Wednesday, October 8, 2014

प्रेम की याचना

प्रेम की याचना 
क्यों माँगें हम याचक बन-बन हर समय प्रेम की भीख ? 
क्या वेदना की तड़प से नहीं पाये हम कुछ सीख ? 
क्यों न रँगलें चुनर अपनी हम स्वयं खुद के लिये ? 
क्यें न हम ख़ुद ही जलालें अंत:पुर में कुछ ऐसे दिये ?
कि फिर न तरसे उर हमारा यूँ किसी के भी लिये !
क्यों करें यह पराधीनता इस तरह झुक कर स्वीकार ?
कि कर सके कोई हमारा इस तरह इतना प्रतिकार !
क्या जीवन नाम इसी का है, करते रहें अपना समर्पण ?
और बदले में मिले पग-पग पर विरह की ज्वलित तपन !
नहीं ! अब और नहीं ! यह एक तरफ का अविरत अर्पण !
एक तरफा मिलते सदा से ये निरंतर थोपे बंधन !
हम मुक्त हो कर साँस लेंगे इक स्वच्छ नीले से गगन में ।
अब नहीं यूँ हम धरेंगे शीश झुक-झुक कर चरण में ।
माना वे उन्नत शिखर से, विशाल नील अंबर से हैं ।
पर हम भी धरा से धैर्यवान, गंभीर विस्तृत सागर से हैं ।
अब न हम यूँ याचना कर-कर झोली को फैलाएँगे ।
गर पड़े चलना अकेले तो वह भी हम सीख जाएँगे ।
शक्ति कहलाते आये हैं क्यों भूलें यूँ अात्म-सम्मान ?
क्यों पग-पग पर भुगतें भला यह अवहेलना भरा अपमान ?
सरस्वती जोशी

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