Monday, December 8, 2014

जीवन के सत्य का अहसास

जीवन के सत्य का अहसास
हर जाती साँस के साथ,
हर अधूरी आस के साथ,
जीवन के सत्य का,
होता जाता है अहसास ।
घटता जाता है जिंदगी का दायरा ।
अनपढ़ हो या हो विद्वान ।
उसे हो जाता है इसका ज्ञान ।
फिर भी उसके मन में रह जाती,
इक अनबुझी सी प्यास ।
कभी कुछ और पाने की कामना,
कभी कुछ खो जाने का भय ।
आँखों में भरा समंदर,
जीता है मन में ले कर संशय ।
हर पग पर माँगता जगत से मुक्ति ।
फिर भी जीने की साध में लगाता,
कर-कर संचय सारी शक्ति ।
विचित्र सी विडंबना है ।
फिर भी उसको जीना है ।
सब संत मार्ग बताते हैं ।
जग मिथ्या समझाते हैं ।
हर प्राणी मन में जानता है ।
फिर भी न इसको मानता है ।
काश प्रभु न बुनते यह माया-जाल ।
तो सत्य को समझ कर मानव,
बदल पाता अपना कुछ हाल ।
- सरस्वती जोशी

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