Monday, June 16, 2014

प्रणव का नाद

श्री संपतजी की कविता : "जितना पैसा आता गया अपनों से दूर जाता गया," पर मेरी ओर से कुछ शब्द
प्रणव का नाद
धन के मद में था इतराया ।
ज्ञान चक्षु पर कोहरा छाया ।
यह भी विस्मित हुआ कौन मैं,
किस हेतु यहाँ जगती में आया ।
अंधियारे में डूबे-डूबे,
जाने कितना समय गँवाया ।
सहसा एक सबेरा आया:
मोहभंग हो आँख खुली,
मन बोला : "रहा बहुत भरमाया ।"
क्षण में सब परिवर्तित पाया ।
जाने किसने झकझोर दिया,
जगी चेतना, होश में आया ।
सारे रिशते टूटे से थे ।
खुद को निपट अकेला पाया ।
थी समक्ष बस विस्तृत धरती,
औ नीला अंबर लहराया ।
चमक उठे कुछ तारे जिनने,
मुझको मेरा मार्ग दिखाया ।
अविरत चलने को अब मैंने,
आगे को निज कदम बढ़ाया ।
धरती-गगन, लहराता सागर,
बढ़ते कदम रोक ना पाया ।
बढ़ गये निर्बाध गति से,
वे किसी अदृश्य की ओर ।
"अज्ञात में हो जा विलीन,"
मन में मचा हुआ था शोर ।
मैं ही मैं बस और न कोई,
रहा वहाँ पर चारों ओर ।
खाली हाथ, न कुछ भी साथ ।
पर सब अपने से, सब अपना सा,
कोई परायावाद नहीं था ।
मन में कोई विशाद नहीं था ।


बस केवल प्रणव का नाद था ।
औ चमकता दिव्य प्रकाश था ।
सरस्वती जोशी
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