Thursday, June 26, 2014

सब कहते : "मत इतना बोल !"

सब कहते : "मत इतना बोल !"


सब कहते : "मत इतना बोल !
अपने मन से लिपटे आँसू, सबके आगे ना तू खोल !...


कितनी महँगी होतीं सबकी घड़ियाँ जो बीती जाती हैं ?
उनको लेने को लालायित हो कर के तू क्या पाती है ?"
कितनी बार सुना समझा यह : "जीवन का हर क्षण अनमोल ।...

अपनी ही बीती साँसों से अपने पन को दूर करो !
अपने जीवन की आहों को विस्मित कर कुछ और करो !
आगे बीते जाते हर पल छिन को भी देखो तुम तोल !..."

जो यह सच है तो फिर बीते पल-छिन का क्या मोल नहीं ?
वे आँसू भीगी घड़ियाँ जो बीतीं क्या अनमोल नहीं ?
फिर उनको कैसे ठुकरा दूँ ? कह कर के : "तेरा क्या मोल ?"...

मुझको तो ना दिखता है के : "कहाँ आज है, कहाँ अतीत ?"
"है, होना है, और हुआ है," इसके अंतर की लकीर ।
सब कुछ एक बिंदु सा लगता, जो है जुड़ा हुआ सा गोल ।...

लेकिन है मंज़ूर मुझे के यह सब करना है इक भूल ।
अपने स्वारथ की खातिर मैं क्यों दिखलाऊँ सब को शूल ?
और निरंतर यही चाहती, फिर भी मन जाता है डोल !...

सरस्वती जोशी

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