समय उर का सहज सलिल छीन,
खारे अश्रु दे गया ।
वह चिंता मुक्त शांत से पल,
सारे चुन कर ले गया ।
जीवन का यथार्थ देख,
मन हमारा डोल गया ।
ज़िंदगी के सभी रिश्तों की,
परतें वह खोल गया ।
जीवन के हर पल का मोल,
एक पल में बोल गया ।
मिला हमे निज के अंतर से,
बता गया सत्य वह कितना !
औ समझ में आया यह जग,
है कितना विचित्र सपना !
सब में जहाँ वही ईश्वर,
है सबसे हमें जुड़ना ।
किंतु सच में न कोई अपना ।
सबसे हमें होगा बिछुड़ना !
- सरस्वती जोशी
खारे अश्रु दे गया ।
वह चिंता मुक्त शांत से पल,
सारे चुन कर ले गया ।
जीवन का यथार्थ देख,
मन हमारा डोल गया ।
ज़िंदगी के सभी रिश्तों की,
परतें वह खोल गया ।
जीवन के हर पल का मोल,
एक पल में बोल गया ।
मिला हमे निज के अंतर से,
बता गया सत्य वह कितना !
औ समझ में आया यह जग,
है कितना विचित्र सपना !
सब में जहाँ वही ईश्वर,
है सबसे हमें जुड़ना ।
किंतु सच में न कोई अपना ।
सबसे हमें होगा बिछुड़ना !
- सरस्वती जोशी
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