Monday, June 16, 2014

कृष्ण प्रेम में रंगी घटाएँ




कृष्ण प्रेम में रंगी घटाएँ

विद्युत के आभूषण युत, 
कर उर में उष्ण वाष्प को संचित ।
कृष्ण प्रेम में रंगी घटाएँ, 
प्रिय मिलन को हो विकलित ।


बढ़ चलीं अंबर की ओर, 
हो मग्न भाव में विभोर ।
प्रिय मिलन का मार्ग कठिन, 
पथ में बाधाएँ अनगिन ।

नील नभ में उठती रहीं, 
पर पथ का अंतर मिटा नहीं । 
हार थकीं मिटा उत्साह, 
मिट गई मिलन की तीव्र चाह ।

सरल नहीं प्रेम की राह, 
उर से निकली विकल आह ।
मंद पड़ा सारा ही जोश, 
इक पल को गरजीं करके रोष ।

नियति को मिलन नहीं स्वीकार, 
सोच उठीं वे बार-बार । 
हृदय से उठी घोर चीत्कार, 
कुछ पल को फिर क्रंदन अपार ।

द्रवित हृदय निकली जलधार, 
रिक्त किया मन का सब भार । 
नयन-नीर टपका धरती पर, 
मिला किसी सरवर में जाकर ।

कुछ पल उदास रहीं चुपचाप, 
पर सह न सकीं विरह संताप ।
फिर कर एकत्रित उत्साह, 
पकड़ी प्रिय की वही राह ।

पुन: उठीं फिर से बरसा जल, 
सर में यह देख मची हलचल ।
कब से चल रहा यही क्रम, 
पर मिल न सका उनको प्रिय निर्मम ।

जाने कब मिल पायेंगी, 
पर अपना प्रेम निभायेंगी ।
प्रिय मिलन हेतु वे जायेंगी,
इसी हेतु मिट जायेंगी ।

सरस्वती जोशी

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