Monday, December 8, 2014

वे चुभते शूल

वे चुभते शूल
उन पथ के काँटों को,
या उन्हें बिछानेवालों को धन्यवाद कैसे बोलें ?
उन शूलों को "अनायास ही आई बाधा" कर-कर के कैसे तोलें ?
है मालूम हमें के उनको सोच-सोच बिछाया था ।
पग-पग पर इसी तरह से यह मार्ग अगम्य बनाया था ।
उन्हें पार करने में आँचल आँसू से भर-भर आया था ।
पग-पग पर गिरते अश्रु देख, मुक्त कंठ से उपहास उड़ाया था ।
हमें रोकने का एक सबल, दृढ़ स्वप्न भी सजाया था ।
बेबस से होकर मदद हेतु यह हाथ भी बढ़ाया था ।
पर हमने अपने को उस पल में निपट असहाय ही पाया था ।
औ कर साहस आगे बढ़े तो कदम भी लड़खड़ाया था ।
माना के आज उन्हीं काँटों से, कंटक पर चलना सीख लिया।
शक्ति जुटाने की ट्रेनिंग पा, मार्ग बनाना सीख लिया ।
पर उनसे उभरे घावों का उपचार कहीं ना मिल पाया ।
उस पीड़ा को हर पाये ऐसा वैद्य नज़र नहीं आया ।
फिरभी उन चुभते शूलों को सादर शीश झुकाते हैं ।
उनसे रिसता दर्द सदा ही इन रचनाओं में पाते हैं ।
- सरस्वती जोशी

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