Tuesday, September 16, 2014

हे जग रचियता ! एक बार बनो "नारी"

हे जग रचियता ! एक बार बनो "नारी"
हे जग रचियता ! 
एक बार बनो "नारी",
आ जग में ले लो अवतार । 
जब तक ऐसा नहीं करोगे,
तुम्हारा पर-पीड़ा का अनुभव बेकार ।

माँ की कोख में आते ही,
अनचाही मैं कहलाती हूँ । 
कुछ सिक्कों के बदले में मैं,
खुले आम मारी जाती हूँ ।

गर किसी पुण्य से नौ महीने तक,
जीवित रह जग में आती हूँ । 
तो जिस घर में हो जन्म लिया,
वहीं "परधन" कहलाती हूँ ।

मैं पुत्र नहीं, अनपेक्षित हूँ,
पग-पग पर करती यह अहसास । 
बचपन से ही ट्रेनिंग मिलती : 
"जाने कैसी होगी सास ।

जाने कैसा पति मिलेगा, " 
सो सीख मुझे उसकी मिलती ।
एक बार तुम भी यह सीखो,
हे जगकर्ता ! है यह विनती ।

यह घर तो है मैका केवल ।
पग-पग पर अहसास करोगे ।
गर इक पल को भी चूक गये तो,
लंबा सा उपदेश सुनोगे ।

पितृगृह होता पराया,
यहाँ नहीं कुछ मेरा अपना । 
जन्म लेने को इक जगह चाहिये,
पर जीवन भर नहीं है रहना ।

पतिगृह पर तब तक अधिकार,
जब तक मैं पति को स्वीकार ।
उसके मन को जीत सकूँ ना,
तो मेरा जीवन निस्सार ।

गर उसका मन जीत न पाऊँ,
वह किस्मत से देवे छोड़ ।
तो मैं सबसे अभागिन प्राणी,
सब लेते मुझसे मुँह मोड़ ।

शास्त्र भी तुम्हारे यही सिखाते,
मान अभागिन हैं ठुकराते ।
माँ बनना भी वे मेरे,
जीवन का प्रमुख लक्ष्य बताते ।

मेरी शिक्षा-दीक्षा-योग्यता,
कोई महत्व नहीं रखती ।
उसे सोच महत्व मेरा,
नहीं तोलती है यह जगती ।

चाहे बन विदुषी महिला मैं,
बन जाऊँ मंत्री या अफसर ।
हों चाहे मुझमें गुण सारे,
नही रखूँ कोई भी कसर ।

पर मेरी शुभता-अशुभता के,
माप-दंड पुरुषों पर निर्भर ।
मिले मान्यता मुझको या ना,
यह है पति-पुत्र-भाई पर निर्भर ।

बस उनका अस्तित्व ही मानो,
है मेरे जीवन का सार ।
उनसे विहीन जो हो जाउँ तो,
कहलाती भाग्य-हीन हर बार ।

कितना कठिन होता है प्रभुवर !
इस पीड़ा के साथ में जीना ।
अवहेलना का विष जब हर पल,
पग-पग पर पड़ता है पीना ।

दीनबंधु कहलाते हो तो हरि !
कुछ दिन तो ख़ुद भी दीन बनो ।
उनके जीवन की सच्चाई का,
आ तुम भी अनुभव स्वयं करो ।

एक बार तुम भी तो आ कर,
इस व्यथा में काटो दिन चार ।
इसके बिना तुम्हें करुणामय !
दीन-वत्सल कहने में क्या सार ?

सरस्वती जोशी
अबला जीवन ! हाय ! तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध आँख में पानी । (जय शंकर प्रसाद) । वह इष्टदेव के मंदिर की पूजा सी, दीप शिखा सी शांत, दलित, भारत की विधवा है । ( सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला") । कस विधि सृजी नारि जग माँही, पराधीन सपनेहु सुख नाहीं । (गोस्वामी तुलसीदास) । अगले जनम मोहें बिटिया न कीजो... (फिल्म का गाना, शायद उमराव जान का ), मैं तो बाबुल तेरे खूँटे की गैया बाँधे वहीं बँध जाँय, तेरे जल की मछरिया तड़प-तड़प रह जायँ, तेरे बागों की चिड़िया़ ढेला मारे उड़ जायँ... (लोक गीत)।

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