Monday, December 29, 2014

हे मनमोहन !

हे मनमोहन ! थारा चरणाँ में आई हूँ,
गोविंद-माधव ! मोसे मुख मत मोड़ो रे !
टूटी-सी नाव मझधार में अड़ी है,
करुणाकर ! पतवार मत छोड़ो रे !
भव-सागर को गेहरो-गोहरो पाणी,
डूबे है नाव हरजी ! जल्दी से दौड़ो रे !
पकड़्यो है नाथ ! म्हैं तो थारो सहारो,
भगत-वछल ! पार कर दो नी बेड़ो रे !
हे रघुनंदन ! म्हैंतो दासी हूँ थारी,
दीनदयाल ! मोसे नातो मत तोड़ो रे !
सरस्वती जोशी

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