कभी-कभी आकर कुछ बादल,
गीला कर देते हैं आँचल ।
जब सुध आती है प्यारी गुड़िया की,
जो हँसती तो फूल बिखरते थे,
चलती तो पायल छमकते थे ।
कोयल का स्वर भर वाणी में,
लाती थी बहार जीवन में ।
खो गई सहसा कहीं वह,
मरुथल के तपते टीलों में ।
जिसे ढूँढती हूँ बार-बार ।
सहसा दिखती है इक छाया,
दूर से आती हुई ।
तेज युक्त तपस्विनी सी,
मोहिनी सी मूरत,
पर म्लान सी सूरत ।
तप्त रेत से झुलसी,
फीकी सी हँसी ।
मुरझाए गाल,
रूखे से बाल,
सहमी सी चाल ।
नज़रों में प्यार,
सूनी आँखों से,
देख रही थी बार-बार ।
शांत सी मुद्रा में,
नपे-तुले से कदम बढ़ाती ।
आ रही थी मेरी ओर ।
उदास आँखों से देखती,
शांत सी मुद्रा में,
मुझी को ढूँढती सी ।
मुझे फिर से मिल गई,
मेरी खोई गुड़िया ।
अजीब सा था वह मिलन ।
न रेत की सुध रही न ताप की ।
मानो मरुथल में बरस रही थी,
शीतल सुधा युक्त चाँदनी ।
और खो गईं दोनों,
एक दूजे में विलीन सी ।
शांत भाव से समा गईं,
खारे से जल के सागर में ।
उठने लगा सीने में ज्वार,
देख नियति के प्रहार ।
सोचने लगी मन में हार:
कितना भ्रमित है यह संसार !
मानव लेता स्वयं को सर्वोत्तम मान,
जबकि जीवन के हर पल तक से,
है वह बिल्कुल ही अनजान ।
है अभी करना उसे,
सत्य का जाने कितना ज्ञान !
सरस्वती जोशी

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