Tuesday, September 16, 2014

समाज क्या कहेगा !

समाज क्या कहेगा !
प्रभु ने ख़ुश हो मानव बनाया !
कितने गुणों से उसे सजाया !
पर मानव ने समाज बना़या ।
मन मंदिर में उसे बिठाया ।
और भला वह क्यों ना करता ?
भगवान भरोसे कब तक रहता ?
वह प्रभु जो मूरत में छिपता ।
लाख प्रयत्न करें ना दिखता ।
पर समाज से सब कुछ मिलता ।
उस में ही वह बेटी ब्याहता ।
बहू भी समाज से लाता ।
उससे अपना वंश बढ़ाता ।
मान-सम्मान वही़ीं है पाता ।
वही तो उँचे पद दिलवाता ।
कैसे भी लक्ष्मी को लाओ ।
कोई भी साधन अपनाओ ।
बस तुम लक्ष्मी-पति बन जाओ ।
मन खोल उसकी रस्में निभाओ ।
जो उनका पालन ना कर पाओ ।
तो चुप-चुप आसन से उठ जाओ ।
अपनी सीमा लो पहचान !
सीमा सम होगा सम्मान !
कैसे भला मान गँवाएँ ?
कैसे नीचे बैठ जाएँ ?
लोग इसे तो समझ न पाते ।
"समाज क्या कहेगा ?" यूँ दोहराते ।
जैसे समाज से डरना भूल !
देख इसे चुभता है शूल ।
कहते : "देखो ! प्रभु से डरना !
जो वह चाहे सो ही करना !"
"अरे प्रभु कौन भाग जायगा ?
जब बुलाओ आ ही जायगा ।
अंतिम साँस में भी पुकारो ।
एक दो आवाज़ें मारो ।
भोला- भाला दौड़ आयगा।
नाव पार करके ही जायगा ।
पर समज की बात है न्यारी ।
उससे निभानी रिश्तेदारी ।"
सो मित्रो ! यह भय सदा रहेगा ।
"ध्यान रखना ! समाज क्या कहेगा !"
सरस्वती जोशी

No comments:

Post a Comment