१) ओ अतीत !
मेरे अतीत !
हालाँके तू अब गया बीत ।
अब तो मेरा भूत कहाता ।
पर तुझसे है मेरा,
एक विचित्र खट्टा-मीठा अटूट सा नाता ।
"पीछे मत देखो ! देखो आगे !"
यह है सब लोगों का कहना ।
किंतु मुझे तो लगता है के,
तू है अब भी मेरा अपना ।
कैसे निर्मोही बन पीछे छोड़,
आगे चल दूँ नाता तोड़ ?
जब तक मेरी साँस रहेगी ।
तेरी स्मृतियाँ पास रहेंगी ।
तूने ही तो बन प्रेरणा,
मुझको अब तक मार्ग दिखाया ।
बस आगे भी ऐसे ही,
देना साथ बन कर साया !
सरस्वती जोशी
मेरे अतीत !
हालाँके तू अब गया बीत ।
अब तो मेरा भूत कहाता ।
पर तुझसे है मेरा,
एक विचित्र खट्टा-मीठा अटूट सा नाता ।
"पीछे मत देखो ! देखो आगे !"
यह है सब लोगों का कहना ।
किंतु मुझे तो लगता है के,
तू है अब भी मेरा अपना ।
कैसे निर्मोही बन पीछे छोड़,
आगे चल दूँ नाता तोड़ ?
जब तक मेरी साँस रहेगी ।
तेरी स्मृतियाँ पास रहेंगी ।
तूने ही तो बन प्रेरणा,
मुझको अब तक मार्ग दिखाया ।
बस आगे भी ऐसे ही,
देना साथ बन कर साया !
सरस्वती जोशी
२) क्यों आते वे िदन िफर याद ?
क्यों आते वे िदन िफर याद ?
कहते सब: "बीती बातों को भूलो, मत वह बात करो ! "
जो कुछ पाया है मधुमय, बस उसको तोलो माप करो..."
िफर इस मधुमय रस के भीतर, लगता क्यों कुछ कड़वा स्वाद !
कहते सब: "बीती बातों को भूलो, मत वह बात करो ! "
जो कुछ पाया है मधुमय, बस उसको तोलो माप करो..."
िफर इस मधुमय रस के भीतर, लगता क्यों कुछ कड़वा स्वाद !
सुनते हैं : "है प्यार भरा, यह रसमय सारा ही संसार ।
जीवन है हँस-हँस जीने को, करते जाअो सब को प्यार ।"
हँसते-हँसते ही आ जाता क्यों िफर नयनों में यह खार ?
सुनते जब उपदेश िकसीके, सीने में क्यों उठता ज्वार ?
क्यों इस मन का कोई कोना, व्याकुल हो करता चीत्कार ?
जीवन है हँस-हँस जीने को, करते जाअो सब को प्यार ।"
हँसते-हँसते ही आ जाता क्यों िफर नयनों में यह खार ?
सुनते जब उपदेश िकसीके, सीने में क्यों उठता ज्वार ?
क्यों इस मन का कोई कोना, व्याकुल हो करता चीत्कार ?
क्यों मन करता कोई सुन ले, कभी बैठ कर मन की बात ?
क्यों दे कोई भला िकसीको, अपनी मुस्कानों के कुछ क्षण ?
िफर भी जाने-अनजाने में, यही चाहता है पागल मन ।
कहीं िमले कोई अपना जो, दे दे कुछ क्षण की सौगात !
क्यों दे कोई भला िकसीको, अपनी मुस्कानों के कुछ क्षण ?
िफर भी जाने-अनजाने में, यही चाहता है पागल मन ।
कहीं िमले कोई अपना जो, दे दे कुछ क्षण की सौगात !
िकतना चाहें अब न करें हम, कभी कहीं दुखड़े की बात ।
झोली भर मुस्कानों की हम, खुिशयों की कर दें बरसात ।
पर िनर्धन के बस में है क्या, दे दे मुस्कानों का मोल ?
कैसे चुकाए, कैसे पाए, कौन सुने उसकी फरियाद ?
क्यों आते वे िदन िफर याद ?
झोली भर मुस्कानों की हम, खुिशयों की कर दें बरसात ।
पर िनर्धन के बस में है क्या, दे दे मुस्कानों का मोल ?
कैसे चुकाए, कैसे पाए, कौन सुने उसकी फरियाद ?
क्यों आते वे िदन िफर याद ?
सरस्वती जोशी
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