Sunday, December 14, 2014

शब्द बाण

शब्द बाण
कभी-कभी कुछ लोगों के,
शब्द बाण चुभ जाते हैं ।
चीर हमारे सीने को,
रक्त-धार बहाते हैं ।
रोक न पाते हैं निज को तो,
शब्दों का जाल बनाते हैं ।
कुछ अच्छी-सी मीठी बातो से,
उन घावों को सहलाते हैं ।
फिरसे वार न कर दे जगती,
यह सोच-सोच डर जाते हैं ।
इसीलिये मुस्कानों से भर,
मृदु-मधुर शब्द सुनाते हैं ।
भर शालीनता की रस धार,
वाणी का पाठ पढ़ाते हैं ।
शायद खुद को ही बहलाने को,
हम रिसता दर्द छिपाते हैं ।
उर की पीड़ा के दंशन से,
जब व्याकुल से हो जाते हैं ।
तो केंद्रित कर अपने मन को,
विष अमृत सम पी जाते हैं ।
कब तक सहें यह भार भला
जब घावों की पहल जगती से आई ।
हमने तो मूक शालीन भाव से,
केवल मन की बात बताई ।

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