Saturday, June 21, 2014

आज फिर रात हो गयी। and तो इस क्षण को क्यों ना अमर बनायें !

ye maine likha (Sampat sharma ne )
आज का दिन भी चला गया दोस्तों!
सुबह से लेकर आज फिर षाम हो गयी।
आज फिर रात हो गयी।
लग तो ऐसे रहा है कि अभी-अभी तो जागे थे।
अभी-अभी ही कर्मयोग के लिये भागे थे।
पता ही नहीं चला पूरा दिन बीत गया
आज फिर रात हो गयी।
ऐसे ही जिदंगी गुजर जानी है दोस्तों
लोग सच बोलते है चार दिन की कहानी है दोस्तों
साथ तो अपना कर्म ही जाना है।
बाकी सब यही रह जाना है।
जो कुछ कमाया, गवायां सब यही का था
यही वापस लौटाया।
कल फिर सूरज आयेगा....हम सब बोलेगे प्रभात हो गई
षुभ रात्री दोस्तों....आज फिर रात हो गयी - सम्पत षर्मा


(ye didi ne likha hai ) 


रातें तो यूँ ही जाएँगी, इनका काम है आना-जाना ।
 इनको समयाभाव नहीं पर हमको तो अल्प समय में जगत छोड़ कर जाना ।
 इसका अर्थ यह तो नहीं कि हम हताश हो घबरायें ।
 ज्ञात है जीवन क्षण-भंगुर, तो इस क्षण को क्यों ना अमर बनायें ! 
जीव जगत की माया में बस एक ही क्षण में फँसता ।
 पर जगती से मुक्ति में भी उतना ही क्षण लगता ।
 क्षण का अवमूल्यन ना कर यदि उसकी गरिमा समझ सकेंगे । 
तो अपनी क्षण-भंगरता में भी छाप छोड़ जगती छोड़ेंगे ।

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