मेरे पिता स्वर्गीय श्री माँगीलालजी सुखवाल को सादर समर्पित
हो सकता है आज समय वह जिसका कभी न देखा सपना ।
पर अतीत के गर्भ में छिपा हुआ जो जीवन अपना ।
जिसकी बदौलत मिलते रहे साहस, शक्ति औ प्रेरणा ।
आज है परिणाम जिसका, जिससे जागी थी चेतना ।
हैं अत्यंत मूल्यवान वे कष्टभरी बीती घड़ियाँ ।
शुरू हुआ जप जिन मनकों से उस माला की पावन लड़ियाँ ।
उन्हीं में कहीं वह दिव्य शक्ति है जिसने भावी मार्ग दिखाया ।
वर्तमान का जीवन जिससे बन ज्योतिर्मय जगमगाया ।
सरस्वती जोशी
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