क्या सारे गमों को जगती लिख पाती है ?
क्या दीवारें परदुख समझ पाती हैं?
मैंने सुना : वे रोती नहीं, तत्काल ही औरों को सुनाती हैं ।
परदुख को परिहस की सामग्री बनाती हैं ।
उन हासों-परिहासों से नींद और जल्दी जग जाती है ।
उर को और अधिक विचलित सा कर जाती है ।
बस फिर आँखें नींद से दूर जा आँसू बहाती हैं ।
दीवारों की कठोरता पर चकित सी हो जाती हैं ।
और अपने भोलेपन पर मन ही मन पछताती हैं ।
- सरस्वती जोशी
क्या दीवारें परदुख समझ पाती हैं?
मैंने सुना : वे रोती नहीं, तत्काल ही औरों को सुनाती हैं ।
परदुख को परिहस की सामग्री बनाती हैं ।
उन हासों-परिहासों से नींद और जल्दी जग जाती है ।
उर को और अधिक विचलित सा कर जाती है ।
बस फिर आँखें नींद से दूर जा आँसू बहाती हैं ।
दीवारों की कठोरता पर चकित सी हो जाती हैं ।
और अपने भोलेपन पर मन ही मन पछताती हैं ।
- सरस्वती जोशी
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