माँ के समान हितैषी नहीं, माँ के समान गुरु नहीं !
एक बहुत धनवान, धर्मात्मा, सर्वगुण संपन्न व्यक्ति था । उसकी वृद्ध माँ उसके साथ रहती थी । वह अपनी माँ का बहुत ध्यान रखता था । माँ की हर ज़रूरत पूरी करता, लोग उसकी बहुत सराहना करते थे । एक दिन उसकी माँ को यह आभास हुआ कि बेटे को कुछ गर्व होने लगा है तो माँ ने कहा : "बेटे! क्या तुम्हें मालूम है कि तुम्हारे जीवन की इस अद्वितीय सफलता का रहस्य क्या है ? तुम्हारे पिता एक महात्मा थे । जब मैं गर्भवती हुई तो पूरे दिन होने पर उन्होंने मुझको बताया कि यदि अमुक दिन, अमुक समय पर बालक हुआ तो वह बहुत भाग्यशाली होगा । लेकिन उनके बताए समय से कुछ समय पहले ही मेरे प्रसव पीड़ा प्रारंभ हो गई । मुझे पता चला कि यदि इन कुछ घंटों में बालक हो गया तो वह मंद-बुद्धि व मंद-भागी होगा । तो मैंने दाई को बुला कर कहा : "तुम मुझे पैर ऊपर करके उल्टा लटका दो, कुछ भी हो जाए, मुझे कितनी भी पीड़ा सहनी पड़े, पर अमुक समय से पहले मेरे बच्चा नहीं होना चाहिये ।" दाई मेरे कहने के अनुसार करती रही और मैं प्रसव पीड़ा सहती हुई शुभ समय की प्रतीक्षा करती रही । धीरे-धीरे शुभ घड़ी आई और शुभ ग्रहों में तुम्हारा आगमन हुआ । बेटे ! मैंने तुम्हारे कल्याण हेतु जो पीड़ा सही तुम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते सो यदि तुम मेरे साथ यह सदव्यवहार मेरा रिण चुकाने की मंशा से कर रहे हो तो वह रिण तुम कभी नहीं चुका पाओगे । यदि तुम मेरे लिये जो कुछ भी कर रहे हो वह मेरे प्रति स्नेह के वशीभूत हो कर कर रहे हो तो मैं तुम्हारे इस स्नेह की सदा रिणी रहूँगी और मुझे सदा तुम पर गर्व होगा, पर यह मत भूलना कि संसार का कोई भी पुत्र माँ का रिण नहीं चुका सकता ।" माँ की बात सुन कर बेटा बोला : "माँ ! तुझे कैसे पता चला कि मेरे मन में सचमुच गर्व का बीजारोपण होने लगा था ? सच ही कहा है कि माँ के समान कोई हितैषी नहीं, माँ के समान कोई गुरु नहीं !
- सरस्वती जोशी
एक बहुत धनवान, धर्मात्मा, सर्वगुण संपन्न व्यक्ति था । उसकी वृद्ध माँ उसके साथ रहती थी । वह अपनी माँ का बहुत ध्यान रखता था । माँ की हर ज़रूरत पूरी करता, लोग उसकी बहुत सराहना करते थे । एक दिन उसकी माँ को यह आभास हुआ कि बेटे को कुछ गर्व होने लगा है तो माँ ने कहा : "बेटे! क्या तुम्हें मालूम है कि तुम्हारे जीवन की इस अद्वितीय सफलता का रहस्य क्या है ? तुम्हारे पिता एक महात्मा थे । जब मैं गर्भवती हुई तो पूरे दिन होने पर उन्होंने मुझको बताया कि यदि अमुक दिन, अमुक समय पर बालक हुआ तो वह बहुत भाग्यशाली होगा । लेकिन उनके बताए समय से कुछ समय पहले ही मेरे प्रसव पीड़ा प्रारंभ हो गई । मुझे पता चला कि यदि इन कुछ घंटों में बालक हो गया तो वह मंद-बुद्धि व मंद-भागी होगा । तो मैंने दाई को बुला कर कहा : "तुम मुझे पैर ऊपर करके उल्टा लटका दो, कुछ भी हो जाए, मुझे कितनी भी पीड़ा सहनी पड़े, पर अमुक समय से पहले मेरे बच्चा नहीं होना चाहिये ।" दाई मेरे कहने के अनुसार करती रही और मैं प्रसव पीड़ा सहती हुई शुभ समय की प्रतीक्षा करती रही । धीरे-धीरे शुभ घड़ी आई और शुभ ग्रहों में तुम्हारा आगमन हुआ । बेटे ! मैंने तुम्हारे कल्याण हेतु जो पीड़ा सही तुम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते सो यदि तुम मेरे साथ यह सदव्यवहार मेरा रिण चुकाने की मंशा से कर रहे हो तो वह रिण तुम कभी नहीं चुका पाओगे । यदि तुम मेरे लिये जो कुछ भी कर रहे हो वह मेरे प्रति स्नेह के वशीभूत हो कर कर रहे हो तो मैं तुम्हारे इस स्नेह की सदा रिणी रहूँगी और मुझे सदा तुम पर गर्व होगा, पर यह मत भूलना कि संसार का कोई भी पुत्र माँ का रिण नहीं चुका सकता ।" माँ की बात सुन कर बेटा बोला : "माँ ! तुझे कैसे पता चला कि मेरे मन में सचमुच गर्व का बीजारोपण होने लगा था ? सच ही कहा है कि माँ के समान कोई हितैषी नहीं, माँ के समान कोई गुरु नहीं !
- सरस्वती जोशी
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