माना के मानव जीवन तो है ही उलझनों का जंजाल ।
हर व्यक्ति के चारों ओर बना हुआ है माया जाल ।
जिधर भी देखो उधर दिखता सदा ही एक घेरा ।
जो रच देता है इर्दगिर्द एक घना सा अँधेरा ।
पर गर मानव धार ले तो शक्ति उसकी है अपार ।
फिर यह संभव नहीं के बाँध पाये अंधकार ।
जब प्रकाश की ज्योति ले वह बढ़ा देता है चरण ।
तो स्वत: सुलझ जाती पंथ की हर एक उलझन ।
और वह बढ़ता जाता पूर्ण रूप से शांत मन ।
पहुँच जाता लक्ष्य तक कर पार सारे सघन वन ।
सरस्वती जोशी
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