Saturday, June 21, 2014

बेटी बचाओ



बेटी बचाओ

हर बार जब देखती हूँ : "बेटी बचाओ।",
तो सुन पड़ती है एक विवश नन्ही चीत्कार । 
जो मचा देती अंतर में भीषण हाहाकार ।


कोई कहता: "केवल दादी-बुआ हैं ज़िम्मेदार ।" 
कोई कहता: "यदि माँ चाहे तो कर सकती फौरन उद्धार ।" 
तो क्या भारत की माँएँ बन बैठीं इतनी नादान ? 
खुशी-खुशी दे देती हैं अपनी कन्या का बलिदान ?

है आखिर क्या मज़बूरी उनकी जिसने गौरी को काली बनाया? 
मिटा हृदय के मातृ-भाव को कन्या-बलि का पाठ पढ़ाया ? 
नारी सुलभ कोमल हृदय में ऐसा जघन्य पाप उकसाया ! 
क्यों पुरुष, ससुर-पिता-पति उसको हाथ पकड़ कर रोक न पाया ? 
या वह भी सहमत है लेकिन नारी को निमित्त ठहराया ? 
सरस्वती जोशी
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