Tuesday, November 11, 2014

ये खोये लम्हे

ये खोये लम्हे
जिंदगी के जो पहलू पुस्तकें सिखा सकती थीं ।
जिस दिशा में हाथ पकड़ हमको ले जा सकती थीं ।
हम उनके ज्ञान भरे शब्दों को पूरा सुन पाये नहीं ।
उनमें भरे संगीत स्वर ख़ुश हो गुनगुनाये नहीं ।
जग के इंद्र धनुषी जालों को पूरा समझ पाये नहीं ।
वक्त पर उनके बंधन से बाहर निकल पाये नहीं ।
आज जब ये जाल सारे हैं स्वत: ही टूट गये ।
वे सारे आकर्षक बंधन हैं कहीं पीछे छूट गये ।
जीवन के कटु सत्य सामने आ खड़े बन कर विशाल ।
तो हर बीता पल खड़ा सामने लिये हुए प्रश्नों के जाल ।
अतीत की हर शिक्षा जिसे हमने नगण्य था माना ।
उसका हर महत्व प्रकट हो प्रश्न पूछता मनमाना ।
अब तो सब कुछ समझ चुके हैं, चाहें : सपने हों साकार ।
पर जो खोया उसको पा लें फिर से यह आशा तो है बेकार ।
जो खाई हम बना चुके अब उसको तो भर नहीं सकते ।
जो कमी रख दी जीवन में उसको पूरा कर नहीं सकते ।
खीज आती है खुद पर ही मानव जीवन खो देने पर ।
सुरभित गुलाब की जगह यहाँ केवल काँटे बो लेने पर ।
अतीत की हर क्षिक्षा आ कर खड़ी सामने कुछ पूछ रही ।
पर कैसे कुछ बोलें अब उससे है उसकी हर बात सही ।
जो बीत गया वह तो हमको वापस कभी न मिल पायेगा ।
यह जीवन तो अब ऐसे ही यूँ पछताने में ही जाएगा ।
गर प्रभु फिरसे देख दया दे देगा हमको मानव का तन ।
तो शायद अगले जनम में कर पाएँ कुछ ऐसा साधन ।
के मानव-जीवन यह हमारा सफल जीवन कहलाए ।
ऐसी स्मृतियाँ कुछ छोड़ सकें जो लोगों को याद आएँ ।
मोक्ष क्या है नहीं जानते लेकिन यह सदा से हैं सुनते ।
जो जीवन में कुछ कर जाते वे मर कर भी नहीं मरते ।
हे प्रभु ! तुम से विनय यही : इतनी करुणा तुम कर देना ।
थोड़ा कुछ जग में कर पायें, बस एक जनम फिर दे देना ।
- सरस्वती जोशी

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