो मुझे कमज़ोर बनातीं थीं
हाँ उतार दी मैंने वो पायल जो मेरे
कदमों को रोकती थी
हाँ उतार दिए मैंने गले के वे हार जो मेरी आवाज़ दबाते थे
कर दिया अलग उन रिश्तों को जो मेरे शोषण के लिए जीते थे
फेंक दिए वे विशेषण जिनसे लाद दिया गया मुझे
छोड़ दिया उस साथ को जिसने कुचला मुझे कमज़ोर मानकर
तोड़ दिए वो बंधन जिनको धोखा खाकर भी मैं पूजती थी
आज मैं आजाद हूँ
क्यों कि नहीं है अब मेरी पहचान दूसरों की गढ़ी हुई
आज मैं अबला नारी नहीं
नारी शक्ति से पहचानी जाती हूँ
मुझे पहचानों मैं गहनों से नहीं आत्मबल से शृंगार रचती हूँ
मैं 21वीं सदी की नई उभरती हुई नारी
एक सशक्त नारी हूँ...
२) सरस्वती जोशी द्वारा उसी संदर्भ में की गई प्रार्थना (बेटी ! जैसे तुमने कविता में दाम्पत्यजीवन में विफल होजाने वाली आत्मनिर्भर सशक्त नारी का वर्णन किया मैंने उससे कुछ प्रश्न पूछे हैं बस ! ताकि I don'n mind / care / bilive / follow / ... के पीछे छिपे दर्द या आनंद की अनुभूति के अहसास के ज्ञान से और नारियाँ भी लाभ उठा सकें ।)
२) हे २१वीं सदी की नारी !
हे २१वीं सदी की नारी !
उम्मीद करें के तुम सच में,
सदा सशक्त कहलाओगी ।
नव अनुभव, नव परीक्षण में,
आगे रोड़े नहीं पाओगी ।
हार, चूड़ियाँ, पायल की,
कमी न तुम्हें सताएगी ?
जो मंगल सूत्र त्यागे तुमने,
उनकी याद कभी ना आयेगी ?
अबसे आगे सदा सुहाना,
सौरभमय मग आएगा ?
कोई काँटा बेध चरण को,
रोड़ा नहीं अटकाएगा ?
गर सच में सरल, सुगम मग पाओ,
सुखमय यह संसार मिले ।
सदा तुम्हारी बगिया में अब,
सुंदर सौरभमय पुष्प खिलें ।
तो हे साहसी शक्तिमयी !
तुम हम सबको भी बतलाना ।
पर देखो ! कहीं यथार्थ छिपा कर,
मिथ्या भ्रम में ना उलझाना ।
अपने अनुभव से जो हमको,
तुम अवगत करवाओगी ।
हे २१ वीं सदी की नारी !
तुम पूर्ण बुद्ध कहलाओगी ।
हमें प्रतीक्षा है सच में,
तुम्हारे सब उपदेशों की ।
जो स्वयंभुक्त अनुभव के होंगे,
उन सारे संदेशों की ।
सरस्वती जोशी

Tuesday, September 16, 2014

समाज क्या कहेगा !

समाज क्या कहेगा !
प्रभु ने ख़ुश हो मानव बनाया !
कितने गुणों से उसे सजाया !
पर मानव ने समाज बना़या ।
मन मंदिर में उसे बिठाया ।
और भला वह क्यों ना करता ?
भगवान भरोसे कब तक रहता ?
वह प्रभु जो मूरत में छिपता ।
लाख प्रयत्न करें ना दिखता ।
पर समाज से सब कुछ मिलता ।
उस में ही वह बेटी ब्याहता ।
बहू भी समाज से लाता ।
उससे अपना वंश बढ़ाता ।
मान-सम्मान वही़ीं है पाता ।
वही तो उँचे पद दिलवाता ।
कैसे भी लक्ष्मी को लाओ ।
कोई भी साधन अपनाओ ।
बस तुम लक्ष्मी-पति बन जाओ ।
मन खोल उसकी रस्में निभाओ ।
जो उनका पालन ना कर पाओ ।
तो चुप-चुप आसन से उठ जाओ ।
अपनी सीमा लो पहचान !
सीमा सम होगा सम्मान !
कैसे भला मान गँवाएँ ?
कैसे नीचे बैठ जाएँ ?
लोग इसे तो समझ न पाते ।
"समाज क्या कहेगा ?" यूँ दोहराते ।
जैसे समाज से डरना भूल !
देख इसे चुभता है शूल ।
कहते : "देखो ! प्रभु से डरना !
जो वह चाहे सो ही करना !"
"अरे प्रभु कौन भाग जायगा ?
जब बुलाओ आ ही जायगा ।
अंतिम साँस में भी पुकारो ।
एक दो आवाज़ें मारो ।
भोला- भाला दौड़ आयगा।
नाव पार करके ही जायगा ।
पर समज की बात है न्यारी ।
उससे निभानी रिश्तेदारी ।"
सो मित्रो ! यह भय सदा रहेगा ।
"ध्यान रखना ! समाज क्या कहेगा !"
सरस्वती जोशी

हंजा के जीवन की एक झलक !

देवी संध्या / संझा / हंजा
अविवाहिताओं द्वारा मनवाँछित पति, उदार सास, अच्छी ससुराल, मैके तथा भाई के सुख की प्राप्ति हेतु श्राद्ध पक्ष में १६ दिन तक पूजित देवी संध्या / संझा / हंजा के जीवन की एक झलक !
संध्या केवल देवी नहीं हर कन्या की सहेली व बहन है, तथा हर घर की बहन-बेटी / कन्या का प्रतिनिधित्व भी करती है । इसके थापे तथा किला कोट डा० साधना जोशी-सुखवाल ने कनाडा में छपी एक पत्रिका में छापे थे, तथा श्री सुरेशजी व्यास सिखवाल ने उन्हें SNT में भी लगाया था !
संध्या / संझा / हंजा का जीवन
सावन में भी पतझड़ सी सूनी शाम ।
ससुराल का छोटा सा गाँव ।
जा खेतों के पास नंगे ही पाँव ।
पथिक-हीन, वाहन विहीन,
क्षितिज तक फैली लंबी राह ।
किसी खेत की अध-सूखी सी,
लंबी-सी खजूर के तले, सहमी सी,
तने से लिपटी खड़ी,
परम सुंदरी, भोली संध्या,
अनमनी, उदास, देखती बाट ।
होती निराश बार बार ।
फिर भी बुनती आशा के तार ।
जा नित्य पथ लेती निहार ।
"मैके को जाती पगडंडियों पर खड़ी,
दूर-दूर तक देखती रहूँ ?
हाँ ! क्यों नहीं !
क्या पता आ जाय सुध,
मेरी बिछुड़ी भौजाई को ।
माँ की आँख फरक जाए,
वह भेजे लेने भाई को ।
किसी सहेली को तीजों के,
झूलों में ही आएँ याद ।
वे गीत जो मैं गाया करती थी,
जिनमें करती थी फरियाद :
"माँ ! मुझको नहीं भुला देना !
भैया को भेज बुला लेना..."
आ गई संध्या की बेला !
पंछी लौट के घर को आए ।
अब न यहाँ कोई आएगा,
क्यों बैठी हूँ आस लगाए ?
कुछ पल और देख लूँ बाट ?
या पति के घर लौट जाऊँ ?
फिर से अपना वही नित्य का,
गृहणी का धर्म निभाऊँ ?"
लगा अगले दिन की आस,
लौट आती पति के द्वार ।
खाती थी नित्य सास की मार ।
सिर की फटी चूँदड़ तार-तार ।
पति भी तो नहीं मिला उदार ।
सोचती वह बार-बार :
"भाई न मुझे भुला पायेगा ।
इक दिन वह यहाँ आएगा ।
सिर पर धरेगा स्नेह का हाथ ।
बैठेगा कुछ देर साथ ।
मेरे कष्ट देख द्रवित हो कर,
आँसू की कर देगा बरसात ।
करुणा के दो बोल बोल कर,
मेरी पीड़ा करेगा शांत ।
कोई तो है दुख का साथी,
यह विश्वास जगा जाएगा ।
घर तो मुझे लौटना होगा,
पर दुखियारापन घट जाएगा ।
कटु शब्दो की बौछारें तो,
मिलना बंद नहीं होगा ।
जो नियति मिली है मुझे देव से,
उसको तो सहना ही होगा ।
यूँ नियति की कृपा की आस में,
मैके के प्रति जमे विश्वास में,
शामें आती रहीं, जाती रहीं ।
संध्या अटल बनी सी अपनी,
परंपराओं को निभाती रही ।
पर उसके जीवन की पीर,
सह न सका कोमल शरीर ।
और भव की उस पीड़ा से,
मुक्त हो गया उसका तन ।
विदा हो गई इस जगती से,
तोड़ रिश्तों के सब बंधन ।
मैके में समाचार आया ।
तो सब का मन भर आया ।
कैसे मन मजबूत बना कर,
नारी का कर्तव्य सिखाया !
कैसे बन कठोर समझाया :
"पतिगृह ही स्वर्ग तुम्हारा संध्या !
तुम परधन थीं, यह भूल न जाना !
खड़ी गई थीं तुम उस घर में,
बस आड़ी ही बाहर आना... "
और नारी-हृदय इस
अन्याय को ना सह पाया ।
हर सहेली ने संध्या की,
भूल उसकी "बलाई" जात को,
विस्मित कर जात-पाँत को,
मान कर देवी उसे,
हर घर के बाहर कर चित्रित,
संध्या / संझा / हंजा का थापा बनाया ।
श्रद्धा से कर के पूजन,
बार-बार कर के वंदन ।
गा-गा कर उसका करुण जीवन,
श्रद्धांजलि दे किया नमन ।
एक नहीं पूरे सोलह दिन ।
सरस्वती जोशी

हे जग रचियता ! एक बार बनो "नारी"

हे जग रचियता ! एक बार बनो "नारी"
हे जग रचियता ! 
एक बार बनो "नारी",
आ जग में ले लो अवतार । 
जब तक ऐसा नहीं करोगे,
तुम्हारा पर-पीड़ा का अनुभव बेकार ।

माँ की कोख में आते ही,
अनचाही मैं कहलाती हूँ । 
कुछ सिक्कों के बदले में मैं,
खुले आम मारी जाती हूँ ।

गर किसी पुण्य से नौ महीने तक,
जीवित रह जग में आती हूँ । 
तो जिस घर में हो जन्म लिया,
वहीं "परधन" कहलाती हूँ ।

मैं पुत्र नहीं, अनपेक्षित हूँ,
पग-पग पर करती यह अहसास । 
बचपन से ही ट्रेनिंग मिलती : 
"जाने कैसी होगी सास ।

जाने कैसा पति मिलेगा, " 
सो सीख मुझे उसकी मिलती ।
एक बार तुम भी यह सीखो,
हे जगकर्ता ! है यह विनती ।

यह घर तो है मैका केवल ।
पग-पग पर अहसास करोगे ।
गर इक पल को भी चूक गये तो,
लंबा सा उपदेश सुनोगे ।

पितृगृह होता पराया,
यहाँ नहीं कुछ मेरा अपना । 
जन्म लेने को इक जगह चाहिये,
पर जीवन भर नहीं है रहना ।

पतिगृह पर तब तक अधिकार,
जब तक मैं पति को स्वीकार ।
उसके मन को जीत सकूँ ना,
तो मेरा जीवन निस्सार ।

गर उसका मन जीत न पाऊँ,
वह किस्मत से देवे छोड़ ।
तो मैं सबसे अभागिन प्राणी,
सब लेते मुझसे मुँह मोड़ ।

शास्त्र भी तुम्हारे यही सिखाते,
मान अभागिन हैं ठुकराते ।
माँ बनना भी वे मेरे,
जीवन का प्रमुख लक्ष्य बताते ।

मेरी शिक्षा-दीक्षा-योग्यता,
कोई महत्व नहीं रखती ।
उसे सोच महत्व मेरा,
नहीं तोलती है यह जगती ।

चाहे बन विदुषी महिला मैं,
बन जाऊँ मंत्री या अफसर ।
हों चाहे मुझमें गुण सारे,
नही रखूँ कोई भी कसर ।

पर मेरी शुभता-अशुभता के,
माप-दंड पुरुषों पर निर्भर ।
मिले मान्यता मुझको या ना,
यह है पति-पुत्र-भाई पर निर्भर ।

बस उनका अस्तित्व ही मानो,
है मेरे जीवन का सार ।
उनसे विहीन जो हो जाउँ तो,
कहलाती भाग्य-हीन हर बार ।

कितना कठिन होता है प्रभुवर !
इस पीड़ा के साथ में जीना ।
अवहेलना का विष जब हर पल,
पग-पग पर पड़ता है पीना ।

दीनबंधु कहलाते हो तो हरि !
कुछ दिन तो ख़ुद भी दीन बनो ।
उनके जीवन की सच्चाई का,
आ तुम भी अनुभव स्वयं करो ।

एक बार तुम भी तो आ कर,
इस व्यथा में काटो दिन चार ।
इसके बिना तुम्हें करुणामय !
दीन-वत्सल कहने में क्या सार ?

सरस्वती जोशी
अबला जीवन ! हाय ! तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध आँख में पानी । (जय शंकर प्रसाद) । वह इष्टदेव के मंदिर की पूजा सी, दीप शिखा सी शांत, दलित, भारत की विधवा है । ( सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला") । कस विधि सृजी नारि जग माँही, पराधीन सपनेहु सुख नाहीं । (गोस्वामी तुलसीदास) । अगले जनम मोहें बिटिया न कीजो... (फिल्म का गाना, शायद उमराव जान का ), मैं तो बाबुल तेरे खूँटे की गैया बाँधे वहीं बँध जाँय, तेरे जल की मछरिया तड़प-तड़प रह जायँ, तेरे बागों की चिड़िया़ ढेला मारे उड़ जायँ... (लोक गीत)।

Friday, September 12, 2014

पिता को प्रणाम करती हूँ जो इतना महान है !

पिता
हम सदा या अधिकतर माँ का गुणगान करते नहीं थकते ! 
यह सच है कि नाता गर्भ में धारण करने, जन्म देने, पालने की, 
हमारे स्वास्थ्य-भोजन-वस्त्र, हमारे सुख-दुख बाँटने आदि की भूमिका माँ निभाती है । 
पर ध्यान से सोचें तो माँ की भूमिका जहाँ से समाप्त होती है, 
पिता की वहाँ से प्रारंभ होती है और फिर कभी समाप्त नहीं होती, 
हमारी शिक्षा-दीक्षा, हमें परिवार में, समाज में, संसार में समुचित 
स्थान दिलाने, हमें उन्नत बनाने, हमारे जीवन को सफल-सम्माननीय 
बनाने, हमारी महत्वाकांक्षाओं को जगाने, हमें सशक्त बनाने, 
उत्साह देने व हमारा हर दुख या जीवन की बाधा मिटाने में पिता
 अपनी जान लड़ा देता है, और यह सब बिना गिनाये, अपनी
 इज्जत को हमारी इज्जत से जोड़, हमारी उन्नति को अपनी 
उन्नति मान कर, बिना अहसान जताए, मूक तपस्वी की तरह
 करता चला जाता है ! मैं केवल मेरे ही नहीं हर उस
 पिता को प्रणाम करती हूँ जो इतना महान है !
सरस्वती जोशी

Thursday, September 11, 2014

कौन हो तुम जो

कौन हो तुम जो चमकते आ अचानक अँधियारे में ? 
हर बार जब लगता मुझे मैं फँस गई इक गलियारे नें । 
हाथ पकड़ बाहर ले जाते पोंछ कर हर अश्रु मेरा । 
पर सहसा कहीं विलीन हो जाते मुझको फिरसे छोड़ अकेला । 
तुम चाहे पकड़ो हाथ मेरा पर मैं तुमको पकड़ नहीं पाती । 
बेबस खड़ी सोचती रहती, भर आती है मेरी छाती ।
कृतज्ञता के भार में डूबी यूँही देखती रह जाती ।
पर वापस सुध आती है तो निज को जग / भव में डूबा पाती ।
सरस्वती जोशी

१) ओ अतीत ! मेरे अतीत !

१) ओ अतीत !
मेरे अतीत !
हालाँके तू अब गया बीत ।
अब तो मेरा भूत कहाता ।
पर तुझसे है मेरा, 
एक विचित्र खट्टा-मीठा अटूट सा नाता ।
"पीछे मत देखो ! देखो आगे !"
यह है सब लोगों का कहना ।
किंतु मुझे तो लगता है के,
तू है अब भी मेरा अपना ।
कैसे निर्मोही बन पीछे छोड़,
आगे चल दूँ नाता तोड़ ?
जब तक मेरी साँस रहेगी ।
तेरी स्मृतियाँ पास रहेंगी ।
तूने ही तो बन प्रेरणा,
मुझको अब तक मार्ग दिखाया ।
बस आगे भी ऐसे ही,
देना साथ बन कर साया !
सरस्वती जोशी
२) क्यों आते वे िदन िफर याद ?
क्यों आते वे िदन िफर याद ?
कहते सब: "बीती बातों को भूलो, मत वह बात करो ! "
जो कुछ पाया है मधुमय, बस उसको तोलो माप करो..."
िफर इस मधुमय रस के भीतर, लगता क्यों कुछ कड़वा स्वाद !
सुनते हैं : "है प्यार भरा, यह रसमय सारा ही संसार ।
जीवन है हँस-हँस जीने को, करते जाअो सब को प्यार ।"
हँसते-हँसते ही आ जाता क्यों िफर नयनों में यह खार ?
सुनते जब उपदेश िकसीके, सीने में क्यों उठता ज्वार ?
क्यों इस मन का कोई कोना, व्याकुल हो करता चीत्कार ?
क्यों मन करता कोई सुन ले, कभी बैठ कर मन की बात ?
क्यों दे कोई भला िकसीको, अपनी मुस्कानों के कुछ क्षण ?
िफर भी जाने-अनजाने में, यही चाहता है पागल मन ।
कहीं िमले कोई अपना जो, दे दे कुछ क्षण की सौगात !
िकतना चाहें अब न करें हम, कभी कहीं दुखड़े की बात ।
झोली भर मुस्कानों की हम, खुिशयों की कर दें बरसात ।
पर िनर्धन के बस में है क्या, दे दे मुस्कानों का मोल ?
कैसे चुकाए, कैसे पाए, कौन सुने उसकी फरियाद ?
क्यों आते वे िदन िफर याद ?
सरस्वती जोशी

हर एक उलझन ।

माना के मानव जीवन तो है ही उलझनों का जंजाल । 
हर व्यक्ति के चारों ओर बना हुआ है माया जाल । 

जिधर भी देखो उधर दिखता सदा ही एक घेरा । 
जो रच देता है इर्दगिर्द एक घना सा अँधेरा । 

पर गर मानव धार ले तो शक्ति उसकी है अपार । 
फिर यह संभव नहीं के बाँध पाये अंधकार । 

जब प्रकाश की ज्योति ले वह बढ़ा देता है चरण । 
तो स्वत: सुलझ जाती पंथ की हर एक उलझन । 

और वह बढ़ता जाता पूर्ण रूप से शांत मन । 
पहुँच जाता लक्ष्य तक कर पार सारे सघन वन । 

सरस्वती जोशी

Tuesday, September 9, 2014

मेरे पिता स्वर्गीय श्री माँगीलालजी सुखवाल को सादर समर्पित

मेरे पिता स्वर्गीय श्री माँगीलालजी सुखवाल को सादर समर्पित
हो सकता है आज समय वह जिसका कभी न देखा सपना । 
पर अतीत के गर्भ में छिपा हुआ जो जीवन अपना ।

जिसकी बदौलत मिलते रहे साहस, शक्ति औ प्रेरणा । 
आज है परिणाम जिसका, जिससे जागी थी चेतना ।

हैं अत्यंत मूल्यवान वे कष्टभरी बीती घड़ियाँ । 
शुरू हुआ जप जिन मनकों से उस माला की पावन लड़ियाँ ।

उन्हीं में कहीं वह दिव्य शक्ति है जिसने भावी मार्ग दिखाया । 
वर्तमान का जीवन जिससे बन ज्योतिर्मय जगमगाया ।

सरस्वती जोशी