कृष्ण प्रेम में रंगी घटाएँ
विद्युत के आभूषण युत,
कर उर में उष्ण वाष्प को संचित ।
कृष्ण प्रेम में रंगी घटाएँ,
प्रिय मिलन को हो विकलित ।
बढ़ चलीं अंबर की ओर,
हो मग्न भाव में विभोर ।
प्रिय मिलन का मार्ग कठिन,
पथ में बाधाएँ अनगिन ।
नील नभ में उठती रहीं,
पर पथ का अंतर मिटा नहीं ।
हार थकीं मिटा उत्साह,
मिट गई मिलन की तीव्र चाह ।
सरल नहीं प्रेम की राह,
उर से निकली विकल आह ।
मंद पड़ा सारा ही जोश,
इक पल को गरजीं करके रोष ।
नियति को मिलन नहीं स्वीकार,
सोच उठीं वे बार-बार ।
हृदय से उठी घोर चीत्कार,
कुछ पल को फिर क्रंदन अपार ।
द्रवित हृदय निकली जलधार,
रिक्त किया मन का सब भार ।
नयन-नीर टपका धरती पर,
मिला किसी सरवर में जाकर ।
कुछ पल उदास रहीं चुपचाप,
पर सह न सकीं विरह संताप ।
फिर कर एकत्रित उत्साह,
पकड़ी प्रिय की वही राह ।
पुन: उठीं फिर से बरसा जल,
सर में यह देख मची हलचल ।
कब से चल रहा यही क्रम,
पर मिल न सका उनको प्रिय निर्मम ।
जाने कब मिल पायेंगी,
पर अपना प्रेम निभायेंगी ।
प्रिय मिलन हेतु वे जायेंगी,
इसी हेतु मिट जायेंगी ।
सरस्वती जोशी

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