जाति प्रथा
जब रिश्तों के भ्रम टूट गये ।
जिनको पक्का अपना माना,
वे भी पीछे छूट गये ।
तो अनायास ही सुध आई,
अपने समाज के लोगों की,
मन को इक राहत मिली,
अब कमी नहीं थी रिश्तों की ।
भाई, बेटा, चाचा, ताऊ,
हम जो चाहें कह सकते थे ।
और सभी में सरल स्नेह के,
सुंदर भाव झलकते थे ।
मानों जग ही बदल गया,
हर इक बढ़ते हाथ में,
आभास हुआ था भाई का ।
विधवा हो या परित्यक्ता,
या हो पति द्वारा ठुकराई ।
हर अबला को संभव है,
एक कोई रक्षक भाई ।
रिशतों का अभाव नहीं,
पर कहीं कोई दबाव नहीं ।
एक बड़ा परिवार यहाँ,
कोई स्वार्थ का भाव नहीं ।
जाति प्रथा को बुरा मानते,
लेख कई पढ़ने में आये ।
पर उस दिन जब तन्हाई टूटी,
तो असली अर्थ समझ में आये ।
सरस्वती जोशी

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