Monday, June 16, 2014

ये मित्रता की कड़ियाँ,



मेरे  मित्रो

ये मित्रता की कड़ियाँ,
ये स्मृतियों की सुंदर लड़ियाँ ।
ये दूर-दूर रह संग-संग बीती,
जीवन की कुछ नन्ही घड़ियाँ ।
ये विचारों के आदान-प्रदान,
ये खट्टी-मीठी सी बातें,
ये रूठने-मनने की सौगातें ।
ये अनजान-अजनवी जन के,
चिर-परिचित से बनते नाते ।
एक लड़ी में बँधे मोतियों से,
जो सब के मन को हैं भाते ।


इतना तो है ज्ञात सभी को,
कभी सभी ना मिल पायेंगे ।
मिलने के सब वादे सच में,
मिथ्या हैं, मिथ्या रह जायेंगे ।
पर मालूम हमें है के जब,
कोई भी कम हो जाएगा ।
चाहे वैसे ना भाया हो,
पर उस दिन सुन आँसू आएगा ।
यह है अलग अनोखा रिश्ता,
इसको सदा निभाएँगे ।
रक्षाबंधन के दिन सब की,
मन से कुशल मनाएँगे ।
सरस्वती जोशी
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