Monday, June 16, 2014

परित्यक्ता

हिंदू नारी के परंपरावादी संस्कारों के समस्त प्रभावों को, उसकी मानसिकता को, उसको बचपन से मिली शिक्षा को भूल उसे आधुनिकता के रंगों से रंगी विदेशी सभ्यता के दृष्टिकोण से देख उसके भविष्य को निर्धारित कर देना, और सोचना हम आगे बढ़ गये हैं हर क्षेत्र में, सचमुच हम बहुत आगे बढ़ गये हैं! अति से भी परे...
परित्यक्ता
शाम ढलने को आई थी ।
सिंदूरी लाली आसमान में छाई थी ।
एक कुलवधू वहाँ न्यायालय में आई थी ।
अजीब सी उदासी उस के मुख पर छाई थी ।
न्यायाधीष ने उसके तोड़ दिये सब बंधन ।
पति परित्यक्ता, ना पत्नी, ना बहू किसीकी, 
बंद द्वार थे इन रिशतों के, था सामने खुला आँगन ।
कहीं जाए, कुछ भी करे, सामने थी अंत-हीन राह ।
हालाँके मन में नहीं बची थी, अब आगे बढ़ने की चाह ।
फिरभी "जी सकती हूँ अब भी अकेली,"
प्रबल थी यह दिखाने की भावना । 
"रोटी की मोहताज नहीं मैं," सिद्ध करने की कामना ।
विचित्र सी लंबी काली रात, नहीं दूर तक प्रभात ।
निपट अकेला राही, न कोई हमसफर, 
न कोई संगी, न कोई साथ ।
भव के हर हाथ ने छोड़ दिया था साथ ।
तब भी मन करता था, निभाए परंपरा के नियम ।
दिखा सके आज भी "हम पाल सकते हैं संयम ।"
बुद्धिपक्ष से जकड़ी, स्वाभिमान से अकड़ी ।
गरिमाओं की गुलाम, वह नारी नहीं थी आम ।
चीखना-चिल्लाना, करना विलाप,
कहलाता है यह सब, गँवारों का प्रलाप ।
मौन की बंदी बनी, विषाद के रंग में सनी ।
चली जा रही थी, उस पथ पर कहीं ।
वही जो कुछ ही समय पहले सुंदर सी दुल्हन बनी ।
मेहँदी का रंग अभी छूटा नहीं था ।
पायल का घुंघरू कोई टूटा नहीं था ।
उस बियाबान में उठते पग-पग पर,
रुनझुन कर देती थी झनकार जग-जग कर ।
उर में भरा था खारे जल का समंदर ।
बह-बह कर आ रहा था आँखों के अंदर ।
कभी मन करता करे कोई ऐसा चीत्कार,
फट जाय धरती, समाए संसार ।
पर "बुद्धिजीवी, विदुषी हूँ मैं," मन में उठ जाती यह बात ।
स्वाभिमान उसका आ करके, पकड़ रहा था उसका हाथ ।
कब तक चलेगा यह सफर, है ना जिसका पारावार ।
अंत जिसका दिखता नहीं, लगता था मानो पहुँची हो केवल मझधार ।
हो सकता है एक दिन कोई भटका पंथी मिल जाय कहीं ।
"पर कौन, कैसा, आ उसे लेजायगा जाने कहीं !" 
सोच कर ही काँपती रुह औ आस थमती वहीं ।
संस्कारों में जकड़ी उस पर विश्वास कर पाएगी या नहीं ?
कितने प्रश्न खड़े बन रोड़े आगे उसकी राह में ।
फिलहाल तो बस बढ़ रही है अकेले चल पाने की चाह में ।
"मैं भी अकेली चल सकती हूँ इस जीवन की राह में,
रोटी की मोहताज नहीं मैं, है शक्ति मेरे पाँव में ।
इस अंत हीन राह में, होगा अनंत मेरे साथ में ।"
यह दिखा पाएगी, बस इसी विश्वास में ।
"वह अनंत देगा बल मुझको, 
बन पाऊँगी सीता मैं भी," है डूबी इस आस में ।
और बस चली जा रही, चलती रहेगी जाने कब तक ।
यूँ ही अकेली, शायद कभी ओझल हो जाए,
दूर कहीं, क्षितिज के उस पार जाती-जाती, 
डूब जाए कहीं, सूरज की डूबती लाली में, 
या घिरती शाम के अँधियारे में, 
क्या होगी नियति उसकी ? पता नहीं ।
पर हम क्यों सोचें ! हमें कितने काम हैं ।
व्यस्त जीवन है हमारा,
और कुछ ही देर में होनेवाली शाम है...
सरस्वती जोशी

1 comment:

  1. ढ़लते ही सूरज आज का दिन भी चला जायेगा।
    कल फिर सूरज आयेगा।
    फिर वहीं दिनचर्या हमारी।
    फिर वहीं हमारे हजारों काम।
    हमारी नजर में वो परित्यक्ता नारी बेचारी है।
    पर यह कहानी नहीं ये सामाजिकता बनी हमारी है।
    स्वार्थ की बरसात है, लोभ की बाढ़ सबको बहा रही है।
    पूछता है कवि दिल सम्पत रो-रोकर समाज से
    हमारी से सोच हमें कहा ले जा रही है?
    भगवान ना करे कल अगर हमारे अपनों के साथ हो गया तो।
    फिर मत कहना कि हे समाज कहां खो गया तो।
    इसलिए आज अगर किसी के साथ बुरा हुआ है तो आवाज
    उठानी पड़ेगी।
    सबकों संगठित होकर जागना होगा, अलख सबमें जगानी पड़ेगी।
    जब जाकर एक सुन्दर शाम होगी!
    एक नया सवेरा आयेगा।

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