Monday, June 30, 2014

स्नेह सौरभ के पुष्प उगाएँ !


केवल गुस्सा ही नहीं कई बार तरस सा आता है उस सोच पर ।

जो मानव को मानव से रखती है दूर कर ।

बीच में लोगों के बना देती है एक खाई । 

जो युगों से बन रही दुनिया उसे न पाट पाई । 

उसके किनारों पर कँटीली घास उगती चली गई । 

मानव से मानव में दूरी की आग बढ़ती चली गई ।

सूर्य-चंद्र के लोकों में जाने के देखे सपने ।

पर पहले यह ना समझा के धरती के लोग हैं अपने ।

आओ पहले इस धरती से काँटों के झाड़ मिटाएँ । 

ईश दरश हो हर प्राणी में, स्नेह सौरभ के पुष्प उगाएँ !

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