टूटा तारा
आज नभ का एक तारा, टूट कर यह कह गया है :
"किस चमक का गर्व था हम को अजाने में अभी ?
अब जहाँ पहुँचे वहाँ से आएँगे क्या फिर कभी ?
आज सारा गर्व अपने में सिमट कर रह गया है ।...
क्यों नही थे देख पाये पास आता अंत अपना ?
क्यों नहीं हम समझ पाये : है जगत का जाल सपना ।
स्वप्न में भूले हुए ही एक जीवन मिट गया है ।"...
अब यही है साध : "हर पल को पकड़ कर बाँध लें ।
रोक कर आती घड़ी को हम जकड़ कर साध लें ।"
पर मिलेगा क्या यह अवसर ? क्या समय कुछ बच गया है ?...
अब नहीं हारेंगे हिम्मत, आस ना छोड़ेंगे हम ।
चाहे हँस दे हम पे जगती, राह ना मोड़ेंगे हम ।
इक बहाना दें हँसी का, यह तो अब भी रह गया है ।...
गेरे जाओ मुस्कानों की प्यार भरी शीतल फुहार ।
जल-जल कर भी हँसो-हँसाओ, रोको तुम अपने उद्गार ।
जाते-जाते भी जगती से, कुछ करने को मिल ही गया है ।...
आज नभ का एक तारा ...
सरस्वती जोशी

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