Monday, June 16, 2014

उस दिन जब तन्हाई टूटी,

जाति प्रथा 

जब रिश्तों के भ्रम टूट गये । 
जिनको पक्का अपना माना, 
वे भी पीछे छूट गये । 
तो अनायास ही सुध आई, 
अपने समाज के लोगों की, 
मन को इक राहत मिली, 
अब कमी नहीं थी रिश्तों की । 
भाई, बेटा, चाचा, ताऊ,
हम जो चाहें कह सकते थे । 
और सभी में सरल स्नेह के, 
सुंदर भाव झलकते थे । 
मानों जग ही बदल गया, 
भय न रहा तन्हाई का । 
हर इक बढ़ते हाथ में, 
आभास हुआ था भाई का । 
विधवा हो या परित्यक्ता, 
या हो पति द्वारा ठुकराई ।
हर अबला को संभव है, 
एक कोई रक्षक भाई ।
रिशतों का अभाव नहीं,
पर कहीं कोई दबाव नहीं ।
एक बड़ा परिवार यहाँ, 
कोई स्वार्थ का भाव नहीं ।
जाति प्रथा को बुरा मानते, 
लेख कई पढ़ने में आये । 
पर उस दिन जब तन्हाई टूटी, 
तो असली अर्थ समझ में आये । 
सरस्वती जोशी

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