Thursday, October 30, 2014

काश हर होनेवाला अहसास,

काश हर होनेवाला अहसास,
अहसास न रह सत्य बन जाए !
जिसके लिये हम तड़पते हैं,
वह और कुछ नहीं तो सपने में आ जाए ।
कुछ पल जीवन के मुस्कुराते गुजर जाएँ ।
कुछ स्वप्न हकीकत में बदल जाएँ ।
सुनते हैं वे गोपियों के सपनों में आते थे ।
राधा के आँसू दुपट्टें से पोंछ जाते थे ।
काश कभी हमारे आँसू भी दिख जाएँ ।
करुणा के कुछ कण इधर भी बिखर जाएँ !
तो जगती में आना अपना सफल हो जाए ।
इस मन के अरमान अधूरे न जाएँ ।
पर हर सपना कभी साकार नहीं होता ।
हर अधूरा अरमाँ आकार नहीं लेता ।
जानते हैं हम और खुद को समझाते हैं ।
लेकिन वही भ्रम बार-बार उभर आते हैं ।
जाने क्यों जगती की यह विचित्र रीत है ।
हारती सदा से आई हर "प्रीत" है ।
- सरस्वती जोशी

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