कौन हो तुम जो चमकते आ अचानक अँधियारे में ?
हर बार जब लगता मुझे मैं फँस गई इक गलियारे नें ।
हाथ पकड़ बाहर ले जाते पोंछ कर हर अश्रु मेरा ।
पर सहसा कहीं विलीन हो जाते मुझको फिरसे छोड़ अकेला ।
तुम चाहे पकड़ो हाथ मेरा पर मैं तुमको पकड़ नहीं पाती ।
बेबस खड़ी सोचती रहती, भर आती है मेरी छाती ।
कृतज्ञता के भार में डूबी यूँही देखती रह जाती ।
पर वापस सुध आती है तो निज को जग / भव में डूबा पाती ।
सरस्वती जोशी
हर बार जब लगता मुझे मैं फँस गई इक गलियारे नें ।
हाथ पकड़ बाहर ले जाते पोंछ कर हर अश्रु मेरा ।
पर सहसा कहीं विलीन हो जाते मुझको फिरसे छोड़ अकेला ।
तुम चाहे पकड़ो हाथ मेरा पर मैं तुमको पकड़ नहीं पाती ।
बेबस खड़ी सोचती रहती, भर आती है मेरी छाती ।
कृतज्ञता के भार में डूबी यूँही देखती रह जाती ।
पर वापस सुध आती है तो निज को जग / भव में डूबा पाती ।
सरस्वती जोशी
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