एक कवि का जीवन
तुम बसोगे घर-घर के नित्य के इतिहास में ।
हर घर के हर सदस्य के हर अश्रु में हर हास में ।
चाहे तुमने बन केशव-सूर उनसे ऊँचे पद ना पाये ।
चाहे बना दूत मेघों को प्रेम संदेशे ना भिजवाए ।
सीता के संग बैठ कुटी में लव-कुश के संग खेल न पाए ।
पर तुमने हर टूटी छत के नीचे जा-जा उसके दर्द बँटाए ।
लेखनी है तुम्हारी जिस पीड़ा का अनुभव कर रही ।
वह केवल गीतों का विषय नहीं, वही जीवन का सत्य सही !
- सरस्वती जोशी
तुम बसोगे घर-घर के नित्य के इतिहास में ।
हर घर के हर सदस्य के हर अश्रु में हर हास में ।
चाहे तुमने बन केशव-सूर उनसे ऊँचे पद ना पाये ।
चाहे बना दूत मेघों को प्रेम संदेशे ना भिजवाए ।
सीता के संग बैठ कुटी में लव-कुश के संग खेल न पाए ।
पर तुमने हर टूटी छत के नीचे जा-जा उसके दर्द बँटाए ।
लेखनी है तुम्हारी जिस पीड़ा का अनुभव कर रही ।
वह केवल गीतों का विषय नहीं, वही जीवन का सत्य सही !
- सरस्वती जोशी
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