ओ मेरी बगिया के पौधे सूखा-सूखा क्यूँ रहता है ?
ओ मेरी बगिया के पौधे सूखा-सूखा क्यूँ रहता है ?
आ तुझको सींचूँ उस जल से गंगाजल सा जो बहता है ।
तू मेरे जीवन की थाती, तू मेरा नन्हा संसार,
तू ही मेरे सारे तप का महका-महका सा है सार ।
तेरा यह मुरझाना मेरे अंतर को विचलित करता है ।
कितनी आशा से बोया था, मन में ले कर बड़ी उमंग,
तुझको बढ़ते देख-देख कर, खिल जाता मेरा हर अंग,
देने को अब अपना सौरभ, तरसाता सा क्यूँ रहता है ?
तू मेरा वह नन्हा दीपक, ज्योतिर्मय जिस से आँगन है ।
तुझे स्नेह-कण से सींचूँ, इसी लिये तो यह जीवन है ।
आ आँचल की ओट में लेलूँ, तूफाँ तुझको क्यूँ छूता है ?
डर ना, मेरे उर में वह जल जिसका पारावार नहीं है ।
इसमें है बस अमृत बहता, कहीं नाम को क्षार नहीं है ।
कभी न सूखेगा यह सागर, जो अथाह सा लहराता है ।
ओ मेरी बगिया के पौधे ...
सरस्वती जोशी

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