मेरी सासजी स्वर्गीया श्रीमती तुलसी देवी शास्त्री को सादर समर्पित -
म्हैं तो सुणी रे ! म्हैं तो सुणी रे !
म्हैं तो सुणी रे थूँ तो मन को रे मोहन !
जो मेरो मनड़ो लुभा ले तो जाणूँ रे !
जो मेरो मनड़ो लुभा ले तो जाणूँ रे !
म्हैं तो सुणी रे थूँ तो घट-घट वासी !
जो मोरे घट बस जावे तो जाणूँ रे !
जो मोरे घट बस जावे तो जाणूँ रे !
म्हैं तो सुणी रे थूँ तो तारण हारो !
जो म्हने तार बता दे तो जाणूँ रे !
जो म्हने तार बता दे तो जाणूँ रे !
म्हैं तो सुणी रे थूँ तो बड़ो रे केवटियो !
जो म्हने पार लगा दे तो जाणूँ रे !
जो म्हने पार लगा दे तो जाणूँ रे !
म्हें तो सुणी रे थूँ तो लाज बचावै !
जो मेरी लाज बचा दे तो जाणूँ रे !
जो मेरी लाज बचा दे तो जाणूँ रे !
म्हैं तो सुणी रे थें तो गीता रचाई !
जो म्हने ज्ञान सिखा दे तो जाणूँ रे !
जो म्हने ज्ञान सिखा दे तो जाणूँ रे !
म्हैं तो सुणी रे थूँ तो दीनाँ को वत्सल !
जो मो सो दीन बता दे तो जाणूँ रे !
जो मो सो दीन बता दे तो जाणूँ रे !
हे दीनानाथ ! थारा शरणा में आई हूँ !
जो मेरो हाथ पकड़ ले तो जाणूँ रे !
जो मेरो हाथ पकड़ ले तो जाणूँ रे !
दरश की प्यासी कद से द्वार खड़ी हूँ !
जो मोंहे दरस दिखा दे तो जाणूँ रे !
जो मोंहे दरस दिखा दे तो जाणूँ रे !
हे करुणाकर ! कद से पुकारूँ रे !
जो म्हने परचो दिखा दे तो जाणूँ रे !
जो म्हने परचो दिखा दे तो जाणूँ रे !
सरस्वती जोशी
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