
Mere Mata Pita ko mera sadar naman!
8) मेरी माँ केसर कुँवर सुखवाल को श्रद्धा सहित सादर समर्पित
केसर सा सुरिभत उसका यश कैसे उसके गुण गाऊँ!
उसकी सरल सबल छबि के हित ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ!
मेरी थी पर वह ना केवल हम तक सीमित रह पाती थी!
उसके मन में सबके ही प्रति स्नेह भावना जग जाती थी ।
हर प्राणी का भला चाहके काम निरंतर आती थी ।
रामायण में लीन उसीको भक्ति भाव से गाती थी ।
सुधि ना उसको निज हित की, पर हित में ही खो जाती थी ।
भटके मानव की त्रुटियाँ सब क्षमा दान पा जाती थीं ।
निज हेतु कभी कुछ ना चाहा, पर हित में समय बिताती थी ।
दुखियों के दुख सुन-सुन उनको जीवन की राह दिखाती थी ।
अविरत लीन तपस्या में पर जग को नहीं दिखाती थी ।
भव सागर का मोह जाल भी शांत भाव से अपनाती थी ।
आशिर्वाद का मीठा अमृत मुक्त भाव से छलकाती थी ।
नारी थी या देवी कोई जो इतना सब कर पाती थी !
मुझ में क्षमता नहीं करूँ मैं उसके सभी गुणों का गान ।
सांसारिक वेश में लिपटी वह थी संत गुणों की खान ।
सरस्वती जोशी
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