Monday, June 16, 2014

है अभी करना उसे,


कभी-कभी आकर कुछ बादल, 
गीला कर देते हैं आँचल । 
जब सुध आती है प्यारी गुड़िया की, 
जो हँसती तो फूल बिखरते थे, 
चलती तो पायल छमकते थे ।
कोयल का स्वर भर वाणी में, 
लाती थी बहार जीवन में ।
खो गई सहसा कहीं वह,
मरुथल के तपते टीलों में । 
जिसे ढूँढती हूँ बार-बार ।

सहसा दिखती है इक छाया, 
दूर से आती हुई ।
तेज युक्त तपस्विनी सी,
मोहिनी सी मूरत, 
पर म्लान सी सूरत ।
तप्त रेत से झुलसी, 
फीकी सी हँसी । 
मुरझाए गाल, 
रूखे से बाल, 
सहमी सी चाल ।
नज़रों में प्यार, 
सूनी आँखों से,
देख रही थी बार-बार ।
शांत सी मुद्रा में, 
नपे-तुले से कदम बढ़ाती ।
आ रही थी मेरी ओर ।
उदास आँखों से देखती, 
शांत सी मुद्रा में, 
मुझी को ढूँढती सी ।

मुझे फिर से मिल गई, 
मेरी खोई गुड़िया ।
अजीब सा था वह मिलन ।
न रेत की सुध रही न ताप की ।
मानो मरुथल में बरस रही थी,
शीतल सुधा युक्त चाँदनी ।
और खो गईं दोनों, 
एक दूजे में विलीन सी ।
शांत भाव से समा गईं,
खारे से जल के सागर में ।
उठने लगा सीने में ज्वार,
देख नियति के प्रहार ।

सोचने लगी मन में हार: 
कितना भ्रमित है यह संसार !
मानव लेता स्वयं को सर्वोत्तम मान, 
जबकि जीवन के हर पल तक से,
है वह बिल्कुल ही अनजान । 
है अभी करना उसे,
सत्य का जाने कितना ज्ञान !

सरस्वती जोशी

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