Monday, December 8, 2014

मोह का भ्रम-जाल

मोह का भ्रम-जाल
जब वे आये थे जीवन में, तो उनके प्रथम दर्शन ने ही,
कुछ ऐसा अहसास दिया के हमें अपना, अपने,
अपनी मंजिल, सब कुछ उन्हीं में दिखने लगा । 
जग औ जग को मान मिथ्या, अनासक्त बन जीने का,
हर बार, हर उपदेश हमको फीका सा लगने लगा ।
मान अपने जप-तप का फल, हम उनमें ही डूब गये ।
दिन महीने बरस कितने बस ऐसे ही बीत गये ।
भूल कर हर सत्य जगत का सब सपने उनसे जोड़ दिये ।
अपने हँसने के सब बहाने बस उनकी दिशा मे मोड़ दिये ।
उनमें ही रब दिखने लगा, बाकी सब अरमाँ छोड़ दिये ।
रिश्तों के उस मोह-जाल में प्रभु से भी नाते तोड़ लिये ।
भूले क्षणभंगुर जीवन की बातें, उनने कुछ ऐसा प्यार दिया ।
जग के मोह में भ्रमित हुआ मन, हर अरमाँ उन पर वार दिया ।
पर धीरे-धीरे, जैसे-जैसे रिश्तों की परतें खुलती रहीं ।
सत्य का प्रकाश बिखरा मन में, आशा की धूनी जलती रही ।
हर परत को खुलते देख, पीड़ा की कसक जब हुई।
प्रश्नों का इक जाली सी आ-आ सामने बिछती रही ।
मानते हैं हमें इसका अहसास होना चाहिये था ।
बन कर के दूरदर्शी, सजग रहना चाहिये था ।
हम मोह-जाल में फँसे-फँसे शोषित होते ही रहे ।
माना हमारी मूर्खता थी, हम अपना सब खोते ही रहे ।
आया अचानक होश जब औ नींद से आँखें खुलीं ।
परोपकारिता, दया-धरम के उदेश खोखले से लगे ।
किस पर भरोसा करें किस पर नहीं ? ये प्रश्न उठने से लगे ।
हर खुलता परत, नया अनुभव ले, स्पष्ट सामने आ-आ कर,
नये सिरे से खोल रहा था नई जड़ता की कहानी ।
चकित उदास विकल हृदय से, आँसू से घावों को धोकर,
अबसे बुद्धू ना बन, कुछ साँसें निज हेतु ही जीने की हमने ठानी ।
हालाँ के संकल्प लिया था हमने, पर सत्य तो कुछ और है ।
निभा नहीं पाये हम उसको, संकल्प टूटता ही रहा ।
फिर कोई नई आस, मिथ्यापन होने पर भी ज्ञात,
हावी सी होती रही औ निज हेतु जीने का वादा पीछे छूटता ही रहा ।
बस अरमानों को पूरा करने को, उनमें ही लीन होते गये ।
अपने लिये सोचे क्षण सारे आगे सरकते ही गये ।
हर वर्तमान के अमूल्य क्षण औरों को देते ही गये ।
पड़ भ्रम में कभी भाई, कभी बहन, कभी बेटा, कभी बेटी,
कभी कुछ और नाम आ-आ कर के सूची में जुड़ते ही गये ।
सब कुछ दूरी तक के हमसफर ! दूर होते ही गये ।
और जब आँखें खुलीं तो निपट तन्हा रह गये ।
घिर आई है शाम औ दूर बहुत है अभी किनारा ।
सुध तो आ गई तारक की, हमने उसे है पुकारा ।
पर पूछ रहा है आज हमसे बार- बार हृदय हमारा :
"क्या उसको बुद्धू समझा है, क्या वह आ देगा सहारा ?"
- सरस्वती जोशी

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