केवल गुस्सा ही नहीं कई बार तरस सा आता है उस सोच पर ।
जो मानव को मानव से रखती है दूर कर ।
बीच में लोगों के बना देती है एक खाई ।
जो युगों से बन रही दुनिया उसे न पाट पाई ।
उसके किनारों पर कँटीली घास उगती चली गई ।
मानव से मानव में दूरी की आग बढ़ती चली गई ।
सूर्य-चंद्र के लोकों में जाने के देखे सपने ।
पर पहले यह ना समझा के धरती के लोग हैं अपने ।
आओ पहले इस धरती से काँटों के झाड़ मिटाएँ ।
ईश दरश हो हर प्राणी में, स्नेह सौरभ के पुष्प उगाएँ !
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