बेटी बचाओ
हर बार जब देखती हूँ : "बेटी बचाओ।",
तो सुन पड़ती है एक विवश नन्ही चीत्कार ।
जो मचा देती अंतर में भीषण हाहाकार ।
कोई कहता: "केवल दादी-बुआ हैं ज़िम्मेदार ।"
कोई कहता: "यदि माँ चाहे तो कर सकती फौरन उद्धार ।"
तो क्या भारत की माँएँ बन बैठीं इतनी नादान ?
खुशी-खुशी दे देती हैं अपनी कन्या का बलिदान ?
है आखिर क्या मज़बूरी उनकी जिसने गौरी को काली बनाया?
मिटा हृदय के मातृ-भाव को कन्या-बलि का पाठ पढ़ाया ?
नारी सुलभ कोमल हृदय में ऐसा जघन्य पाप उकसाया !
क्यों पुरुष, ससुर-पिता-पति उसको हाथ पकड़ कर रोक न पाया ?
या वह भी सहमत है लेकिन नारी को निमित्त ठहराया ?
सरस्वती जोशी
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