Monday, June 16, 2014

अब न कोई प्यास है

पानी हो गया समंदर का पानी ।
 प्यास तो न बुझ सकी, पर देख उसकी विशालता, 
यह समझ में आ गया : "पिपासा अंत हीन, क्यों मन करूँ मलीन, 
क्यों न बाँध कर उसे, 
अज्ञात में कर दूँ विलीन?" 
सोचता ही मैं रहा, न जाने कितने काल तक, 
पर चकित हुआ देख : 
प्यास मेरी हो गई मेरे अंतर में ही लीन ।
 अब पीने की चाह न थी भीतर, पर मैं बैठ गया सर के तट पर, 
इक पाँव था जल के भीतर, दूजा कहता: "आ जा बाहर ।" 
खींच रहा जल अपनी ओर, पर मन कहता था कुछ और: 
"गर आज पग बढ़ा दिया, कभी उबर न पाएगा, 
मृगतृष्णा के भँवरजाल में, तू फँसता ही जाएगा ।" 
विकलित मन, विचलित चरण, उलझा-उलझा सा था
 वह हर क्षण, उर अति अस्थिर, लगता था कुछ भय,
 फिर भी भासित होता था, ज्योति भरा इक सूर्योदय । 
तो मन को ना होने दे अधीर, छोड़ उस सरवर का तीर,
 बढ़ा दिये दृढ़ कदम, हो मोह जाल के प्रति निर्मम ।
 अब न कोई प्यास है, न ही मन उदास है, 
न किसी की आस है, एक दिव्य सा आभास है ।
सरस्वती जोशी

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