२१वीं सदी की नारी
(१) श्रीमती ट्विंकल जी द्वारा प्रेषित कविता तथा,
२) सरस्वती जोशी द्वारा उसी संदर्भ में की गई प्रार्थना
(१) श्रीमती ट्विंकल जी द्वारा प्रेषित कविता तथा,
२) सरस्वती जोशी द्वारा उसी संदर्भ में की गई प्रार्थना
कई बार कितना भ्रम में, समझ कर भी न समझने का भाव दिखाते हुए जीवन बिताने को विवश हो जाता है प्राणी ! प्रेमचंद की "प्रेम की होली" नामक कहानी याद आने लगती है । नवरात्रि में जिन नारियों व कन्याओं के आगे शीश झुकेंगे क्या वह छबि इस उपरोक्त संघर्षों से जूझ, बंधनों को तोड़ आगे बढ़नेवाली नारी की होगी ? यही नहीं, क्या इस नारी को किसी उत्सव, व्रत या उद्यापन में "गोरणी", "सवासणी" बनाया/माना जायगा ? क्या उसे शक्ति की प्रतीक कन्याओं, महिलाओं की पंक्ति में स्थान मिलेगा, किसी शुभ संस्कार, पूजन आदि के बाद होने वाले प्रथम प्रणाम को प्राप्त करने का सम्मान व अधिकार मिलेगा ? उसने जो-जो खो दिया उसकी सूची बनाने बैठें तो ग्रंथ बन जाएँ ! यह बड़े साहस की बात है कि उसने कष्टों के कारागार से निकल बंधनों को तोड़ने की हिम्मत की, पर क्या अब अग्नि-परीक्षा पूर्णतया समाप्त हो गई ? क्या भविष्य की सब समस्याएँ हल हो गईं ? क्या उसकी शिक्षा, पद, योग्यता, सम्पन्नता, भगवद्भक्ति, सब मिल कर भी उसे आम कन्या या सुहागिन से भिन्नवाली श्रेणी की होने के अहसास वाले जीवन से बचा पाएँगे ? उसे इतना सशक्त बना पायेंगे कि वह रास्ते में पग-पग पर आने वाले काँटों की चुभन को महसूस न करे, उन्हें रौंदने के अहसास के साथ मुस्कुराती आगे बढ़ जाए? कितने प्रश्न मुँह बाये खड़े होजाते हैं सामने मन को विचलित करने के लिये ! पर कहाँ ढूँढें उत्तर, किससे पूछें, काश इन नारियों को उनका सही diserved स्थान पुन: प्राप्त होने का कोई मंत्र या साधन मिल सके इन्हें ।
(१) श्रीमती ट्विंकल जी द्वारा प्रेषित कविता
१) हाँ उतार दी मैंने वे चूड़ियाँ जो मुझे कमज़ोर बनातीं थीं
हाँ उतार दी मैंने वो पायल जो मेरे
कदमों को रोकती थी
हाँ उतार दिए मैंने गले के वे हार जो मेरी आवाज़ दबाते थे
हाँ उतार दी मैंने वो पायल जो मेरे
कदमों को रोकती थी
हाँ उतार दिए मैंने गले के वे हार जो मेरी आवाज़ दबाते थे
कर दिया अलग उन रिश्तों को जो मेरे शोषण के लिए जीते थे
फेंक दिए वे विशेषण जिनसे लाद दिया गया मुझे
छोड़ दिया उस साथ को जिसने कुचला मुझे कमज़ोर मानकर
तोड़ दिए वो बंधन जिनको धोखा खाकर भी मैं पूजती थी
फेंक दिए वे विशेषण जिनसे लाद दिया गया मुझे
छोड़ दिया उस साथ को जिसने कुचला मुझे कमज़ोर मानकर
तोड़ दिए वो बंधन जिनको धोखा खाकर भी मैं पूजती थी
आज मैं आजाद हूँ
क्यों कि नहीं है अब मेरी पहचान दूसरों की गढ़ी हुई
आज मैं अबला नारी नहीं
नारी शक्ति से पहचानी जाती हूँ
मुझे पहचानों मैं गहनों से नहीं आत्मबल से शृंगार रचती हूँ
मैं 21वीं सदी की नई उभरती हुई नारी
एक सशक्त नारी हूँ...
क्यों कि नहीं है अब मेरी पहचान दूसरों की गढ़ी हुई
आज मैं अबला नारी नहीं
नारी शक्ति से पहचानी जाती हूँ
मुझे पहचानों मैं गहनों से नहीं आत्मबल से शृंगार रचती हूँ
मैं 21वीं सदी की नई उभरती हुई नारी
एक सशक्त नारी हूँ...
२) सरस्वती जोशी द्वारा उसी संदर्भ में की गई प्रार्थना (बेटी ! जैसे तुमने कविता में दाम्पत्यजीवन में विफल होजाने वाली आत्मनिर्भर सशक्त नारी का वर्णन किया मैंने उससे कुछ प्रश्न पूछे हैं बस ! ताकि I don'n mind / care / bilive / follow / ... के पीछे छिपे दर्द या आनंद की अनुभूति के अहसास के ज्ञान से और नारियाँ भी लाभ उठा सकें ।)
२) हे २१वीं सदी की नारी !
हे २१वीं सदी की नारी !
उम्मीद करें के तुम सच में,
सदा सशक्त कहलाओगी ।
नव अनुभव, नव परीक्षण में,
आगे रोड़े नहीं पाओगी ।
उम्मीद करें के तुम सच में,
सदा सशक्त कहलाओगी ।
नव अनुभव, नव परीक्षण में,
आगे रोड़े नहीं पाओगी ।
हार, चूड़ियाँ, पायल की,
कमी न तुम्हें सताएगी ?
जो मंगल सूत्र त्यागे तुमने,
उनकी याद कभी ना आयेगी ?
कमी न तुम्हें सताएगी ?
जो मंगल सूत्र त्यागे तुमने,
उनकी याद कभी ना आयेगी ?
अबसे आगे सदा सुहाना,
सौरभमय मग आएगा ?
कोई काँटा बेध चरण को,
रोड़ा नहीं अटकाएगा ?
सौरभमय मग आएगा ?
कोई काँटा बेध चरण को,
रोड़ा नहीं अटकाएगा ?
गर सच में सरल, सुगम मग पाओ,
सुखमय यह संसार मिले ।
सदा तुम्हारी बगिया में अब,
सुंदर सौरभमय पुष्प खिलें ।
सुखमय यह संसार मिले ।
सदा तुम्हारी बगिया में अब,
सुंदर सौरभमय पुष्प खिलें ।
तो हे साहसी शक्तिमयी !
तुम हम सबको भी बतलाना ।
पर देखो ! कहीं यथार्थ छिपा कर,
मिथ्या भ्रम में ना उलझाना ।
तुम हम सबको भी बतलाना ।
पर देखो ! कहीं यथार्थ छिपा कर,
मिथ्या भ्रम में ना उलझाना ।
अपने अनुभव से जो हमको,
तुम अवगत करवाओगी ।
हे २१ वीं सदी की नारी !
तुम पूर्ण बुद्ध कहलाओगी ।
तुम अवगत करवाओगी ।
हे २१ वीं सदी की नारी !
तुम पूर्ण बुद्ध कहलाओगी ।
हमें प्रतीक्षा है सच में,
तुम्हारे सब उपदेशों की ।
जो स्वयंभुक्त अनुभव के होंगे,
उन सारे संदेशों की ।
तुम्हारे सब उपदेशों की ।
जो स्वयंभुक्त अनुभव के होंगे,
उन सारे संदेशों की ।
सरस्वती जोशी
No comments:
Post a Comment