सीता वनवास की कुछ झलकियाँ (राजस्थानी में)
राजस्थानी में राम व सीता की कथा के कुछ अंश लिखने की प्रेरणा मुझे मेरी माँ श्रीमती केसर कुँवर सुखवाल से मिली थी । मैं उन्हें "स्वर्गीय" नहीं लिख रही हूँ क्योंकि इन पंक्तियों के अंतर में छिपे भावों में वे आज भी जीवित हैं । उनकी इच्छा थी कि इस तरह की सरल-सुबोध, आम व्यक्ति की भावनाओं से युक्त शैली में संपूर्ण रामायण की कथा की रचना हो, पर दुर्भाग्य से समयाभाव के कारण उस समय यह संभव नहीं हो पाया । परंतु उनकी भावनाओं को ध्यान में रखते हुए मैंने यह एक छोटा सा प्रयास किया है । माँ ! यह कविता आप को सादर समर्पित है आप की इस बेटी की ओर से... सरस्वती जोशी
आओ लिखें फिर अवध की कहानी !
अवध नरेश का घर फिर से बसाएँ ।
रानी को उनकी न्याय दिलाएँ ।
सीता को वन से ले आएँ ।
रामायण अब हो सुखांत ।
हो सिया-राम के कष्टों का अंत !
सीता वनवास a) (वन में गणगौर उत्सव)
अरे चैत महीनो लागियो रे ! कोई आयो गणगौर तेहवार ।
सीता राणी माथो न्हावियो रे ! कोई भर ली सिंदूर से माँग ।
पाँच नखाँ के मेहँदी माँड ली रे ! कोई पाछे ओ वीरा की वाट ।
गौराँ के गेहणा घड़ लिया रे ! चाँवल का मोती लगाय ।
मन में आई : चूँदड़ ओढ़ लूँ रे ! पर रुक गयो सीता को हाथ ।
अवध में होती पील्या ओढ़ती रे ! म्हें तो करती सोला सिणगार ।
रुच-रुच गौरल पूजती रे ! म्हें तो देराण्यां-जिठाण्याँ के साथ ।
राम जी की छबि मन में आय गई रे ! आँसूड़ा की निकळी है धार ।
वह दिन चित में आय गयो रे ! जद निकळी वा रामजी के साथ ।
जो म्हें ऐसा जाणती रे ! म्हें तो रह जाती अवध के माँय ।
नित उठ गौराँ ने पूजती रे ! लेती रामजी की कुशल मनाय ।
याद आई वा दुखद घड़ी रे ! जद रावण लेग्यो लंका माँय ।
झुक-झुक रावण केवतो रे : "सीता राणी ! मान लो म्हारी वात ।"
दस पग दूरो रेवतो रे ! वो तो सीता का "सत" सूँ घबराय ।
मनड़ा ही मनड़ा में धूजतो रे ! "या तो दे देली म्हाँने सराप ।"
कतरी बेरयाँ मन में आवियो रे ! म्हें तो कर दूँ विसर्जन प्राण ।
राम दरस की कामना में रे ! म्हारा क्यूँ रे अटक्या पिराण ?
क्यूँ ना त्यागी देह जदे ही ? क्यूँ ना अगनि में कियो रे सिनान ?
आज को दिन नहिं देखती रे ! जग पूजतो म्हाँने "सती" मान ।
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सीता वनवास (b) (वन में गणगौर पूजन)
सीता राणी ने कोई हेलो जो पाड़्यो :
"जल्दी-जल्दी आजो "वनदेवी" ! जोवे रे सहेल्याँ थाँकी वाट !"
इतरा में लव-कुश दोन्यूँ ई आया, बैठ गया रे मायड़ पास !
"आज तो माऊजी ! म्हैं ठाण ने आया, पूछाँ ला मनड़ा की बात ।
कुणीजी के कारण गौरल पूजो ए माता ! कुण को धारयो रे वैराग ?
कुण म्हाँका दादोसा ने कुण रे बाबोसा ? काँई म्हाँका कुळ को रे नाम ?
कुण म्हाँका नानोसा ने कठे रे नानेरो ? कठे रे जनम लियो आप ?
जो माताजी थैं रिषिवर की बेटी, तो पीयर में क्यूँ रेहवो आप ?
कुणी जी का नाम का चुड़ला हो धारयाँ ? कुण की भरो ए माता माँग ?
जो माऊजी थैं हो रे सन्यासण ! तो किस विध हुया म्हाँकी माय ?
सन्यासण तो माऊजी गौरल न पूजे ! माँगे न वा तो सवाग !
नित का ए माता थैं तो गौरल से माँगो : "भव-भव वे ई भरतार ! "
गौरल पूजताँ नाम लेवो रे कुण को ? बस म्हाँने इतरो बताय ।"
सीता राणी का नैण जो छलक्या, हूक उठी रे हिवड़ा माँय ।
मनड़ा ने कर काठो, साध लिया रे स्वर ! धीरे से वचन सुणाय :
"साधु-सत्याँ का तो एक ही स्वामी रे ! व्हे ब्याँने करे रे सनाथ ।
सकल लोक का नाथ केहवावे, जगती जपे रे ज्याँको नाम !
व्हेई तो थाँका बाबोसा केहवावे वाला ! व्हे ई छै म्हाँका भरतार ।
व्हाँका ई नाम का चुड़ला धारया रे वाला ! ब्याँ की ही भरूँ रे म्हैं माँग ।
व्हाँका ई कुळ का थैं दीपक रे लाला ! भूल न जाजो रे आ बात ।
म्हाँका कुळ को परचो मत पूछो ! मान लो "वन देवी" नाम !
अंबर नाकी ने माता धरती जो झेली, धरती की हूँ रे संतान !
म्हारा बाबोसा को नाम न जाणूँ रे ! नहीं जाणूँ कुण म्हारी माय ।
म्हाँका तो माऊजी म्हाँ ने त्याग दिया रे वाला ! छोड़ दिया रे खेताँ माँय ।
बठा का राज माँय काल पड़यो रे ! राजाजी आया खेताँ माँय ।
राजाजी हळ हाकण लाग्या, म्हाँ पे नजर पड़ी रे ब्याँकी आय ।
करुणा कर व्हे तो म्हाँने रे उठाया ! छाती के लीनी रे लगाय ।
व्है म्हाँने बेटी कर मानण लागा, दे दियो ब्याँको ई नाम ।
ब्याँका ई घर में मोटा हुया रे वाला ! ब्याँ ने ई बाबोसा मान ।"
इतरा में कोई हेलो जो पाड़्यो : "पूजा को जमावो नी थाळ !
गौरल पूजण आवो "वन देवी" ! पूजा की वेळ्याँ जाय ।
लव-कुश माऊजी ने रोक न पाया, पण समझ गया रे इतरी वात ।
बाबोसा को नाम तो टाळ गया रे माऊजी ! टाळ्यो-टाळ्यो कुळ को रे नाम !
"अब नहीं म्हैं माऊजी नानासा टाबर ! म्हैंतो पूछाँ ला बरंबार ।
कुण म्हाँका बाबोसा बताणो ही पड़सी, जाण्या रेहस्याँ रे कुळ को नाम ।"
घणी रे उदासी सीता, गौरल पूजी, लुळ-लुळ लागी व्हा पाँय ।
"म्हैं थारे शरणे आई ए माता ! थूँ ई म्हारी राखजे लाज ।
इतरा दिन माता ! हाथ जो पकड़यो, आगे भी दीजे म्हारो साथ ।
थारा दीदा बाळक थारे ही शरणे ! याँका बाबोसा ने अमर कराय ।
एक दिनां ए माता ! सूँप दूँ ब्याँने, अवध में दूँ रे पहुँचाय ।
सूँप दूँ ब्याँने पूत ई ब्याँका, आँने आँको कुळ मिल जाय ।
सपूती-सवागण ज्यूँ जगती ने छोड़ूँ, माथा को कळंक मिट जाय ।
धन तो दौलत माता ! कछु नहीं माँगूँ, बस मरूँ पति चरणाँ के माँय ।
पति का ही घर में प्राण जो निकळे, बस या ही है अरदास ।
जो म्हाँने पाछो जनम थूँ देवे, दीजे ए पूरो सवाग ।
जो सासरिया को सुख नहिं देवे, जो करमाँ में लिखे वनवास ।
तो माता पाछो जनम न दीजो ! रख लीजो चरणाँ के माँय ।
नैणाँ का जळ से चरण पखारूँ माता ! आई थारे शरणाँ के माँय ।
ऐ माता गौरळ ! थूँ तो सब जाणे, पूर दे म्हारी या आस ।"
सीता की विनती से गौरळ पिघळी, पकड़ लिया रे दोन्यूँ हाथ ।
"थारा तो दुख से हियो म्हारो काँपे सीता ! दूँ थने अमर सवाग ।
थूँ रे सवागण जूँ जग छोड़सी ! सतियाँ में होसी पेहलो नाम ।
सिगळी नारयाँ ए सीता ! पूजा थारी करसी, राम से पहली लेसी नाम ।
थूँ तो सीता राणी देव्याँ की देवी ! जगती करसी रे जय-जयकार ।"
गौरल की आशिष झोळी में झेली, लुळ-लुळ शीश नमाय ।
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सीता वनवास c) (राम नवमी)
राम नवमी को दिन जो आयो, कौशल्याजी हरख्या जाय ।
"आज तो लाला ! जनम दिन थाँको, वारूँली भर मोत्याँ का थाळ ।"
रामजी का मन में सीता की सुध आई, चेतो उचट्यो जाय ।
म्हैं तो म्हारा बेटा को मुख भी न देख्यो, जाणे काँई है हवाल ।
कोई तो केहवे के सीता वन में जीवे, वनदेवी रख लियो नाम ।
एक नहीं व्हा तो दोय लाला जाया, कोई आश्रम में करे रे निवास !
एक मन केहवे के जाय ले आऊँ, एक मन रोके म्हारा पाँव ।
जो म्हैं बीने लेबा भी जाऊँ तो, काँई बा आवेली म्हारी लार ?
लोग समझ रह्या : धोबीड़ा की सुण ने, काढ़ दीनी रे घर बार ।
कोई न जाणे माता कैकेई संग म्हारी बेहनड़ भी तो लाचण लगाय ।
क्यान भूलूँ रे ! बो दन जद म्हाँने आ कर कह्यो रे सुणाय !
"कितरो पूठरो रावण उकेरयो, देखो-देखो रामजी थैं आय !"
क्यान भूलूँ रे म्हैंतो बो दिन जद म्हारी बेहनड़ बोली आय :
"देखो-देखो वीरासा ! वाग में चालो, भावज माँड्यो चतराम ।
साँचेई बोतो रागस दीखे दस तो माथा ने बीस हाथ ।
तळाई के माँयने छाया दिख गई सो छबि बींकी रह गई याद ।"
ऐसो रे झटको मनड़ा पर लाग्यो, हिवड़ा पे बह गई कटार ।
जो बायर से ही ऊनो वायरो आतो, रख लेतो मेहलाँ के माँय ।
पण घर में भी तो चैन रह्यो नहीं, होय गयो म्हैं तो लाचार ।
उठ रामजी महलाँ जाय सोया, छाती से निकळी आह ।
आँख्याँ ने मीच ने सोवण लागा, तो सपनो आयो रे माँझळ रात ।
गंगा के धौरे सीता है बैठी, ने घणी ए अंदारी रात ।
एकली बैठी आँसूड़ा बहावे, व्हातो लेय-लेय हरजी को नाम ।
"जो म्हारा पग भारी न होता, तो लेती शरण जळ माँय ।
बाळक ने तो किस विध मारूँ रे ! म्हें तो हूँ बींकी माय ।
सूना वनाँ माँय छोड़ी रे एकली ! कुण से माँगूँ रे सहाय !"
गंगा माता की छाती भर आई, सुण न सकी वा विलाप ।
जो ईंका आँसूड़ा पड़े रे पाणी में ! तो जळ म्हारो खारो व्हे जाय ।
धीरे से व्हा केवण लागी : "बाई ! पेहली पी लो रे शीतल नीर ।
उठो बाई ! दोय चार वन फळ तोड़ो, थाँका बाळूड़ा ने भूख सताय ।
नारी जीवन सरल नहीं होवे, पण मत ना यूँ होवो अधीर ।
इक वन लाँघ, दूजो वन लाँघो ! जावो थें तो रिषि जी के पास !
दया का सागर है व्हे रिषी जी, ले लेवो शरणो थें जाय ।
मायड़ ने तो जग देवी रे केहवे ! बाळक की रक्षक केहवाय ।
आश्रम माँय थें जाय ने रेहवो ! होसी थाँके दोय-दोय लाल ।
सारो जग थाँ पर गरब रे करसी ! होसी रे चहुँ दिसि नाम ।"
वन फळ खाय ने गंगा जळ पीदो, दोय पल कीदो विश्राम ।
हिम्मत कर सीता उठ आगे रे चाली, रात करे रे साँय-साँय !
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सरस्वती जोशी