Saturday, December 13, 2014

जीवन के रंग

जीवन के रंग
विश्व के चित्रपट पर देखते हैं,
नित्य इस जीवन को ।
जो लगता है चलचित्र सा ।
देता है आभास जैसे,
हो किस्सा किसी और का ।
अनजान से राहगीर का ।
जिसको नहीं हम जानते ।
अपना नहीं हम मानते ।
न वैसी लगती उसकी कथा ।
जिसकी थी हमें अपेक्षा ।
सहसा नेत्रपट खुल जाते हैं ।
उसके अनगिन पात्रों के बीच,
कहीं ख़ुद को ही खड़ा पाते हैं !
वेदना से भर कर,
कुछ सहम से जाते हैं !
फिर उसमें दिखते हुए,
किसी भग्न हृदय मानव पर,
हँस नहीं हम पाते हैं !
उस चल चित्र में जीवन के,
विभिन्न रंग दिख जाते हैं ।
हर रंग का कोई निशाँ,
हम अपने वसनों पर पाते हैं !
इन रंगों के भ्रमरजाल में,
कुछ ऐसे खो जाते हैं ।
के अपने-पराए का भान भूल,
सब रंगों में समा जाते हैं ।
ऐसे ही फँस कर भ्रमित हो,
संपूर्ण जीवन बिताते हैं ।
जग कर्ता की इस माया को,
समझ नहीं हम पाते हैं !
गर कभी भाग्य चमक उठता,
औ ज्ञान प्रकाश को पाते है ।
जाने क्यों कर अवहेलना,
हो मौन कहीं सो जाते हैं ।
जब जगते हैं तो होता है,
अपनी भूलों का आभास ।
पुन: एक मौका पाने का,
करने लगते हैं प्रयास ।
पर भूल-सुधार का मौका,
सबको नहीं मिल पाता है ।
और यूँ ही पछताता मानव,
छोड़ जगत को जाता है ।
पुन: प्रकट होने की आस में ।
अगली बार सतर्क रहने के,
मन में बँधे विश्वास में ।
पर "अगली बार" कब होगी ?
होगी भी या नहीं होगी ?
कोई नहीं है जानता ।
फिरभी मानव जाने क्यों,
सत्य को पहचान कर भी,
उन सत्यों से दूर भागता !
अंत:करण की आवाज़ तक को,
सुनकर भी नहीं मानता ।
- सरस्वती जोशी

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