जीवन के शाश्वत सत्य को निराशा के स्वर मे क्यों सुनाएँ !
क्यों न जबतक "बुलबुला" है हम उसमें भी शक्ति जगाएँ ?
क्षणभंगुर ही सही पर जीवन अपना अस्तित्व तो रखता है ।
इन क्षणभंगुरता के अल्प क्षणों में भी जग ज्योतिर्मय कर सकता है ।
सरस्वती जोशी

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