जीत की तलाश में,
न हारने की आस में,
स्नेह की चिर प्यास में,
जी पाने की अभिलाष में,
टूटे स्वप्नों के भग्नावशेष में,
बिखरे जीवन के अवशेष में,
उन्हें चुन-चुन जोड़ने के प्रयास में,
लीन सी यह ज़िंदगी ।
दिन, महीने, युग बीते,
रहा नहीं कुछ पास में,
खो दिया हर लम्हा,
जाती उदास श्वास में,
जो क्षण भंगुर सी,
ना थी मेरी कभी,
चाहा उसे ही प्यार से ।
अब जब शाम निकट आई,
रात अंधेरी सी छाई,
तो पास आती पद चाप से,
सुध आई उस सहेली की,
जो हाथ पकड़ ले जाएगी,
आगे का मार्ग दिखाएगी ।
पर प्यार से या क्रोध से?
जाने कैसे निभाएगी,
स्नेह का इक कण उसे,
चाहे हूँ मैं अब तत्पर,
प्रेम से हाथ मिलाने को,
नत मस्तक हो शीश झुकाने को ।
पर अब वह क्यों अपनायेगी?
क्यों न मान अजनवी मुझको,
गैरों सा ले जाएगी!
हर भूल की सज़ा दिलाएगी,
जीवन का सत्य दिखाएगी?
सरस्वती जोशी

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