Saturday, October 11, 2014

एक कवि का जीवन

एक कवि का जीवन 
तुम बसोगे घर-घर के नित्य के इतिहास में । 
हर घर के हर सदस्य के हर अश्रु में हर हास में । 
चाहे तुमने बन केशव-सूर उनसे ऊँचे पद ना पाये । 
चाहे बना दूत मेघों को प्रेम संदेशे ना भिजवाए । 
सीता के संग बैठ कुटी में लव-कुश के संग खेल न पाए ।
पर तुमने हर टूटी छत के नीचे जा-जा उसके दर्द बँटाए ।
लेखनी है तुम्हारी जिस पीड़ा का अनुभव कर रही ।
वह केवल गीतों का विषय नहीं, वही जीवन का सत्य सही !
- सरस्वती जोशी

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