Friday, June 20, 2014

जाने कब उसके त्याग को समझेगा संसार ।- बेटी

बेटी पर-धन
बेटी को पराये घर होता है जाना ।
उसके कारण परिवार को सिर पड़ता झुकाना ।
पग-पग पर उसके हेतु खर्चे निभाना ।
बस में नहीं पिता के वंश को बढ़ाना ।
हालाँके ये नियम उसने नहीं बनाये ।
पर अनायास ये सब उसके हिस्से में आये ।
समझ नहीं पाती कैसे इन्हें मिटाये ।
"मैं नहीं भार तुम पर..." यह भरोसा दिलाये ।
समझ कर सचाई सदा शांत रहती ।
"जन्म-स्थान भी पराया..." स्वीकार करती । 



पति-गृह में "लक्ष्मी-रूपी दासी", पितृ-गृह में पराई ।
है वह यह नियति ले करके आई ।
है फिरभी वह दोनों की शक्ति ।
करती सदा ही दोनों की भक्ति ।
नदिया सी बहती है दोनों के बीच ।
फैलाती खुशियाँ दोनों को सींच ।
दोनों की प्रतिष्ठा जुड़ी उसके साथ ।
जो खींच ले जरा भी वह अपना हाथ ।
तो भूचाल आ जाय दोनों घरों में ।
ज्ञात है चाहे कहें ना ऊँचे स्वरों में ।
कर्तव्य-पथ पे यूँ ही बहती है आई ।
दोनों तटों को हरियाली दी है सदा ही ।
पर जग मान्यता ना दे कहता है भार ।
जाने कब उसके त्याग को समझेगा संसार ।
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