प्रात:कालीन पूजन
बहुत देखते हैं हम हर रोज़ सुबह आते हुए संदेश ।
कितने रसों का भरा होता है इनमें समावेश ।
कितने ही विविध विचार, कितने सारे समाचार ।
कितनी कविताएँ, कितने गाने, कभी नये, कभी पुराने ।
कितने हँसी के गुंजन । कितने शोक भरे क्रंदन ।
कितने रसों का भरा होता है इनमें समावेश ।
कितने ही विविध विचार, कितने सारे समाचार ।
कितनी कविताएँ, कितने गाने, कभी नये, कभी पुराने ।
कितने हँसी के गुंजन । कितने शोक भरे क्रंदन ।
वृद्धों का हर लेते एकाकीपन । युवकों का करते मनोरंजन ।
नीति धर्म की लिख हर शिक्षा, देते हैं ये अद्भुत दीक्षा ।
किंतु न जाने क्यों कुछ ऐसा है जिसे मैं ढूँढती हूँ बार-बार ।
लेकिन वह मुझे दिखता है बस केवल कभी-कभार ।
नीति धर्म की लिख हर शिक्षा, देते हैं ये अद्भुत दीक्षा ।
किंतु न जाने क्यों कुछ ऐसा है जिसे मैं ढूँढती हूँ बार-बार ।
लेकिन वह मुझे दिखता है बस केवल कभी-कभार ।
आज सुबह ही पढ़ने में आया : "सब चिंताओं से मुँह मोड़,
सारी झंझटबाजी छोड़, हर टेंशन से नाता तोड़ ।
बस हरि की तुम करो साधना, हो जाएगा सच हर सपना ।..."
सच में मन को बहुत ही भाया, हाथ जोड़ कर शीश नमाया ।
सारी झंझटबाजी छोड़, हर टेंशन से नाता तोड़ ।
बस हरि की तुम करो साधना, हो जाएगा सच हर सपना ।..."
सच में मन को बहुत ही भाया, हाथ जोड़ कर शीश नमाया ।
सोचा : बच्चों को भी पढ़वाऊँ, यह सुंदर संदेश सुनाऊँ ।
पर कर न मैं ऐसा पाई, लगा : अभी न इसकी उमर आई ।
यह समय है भावी-निर्माण का, पुस्तकों में बसे ज्ञान का ।
बस वही इनका भगवान है, इसमें ही इनका कल्याण है ।
अब न बीसवीं सदी रही, कि काम मिल जायगा कहीं न कहीं ।
अंकों का हर प्रतिशत ही है अभी तो इनकी हर माला ।
गणित का हर सवाल ही है इनकी तो बस कर माला ।
उसी में बसा इनका भगवान । अच्छे अंक ही गीता का ज्ञान ।
पर कर न मैं ऐसा पाई, लगा : अभी न इसकी उमर आई ।
यह समय है भावी-निर्माण का, पुस्तकों में बसे ज्ञान का ।
बस वही इनका भगवान है, इसमें ही इनका कल्याण है ।
अब न बीसवीं सदी रही, कि काम मिल जायगा कहीं न कहीं ।
अंकों का हर प्रतिशत ही है अभी तो इनकी हर माला ।
गणित का हर सवाल ही है इनकी तो बस कर माला ।
उसी में बसा इनका भगवान । अच्छे अंक ही गीता का ज्ञान ।
सोचते समय मन में हुआ कुछ कंपन ।
फौरन प्रभु के आगे था किया नमन ।
गीता की पुस्तक भी उठाई । बार-बार सर से लगाई ।
मन ही मन की क्षमा याचना । भय वश की कुछ अजब कल्पना ।
पर जो उर में बात उठी उसको मिटा नहीं पाई ।
क्योंकि मन कहता यही रहा : "यही इस युग की सच्चाई ।"
छोड़ गीता व मास-पारायण, लिया हाथ में इंगलिश व्याकरण ।
छोड़ सुबह का सब पूजन, बच्चों को करवाने लगी रिवीज़न ।
कुछ मन में खटका भी आया । कुछ मन भारी सा हो आया ।
पर लगा कि मेरे मेडिटेशन का समय अभी तक नहीं है आया ।
फौरन प्रभु के आगे था किया नमन ।
गीता की पुस्तक भी उठाई । बार-बार सर से लगाई ।
मन ही मन की क्षमा याचना । भय वश की कुछ अजब कल्पना ।
पर जो उर में बात उठी उसको मिटा नहीं पाई ।
क्योंकि मन कहता यही रहा : "यही इस युग की सच्चाई ।"
छोड़ गीता व मास-पारायण, लिया हाथ में इंगलिश व्याकरण ।
छोड़ सुबह का सब पूजन, बच्चों को करवाने लगी रिवीज़न ।
कुछ मन में खटका भी आया । कुछ मन भारी सा हो आया ।
पर लगा कि मेरे मेडिटेशन का समय अभी तक नहीं है आया ।
अनायास कुछ गया मिल । मन मेरा सहसा गया खिल ।
लगा मानो पूरे हो गये मेरे सभी माला औ जप ।
जैसे मेरे लिये यही वह मार्ग कहते जिसे हैं सब तप ।
बच्चों से जिसका पाठ कराया । माँ शारदा का ध्यान धराया ।
हर शब्द जो मैंने पढ़ाया । उसमें ओम नज़र आया ।
गायत्री का था गुंजन । सरस्वती का था वंदन ।
अजब शांति का आभास था । चारों ओर प्रकाश था ।
बहुत शांत था मेरा मन । मानो कर लिया पूजन ।
पूर्ण हो गया जैसे पारायण । मिल गये मानो मेरे मन-मोहन ।
लगा मानो पूरे हो गये मेरे सभी माला औ जप ।
जैसे मेरे लिये यही वह मार्ग कहते जिसे हैं सब तप ।
बच्चों से जिसका पाठ कराया । माँ शारदा का ध्यान धराया ।
हर शब्द जो मैंने पढ़ाया । उसमें ओम नज़र आया ।
गायत्री का था गुंजन । सरस्वती का था वंदन ।
अजब शांति का आभास था । चारों ओर प्रकाश था ।
बहुत शांत था मेरा मन । मानो कर लिया पूजन ।
पूर्ण हो गया जैसे पारायण । मिल गये मानो मेरे मन-मोहन ।
- सरस्वती जोशी
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