क्यूँ घिर आया बादल गहरा !
क्यूँ घिर आया बादल गहरा !
क्यूँ फिर से छाया यह कोहरा !
यह रेतीली बंजर भूमि,
क्यूँ इस पर सावन लहराया !
कितनी बार यूँ ही जल बरसा,
पर न यहाँ हरियाली आई ।
कितने सावन आ-आ निकले,
पर न यहाँ चली पुरवाई ।
गर कोई पौध निकल भी आई,
खिलने से पहले मुरझाई ।
नियति यहाँ की ऐसी ही है,
क्यूँ ये घटाएँ समझ न पाईं !
खोने को अपना अमृत सम जल,
क्यूँ ये घिर-घिर कर लहराईं !
सरस्वती जोशी

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