विनीत भाव से झुक कर अपना शोषण होने देता है ताकि बेटी की आँख के आँसू मिट जाएँ,
उसे मुस्कुराहट मिल सके, अक्सर वह जीवन भर खाद बन बेटी के उपवन को वसंत की
हरियाली सा खिलाने के प्रयत्न में रत रहता हुआ ही भूमि-गत हो जाता है ।
और कोई भी उम्र हो जाए बेटी उसके लिये सदा राज कुमारी ही रहती है ।
किंतु बेटी के लिये समय सदा एकसा नहीं रहता । पिता बचपन में राजा होत है
पर बड़े होने पर जब वह अपने पिता को अपनी ससुराल वालों के सामने विनीत
बन झुकते देखती है, जब पिता या पीहर पर किये गये व्यंग सुनती है, तो उसे
अपने पिता में एक बेबस, दीन-गरीब "नरसी मेहता" या "सुदामा" नज़र आता है
और वह तड़प कर रह जाती है इस स्थिति को सहने की अपनी विवशता पर,
चुपचप आँसू बहाती हुई!
मेरे पालनहार, मेरे पिता
करती उन्हें समर्पित श्रद्धा निज अश्रुओं की धार से ।
उरिण ना हो सकूँ कभी मैं अपने उस पालनहार से ।
नित्य उठ करती रहूँगी मैं उन्हें शत-शत प्रणाम ।
मेरे मन में सदा रहेगा अंकित उनका पावन नाम ।
सरस्वती जोशी

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