पानी हो गया समंदर का पानी ।
प्यास तो न बुझ सकी, पर देख उसकी विशालता,
यह समझ में आ गया : "पिपासा अंत हीन, क्यों मन करूँ मलीन,
क्यों न बाँध कर उसे,
अज्ञात में कर दूँ विलीन?"
सोचता ही मैं रहा, न जाने कितने काल तक,
पर चकित हुआ देख :
प्यास मेरी हो गई मेरे अंतर में ही लीन ।
अब पीने की चाह न थी भीतर, पर मैं बैठ गया सर के तट पर,
इक पाँव था जल के भीतर, दूजा कहता: "आ जा बाहर ।"
खींच रहा जल अपनी ओर, पर मन कहता था कुछ और:
"गर आज पग बढ़ा दिया, कभी उबर न पाएगा,
मृगतृष्णा के भँवरजाल में, तू फँसता ही जाएगा ।"
विकलित मन, विचलित चरण, उलझा-उलझा सा था
वह हर क्षण, उर अति अस्थिर, लगता था कुछ भय,
फिर भी भासित होता था, ज्योति भरा इक सूर्योदय ।
तो मन को ना होने दे अधीर, छोड़ उस सरवर का तीर,
बढ़ा दिये दृढ़ कदम, हो मोह जाल के प्रति निर्मम ।
अब न कोई प्यास है, न ही मन उदास है,
न किसी की आस है, एक दिव्य सा आभास है ।
सरस्वती जोशी
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