असफल प्रणय के बंधन (हर पीड़िता नारी को)
परंपरा के आदर से, या आधुनिकता के जोश से,
जाने या अनजाने से, या किसी दबाव से या रोष से,
ग़रीब मांं-बाप के पास हुई पैसों की कमी से,
या उनकी आँखों से बिखरी नमी से,
जाने कितने कारण हैं, जिनके घेरे में फँस गये ।
कुछ ऐसे प्रभावित से हुए, ग्रह चक्कर में धँस गये ।
जाने या अनजाने से, या किसी दबाव से या रोष से,
ग़रीब मांं-बाप के पास हुई पैसों की कमी से,
या उनकी आँखों से बिखरी नमी से,
जाने कितने कारण हैं, जिनके घेरे में फँस गये ।
कुछ ऐसे प्रभावित से हुए, ग्रह चक्कर में धँस गये ।
ऐसे बंधन में बँध गये गये जो तकदीर को भाये नहीं ।
किसी तरह जाल से निकले मगर पूरे निकल पाये नहीं ।
काले साये स्मृतियों के मन पर ऐसे असर करने लगे ।
हँसने के सारे द्वार मानो सहसा ही बंद से दिखने लगे ।
असफल प्रणय के बंधन टूटे पर ऐसी छापें छोड़ गये ।
के बाकी जीवन के हर सपने की सारी उमंगें तोड़ गये ।
किसी तरह जाल से निकले मगर पूरे निकल पाये नहीं ।
काले साये स्मृतियों के मन पर ऐसे असर करने लगे ।
हँसने के सारे द्वार मानो सहसा ही बंद से दिखने लगे ।
असफल प्रणय के बंधन टूटे पर ऐसी छापें छोड़ गये ।
के बाकी जीवन के हर सपने की सारी उमंगें तोड़ गये ।
माना के यह सच है अक्सर प्राणी संग ऐसा ही होता है ।
पर क्या जीवन का यही मूल्य ? क्या यह इतना सस्ता होता है !
किसी एक के प्यार में बँध कर इतने गुलाम हो गये,
कि जीवन भर केलिये प्यार के शब्द ही बदनाम हो गये ?
पर क्या जीवन का यही मूल्य ? क्या यह इतना सस्ता होता है !
किसी एक के प्यार में बँध कर इतने गुलाम हो गये,
कि जीवन भर केलिये प्यार के शब्द ही बदनाम हो गये ?
अब आगे किसी का कैसा भी सरल स्नेह हो !
उर में कही भरा करुणा का मेह हो ।
उसे अपनी ओर आते देख कर ही डरते हो !
क्या अभी भी तुम उस अन्यायी पे मरते हो ?
गर नहीं तो क्रोध क्यों स्नेह के खिलाफ ?
किसी का क्रोध किसी पर यह भला क्या बात !
उर में कही भरा करुणा का मेह हो ।
उसे अपनी ओर आते देख कर ही डरते हो !
क्या अभी भी तुम उस अन्यायी पे मरते हो ?
गर नहीं तो क्रोध क्यों स्नेह के खिलाफ ?
किसी का क्रोध किसी पर यह भला क्या बात !
गर किसी एक ने किया कभी था छल ।
तो क्या तोड़ लोगे अपना ही मनोबल ?
भूलना अतीत को होता नहीं सरल !
पर खोओ वर्तमान को क्या यह इसी काबिल ?
जो नहीं तो सर पर यह काली सी चादर किस लिये ?
किसके लिये ? किस संताप में ? क्यों ? किसकी आस में ?
तो क्या तोड़ लोगे अपना ही मनोबल ?
भूलना अतीत को होता नहीं सरल !
पर खोओ वर्तमान को क्या यह इसी काबिल ?
जो नहीं तो सर पर यह काली सी चादर किस लिये ?
किसके लिये ? किस संताप में ? क्यों ? किसकी आस में ?
ये मनोबल को गिराने वाले साधन-प्रसाधन किस लिये ?
जो डिज़र्व नहीं करते उनके लिये ? उनके डर से ?
या उर में उठते आक्रोष के निर्झर से ?
यह उदासी की ओर जाती राह क्यों ?
यह दीन बन याचना में बढ़ी बाँह क्यों ?
उठो ! तुम किसी की माँ हो, बेटी हो, बहन हो, सखी हो !
कितना कुछ पास है उसे क्यों खो रही हो ?
जो डिज़र्व नहीं करते उनके लिये ? उनके डर से ?
या उर में उठते आक्रोष के निर्झर से ?
यह उदासी की ओर जाती राह क्यों ?
यह दीन बन याचना में बढ़ी बाँह क्यों ?
उठो ! तुम किसी की माँ हो, बेटी हो, बहन हो, सखी हो !
कितना कुछ पास है उसे क्यों खो रही हो ?
- सरस्वती जोशी
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