Monday, June 30, 2014

रिश्ते जग के

रिश्ते जग के

रिश्तों का क्या मतलब होता ? आ कर के हमको िसखला दो ।
कैसे िजयें, िपयें गम कैसे ? बस इतना आ कर बतला दो ।

िकतना तोलें, कैसे बोलें ? कब चुप बैठें, कब मुँह खोलें ?
आज जरा आ कर के कुछ पल, ये गुर सारे हमें सुझा दो ।

मान के सब को अपना अपना, देखा था इक सुंदर सपना ।
टूटे सपने के ये टुकड़े, आ कर बैठ के पास जुड़ा दो ।

आज अतीत शूल सा चुभता, भावी भी कुछ धुंधला लगता ।
इस जमते कोहरे को आ कर, अपनी िकरणों से िपघला दो ।

सूना-सूना सा उपवन है, चुप-चुप सा सारा मधुवन है । 
इस गहराते सूनेपन को, तोड़ यहाँ जीवन िबखरा दो ।

िरश्तों का क्या मतलब होता ? आ कर के हमको िसखला दो ।

सरस्वती जोशी

स्नेह सौरभ के पुष्प उगाएँ !


केवल गुस्सा ही नहीं कई बार तरस सा आता है उस सोच पर ।

जो मानव को मानव से रखती है दूर कर ।

बीच में लोगों के बना देती है एक खाई । 

जो युगों से बन रही दुनिया उसे न पाट पाई । 

उसके किनारों पर कँटीली घास उगती चली गई । 

मानव से मानव में दूरी की आग बढ़ती चली गई ।

सूर्य-चंद्र के लोकों में जाने के देखे सपने ।

पर पहले यह ना समझा के धरती के लोग हैं अपने ।

आओ पहले इस धरती से काँटों के झाड़ मिटाएँ । 

ईश दरश हो हर प्राणी में, स्नेह सौरभ के पुष्प उगाएँ !

सीता वनवास की कुछ झलकियाँ (राजस्थानी में)

सीता वनवास की कुछ झलकियाँ (राजस्थानी में)
राजस्थानी में राम व सीता की कथा के कुछ अंश लिखने की प्रेरणा मुझे मेरी माँ श्रीमती केसर कुँवर सुखवाल से मिली थी । मैं उन्हें "स्वर्गीय" नहीं लिख रही हूँ क्योंकि इन पंक्तियों के अंतर में छिपे भावों में वे आज भी जीवित हैं । उनकी इच्छा थी कि इस तरह की सरल-सुबोध, आम व्यक्ति की भावनाओं से युक्त शैली में संपूर्ण रामायण की कथा की रचना हो, पर दुर्भाग्य से समयाभाव के कारण उस समय यह संभव नहीं हो पाया । परंतु उनकी भावनाओं को ध्यान में रखते हुए मैंने यह एक छोटा सा प्रयास किया है । माँ ! यह कविता आप को सादर समर्पित है आप की इस बेटी की ओर से... सरस्वती जोशी

आओ लिखें फिर अवध की कहानी !
अवध नरेश का घर फिर से बसाएँ ।
रानी को उनकी न्याय दिलाएँ ।
सीता को वन से ले आएँ ।
रामायण अब हो सुखांत ।
हो सिया-राम के कष्टों का अंत !

सीता वनवास a) (वन में गणगौर उत्सव)

अरे चैत महीनो लागियो रे ! कोई आयो गणगौर तेहवार । 
सीता राणी माथो न्हावियो रे ! कोई भर ली सिंदूर से माँग । 
पाँच नखाँ के मेहँदी माँड ली रे ! कोई पाछे ओ वीरा की वाट । 
गौराँ के गेहणा घड़ लिया रे ! चाँवल का मोती लगाय ।

मन में आई : चूँदड़ ओढ़ लूँ रे ! पर रुक गयो सीता को हाथ । 
अवध में होती पील्या ओढ़ती रे ! म्हें तो करती सोला सिणगार । 
रुच-रुच गौरल पूजती रे ! म्हें तो देराण्यां-जिठाण्याँ के साथ । 
राम जी की छबि मन में आय गई रे ! आँसूड़ा की निकळी है धार ।

वह दिन चित में आय गयो रे ! जद निकळी वा रामजी के साथ । 
जो म्हें ऐसा जाणती रे ! म्हें तो रह जाती अवध के माँय । 
नित उठ गौराँ ने पूजती रे ! लेती रामजी की कुशल मनाय ।

याद आई वा दुखद घड़ी रे ! जद रावण लेग्यो लंका माँय ।
झुक-झुक रावण केवतो रे : "सीता राणी ! मान लो म्हारी वात ।"
दस पग दूरो रेवतो रे ! वो तो सीता का "सत" सूँ घबराय ।
मनड़ा ही मनड़ा में धूजतो रे ! "या तो दे देली म्हाँने सराप ।"

कतरी बेरयाँ मन में आवियो रे ! म्हें तो कर दूँ विसर्जन प्राण ।
राम दरस की कामना में रे ! म्हारा क्यूँ रे अटक्या पिराण ?
क्यूँ ना त्यागी देह जदे ही ? क्यूँ ना अगनि में कियो रे सिनान ?
आज को दिन नहिं देखती रे ! जग पूजतो म्हाँने "सती" मान ।
***


सीता वनवास (b) (वन में गणगौर पूजन)
सीता राणी ने कोई हेलो जो पाड़्यो :
"जल्दी-जल्दी आजो "वनदेवी" ! जोवे रे सहेल्याँ थाँकी वाट !"

इतरा में लव-कुश दोन्यूँ ई आया, बैठ गया रे मायड़ पास !
"आज तो माऊजी ! म्हैं ठाण ने आया, पूछाँ ला मनड़ा की बात । 
कुणीजी के कारण गौरल पूजो ए माता ! कुण को धारयो रे वैराग ? 
कुण म्हाँका दादोसा ने कुण रे बाबोसा ? काँई म्हाँका कुळ को रे नाम ? 
कुण म्हाँका नानोसा ने कठे रे नानेरो ? कठे रे जनम लियो आप ? 
जो माताजी थैं रिषिवर की बेटी, तो पीयर में क्यूँ रेहवो आप ?

कुणी जी का नाम का चुड़ला हो धारयाँ ? कुण की भरो ए माता माँग ? 
जो माऊजी थैं हो रे सन्यासण ! तो किस विध हुया म्हाँकी माय ?
सन्यासण तो माऊजी गौरल न पूजे ! माँगे न वा तो सवाग !
नित का ए माता थैं तो गौरल से माँगो : "भव-भव वे ई भरतार ! " 
गौरल पूजताँ नाम लेवो रे कुण को ? बस म्हाँने इतरो बताय ।"

सीता राणी का नैण जो छलक्या, हूक उठी रे हिवड़ा माँय । 
मनड़ा ने कर काठो, साध लिया रे स्वर ! धीरे से वचन सुणाय :
"साधु-सत्याँ का तो एक ही स्वामी रे ! व्हे ब्याँने करे रे सनाथ । 
सकल लोक का नाथ केहवावे, जगती जपे रे ज्याँको नाम ! 
व्हेई तो थाँका बाबोसा केहवावे वाला ! व्हे ई छै म्हाँका भरतार । 
व्हाँका ई नाम का चुड़ला धारया रे वाला ! ब्याँ की ही भरूँ रे म्हैं माँग । 
व्हाँका ई कुळ का थैं दीपक रे लाला ! भूल न जाजो रे आ बात ।

म्हाँका कुळ को परचो मत पूछो ! मान लो "वन देवी" नाम !
अंबर नाकी ने माता धरती जो झेली, धरती की हूँ रे संतान !
म्हारा बाबोसा को नाम न जाणूँ रे ! नहीं जाणूँ कुण म्हारी माय । 
म्हाँका तो माऊजी म्हाँ ने त्याग दिया रे वाला ! छोड़ दिया रे खेताँ माँय ।

बठा का राज माँय काल पड़यो रे ! राजाजी आया खेताँ माँय । 
राजाजी हळ हाकण लाग्या, म्हाँ पे नजर पड़ी रे ब्याँकी आय । 
करुणा कर व्हे तो म्हाँने रे उठाया ! छाती के लीनी रे लगाय । 
व्है म्हाँने बेटी कर मानण लागा, दे दियो ब्याँको ई नाम । 
ब्याँका ई घर में मोटा हुया रे वाला ! ब्याँ ने ई बाबोसा मान ।"

इतरा में कोई हेलो जो पाड़्यो : "पूजा को जमावो नी थाळ !
गौरल पूजण आवो "वन देवी" ! पूजा की वेळ्याँ जाय ।
लव-कुश माऊजी ने रोक न पाया, पण समझ गया रे इतरी वात । 
बाबोसा को नाम तो टाळ गया रे माऊजी ! टाळ्यो-टाळ्यो कुळ को रे नाम !
"अब नहीं म्हैं माऊजी नानासा टाबर ! म्हैंतो पूछाँ ला बरंबार । 
कुण म्हाँका बाबोसा बताणो ही पड़सी, जाण्या रेहस्याँ रे कुळ को नाम ।"

घणी रे उदासी सीता, गौरल पूजी, लुळ-लुळ लागी व्हा पाँय । 
"म्हैं थारे शरणे आई ए माता ! थूँ ई म्हारी राखजे लाज । 
इतरा दिन माता ! हाथ जो पकड़यो, आगे भी दीजे म्हारो साथ । 
थारा दीदा बाळक थारे ही शरणे ! याँका बाबोसा ने अमर कराय । 
एक दिनां ए माता ! सूँप दूँ ब्याँने, अवध में दूँ रे पहुँचाय । 
सूँप दूँ ब्याँने पूत ई ब्याँका, आँने आँको कुळ मिल जाय ।

सपूती-सवागण ज्यूँ जगती ने छोड़ूँ, माथा को कळंक मिट जाय । 
धन तो दौलत माता ! कछु नहीं माँगूँ, बस मरूँ पति चरणाँ के माँय । 
पति का ही घर में प्राण जो निकळे, बस या ही है अरदास ।

जो म्हाँने पाछो जनम थूँ देवे, दीजे ए पूरो सवाग । 
जो सासरिया को सुख नहिं देवे, जो करमाँ में लिखे वनवास । 
तो माता पाछो जनम न दीजो ! रख लीजो चरणाँ के माँय । 
नैणाँ का जळ से चरण पखारूँ माता ! आई थारे शरणाँ के माँय । 
ऐ माता गौरळ ! थूँ तो सब जाणे, पूर दे म्हारी या आस ।"

सीता की विनती से गौरळ पिघळी, पकड़ लिया रे दोन्यूँ हाथ । 
"थारा तो दुख से हियो म्हारो काँपे सीता ! दूँ थने अमर सवाग । 
थूँ रे सवागण जूँ जग छोड़सी ! सतियाँ में होसी पेहलो नाम ।
सिगळी नारयाँ ए सीता ! पूजा थारी करसी, राम से पहली लेसी नाम । 
थूँ तो सीता राणी देव्याँ की देवी ! जगती करसी रे जय-जयकार ।" 
गौरल की आशिष झोळी में झेली, लुळ-लुळ शीश नमाय । 
***

सीता वनवास c) (राम नवमी)
राम नवमी को दिन जो आयो, कौशल्याजी हरख्या जाय । 
"आज तो लाला ! जनम दिन थाँको, वारूँली भर मोत्याँ का थाळ ।"

रामजी का मन में सीता की सुध आई, चेतो उचट्यो जाय । 
म्हैं तो म्हारा बेटा को मुख भी न देख्यो, जाणे काँई है हवाल । 
कोई तो केहवे के सीता वन में जीवे, वनदेवी रख लियो नाम । 
एक नहीं व्हा तो दोय लाला जाया, कोई आश्रम में करे रे निवास !

एक मन केहवे के जाय ले आऊँ, एक मन रोके म्हारा पाँव । 
जो म्हैं बीने लेबा भी जाऊँ तो, काँई बा आवेली म्हारी लार ?
लोग समझ रह्या : धोबीड़ा की सुण ने, काढ़ दीनी रे घर बार । 
कोई न जाणे माता कैकेई संग म्हारी बेहनड़ भी तो लाचण लगाय । 
क्यान भूलूँ रे ! बो दन जद म्हाँने आ कर कह्यो रे सुणाय ! 
"कितरो पूठरो रावण उकेरयो, देखो-देखो रामजी थैं आय !"

क्यान भूलूँ रे म्हैंतो बो दिन जद म्हारी बेहनड़ बोली आय : 
"देखो-देखो वीरासा ! वाग में चालो, भावज माँड्यो चतराम । 
साँचेई बोतो रागस दीखे दस तो माथा ने बीस हाथ । 
तळाई के माँयने छाया दिख गई सो छबि बींकी रह गई याद ।" 
ऐसो रे झटको मनड़ा पर लाग्यो, हिवड़ा पे बह गई कटार । 
जो बायर से ही ऊनो वायरो आतो, रख लेतो मेहलाँ के माँय । 
पण घर में भी तो चैन रह्यो नहीं, होय गयो म्हैं तो लाचार ।

उठ रामजी महलाँ जाय सोया, छाती से निकळी आह । 
आँख्याँ ने मीच ने सोवण लागा, तो सपनो आयो रे माँझळ रात । 
गंगा के धौरे सीता है बैठी, ने घणी ए अंदारी रात । 
एकली बैठी आँसूड़ा बहावे, व्हातो लेय-लेय हरजी को नाम । 
"जो म्हारा पग भारी न होता, तो लेती शरण जळ माँय । 
बाळक ने तो किस विध मारूँ रे ! म्हें तो हूँ बींकी माय । 
सूना वनाँ माँय छोड़ी रे एकली ! कुण से माँगूँ रे सहाय !"

गंगा माता की छाती भर आई, सुण न सकी वा विलाप । 
जो ईंका आँसूड़ा पड़े रे पाणी में ! तो जळ म्हारो खारो व्हे जाय । 
धीरे से व्हा केवण लागी : "बाई ! पेहली पी लो रे शीतल नीर । 
उठो बाई ! दोय चार वन फळ तोड़ो, थाँका बाळूड़ा ने भूख सताय । 
नारी जीवन सरल नहीं होवे, पण मत ना यूँ होवो अधीर । 
इक वन लाँघ, दूजो वन लाँघो ! जावो थें तो रिषि जी के पास !

दया का सागर है व्हे रिषी जी, ले लेवो शरणो थें जाय । 
मायड़ ने तो जग देवी रे केहवे ! बाळक की रक्षक केहवाय । 
आश्रम माँय थें जाय ने रेहवो ! होसी थाँके दोय-दोय लाल । 
सारो जग थाँ पर गरब रे करसी ! होसी रे चहुँ दिसि नाम ।"

वन फळ खाय ने गंगा जळ पीदो, दोय पल कीदो विश्राम ।
हिम्मत कर सीता उठ आगे रे चाली, रात करे रे साँय-साँय !
*** 
सरस्वती जोशी

Saturday, June 28, 2014

बेलन की महान महिमा तो केवल नारी ही कह सकती है ।


घर में "सम्पत" बनाये रखने के अत्यंत महत्वपूर्ण उपकरण "बेलन" की महिमा 

बेलन महिमा 

बेलन-महिमा हर घर गाता । गरम-गरम रोटी खिलवाता ।
लाल, गुलाबी, नीला, पीला, कई रूप धर सकता है।

लकड़ी, लोहा, पीतल सबसे कुछ पल में बन सकता है ।
मोटा, पतला, जैसा घड़लो काम में तत्पर रहता है ।
दिखने में सुंदर प्यारा औ छिपे कई गुण रखता है ।
गृहणी का शस्त्र कहलाता । घरकों को सही रास्ते पे लाता ।


अगर कमर में दर्द हुआ हो, मंत्रोच्चार कर बेलन घुमाओ ।
सात बार बोलते जाओ । दर्द से अपने निजात पाओ ।
माँ संझा के किला-कोट में देखो तुम बेलन का रूप ।
सास-हस्त में ऊपर उठ कर दिखलाता भीषण स्वरूप ।

गृहिणी की परम शक्ति का यह है कितना सुंदर प्रतीक ।
जो ऊपर उठ जाये तो बहुओं को कर देता ठीक ।
पर गर हाथ बहू के आए । तो घर में कुराम मचाए ।
बेटी को दहेज में देखो ! कभी भूल मत दे देना ।
सास-बहू के महाभारत का तुम अपयश मत ले लेना !


सकल विश्व की नारी एकता का यह बन सकता प्रतीक ।
मानो चाहे ना मानो पर बात हमारी बिल्कुल ठीक ।
बेलन की घटनाओं पर तो बेलन-पुराण लिख सकते हैं ।
यह तो है हर घर की शोभा अखबार भी महिमा कहते हैं ।


केवल लाईक लिख देना तो अमोघ शस्त्र का है अपमान ।
कुछ और नहीं गर कर पाओ तो झुक कर के तो करो प्रणाम ।
बेलन की महान महिमा तो केवल नारी ही कह सकती है ।
क्योंके वह निष्काम भाव से बेलन-भक्ति करती है ।

यह अर्जुन-भीम की कथा नही जो सभी रहस्य समझ पाएँ ।
वेदव्यास के छक्के छूटें जो बेलन की महिमा गाएँ ।
भैया संपत ! विषय-चयन में भूल जरासी कर दी है ।
हो कंप्यूटर-भक्त मगर बेलन-भक्ति की बात चला दी है ।

हे बेलन ! बहुसंख्यक पुरुषों ने माना आपको पीटनहार !
आज सबक देने को उनको हो जाओ तैयार !
आज शाम हे नारी-रक्षक ! जाना उनसे रूठ !
जब घर में रोटी बेलें तो जाना फटसे टूट !


समझा देना उनको चाहे युग कम्प्यूटरजी का आया !
बेलन की सत्ता-महिमा में फर्क नहीं वह कर पाया !
तव यशोगान की नन्ही कविता भी पढ़ नहीं ये पाते !
"बेलन चालीसा" होता तो जाने क्या कर जाते !


सरस्वती जोशी

Thursday, June 26, 2014

सब कहते : "मत इतना बोल !"

सब कहते : "मत इतना बोल !"


सब कहते : "मत इतना बोल !
अपने मन से लिपटे आँसू, सबके आगे ना तू खोल !...


कितनी महँगी होतीं सबकी घड़ियाँ जो बीती जाती हैं ?
उनको लेने को लालायित हो कर के तू क्या पाती है ?"
कितनी बार सुना समझा यह : "जीवन का हर क्षण अनमोल ।...

अपनी ही बीती साँसों से अपने पन को दूर करो !
अपने जीवन की आहों को विस्मित कर कुछ और करो !
आगे बीते जाते हर पल छिन को भी देखो तुम तोल !..."

जो यह सच है तो फिर बीते पल-छिन का क्या मोल नहीं ?
वे आँसू भीगी घड़ियाँ जो बीतीं क्या अनमोल नहीं ?
फिर उनको कैसे ठुकरा दूँ ? कह कर के : "तेरा क्या मोल ?"...

मुझको तो ना दिखता है के : "कहाँ आज है, कहाँ अतीत ?"
"है, होना है, और हुआ है," इसके अंतर की लकीर ।
सब कुछ एक बिंदु सा लगता, जो है जुड़ा हुआ सा गोल ।...

लेकिन है मंज़ूर मुझे के यह सब करना है इक भूल ।
अपने स्वारथ की खातिर मैं क्यों दिखलाऊँ सब को शूल ?
और निरंतर यही चाहती, फिर भी मन जाता है डोल !...

सरस्वती जोशी

आप के लिये होगी बस हमारी हर दुआ !


जब हम रो पड़े थे यूँ ही अनायास । 
तब सोचा नहीं था कौन खड़ा है पास ।
पर जब कई आँखों की नमी देख हमें होश आया ।
तो सच मन दुखी हुआ कि हमने इतनों को रुलाया ।


माफ़ करना हमें मित्रो ! हमारा यह करना सही नहीं था ।
हँसी दें न दें, पर गमों का वितरण तो करना ही नहीं था ।
हम निपट स्वार्थी हैं, सो कहेंगे ज़रूर जो बात मन में है आई ।
आप से आई करुणा की बूँदों ने हमें अजब तसल्ली है दिलाई ।

हम अकेले नहीं अबसे, कोई है अपना कह पायेंगे ।
गर आये कोई विपदा तो अवश्य पार कर जायेंगे ।
डूबने से पहले यदि हम फैलायेंगे हाथ ।
तो है विश्वास कुछ मित्र आ दे देंगे साथ ।

अगर हमने बेबस हो मदद को पुकारा । 
तो रहने न देंगे वे हमें निपट बेसहारा ।
कैसे करें अदा इस मित्रता का शुक्रिया !
आप के लिये होगी बस हमारी हर दुआ !

सरस्वती जोशी

मेरे पालनहार, मेरे पिता

पिता जो पग-पग पर बेटी को जिताने के लिये निर्बल न होने पर भी हार स्वीकार कर,
 विनीत भाव से झुक कर अपना शोषण होने देता है ताकि बेटी की आँख के आँसू मिट जाएँ, 
उसे मुस्कुराहट मिल सके, अक्सर वह जीवन भर खाद बन बेटी के उपवन को वसंत की
 हरियाली सा खिलाने के प्रयत्न में रत रहता हुआ ही भूमि-गत हो जाता है ।
और कोई भी उम्र हो जाए बेटी उसके लिये सदा राज कुमारी ही रहती है । 

किंतु बेटी के लिये समय सदा एकसा नहीं रहता । पिता बचपन में राजा होत है 
पर बड़े होने पर जब वह अपने पिता को अपनी ससुराल वालों के सामने विनीत
 बन झुकते देखती है, जब पिता या पीहर पर किये गये व्यंग सुनती है, तो उसे 
अपने पिता में एक बेबस, दीन-गरीब "नरसी मेहता" या "सुदामा" नज़र आता है
 और वह तड़प कर रह जाती है इस स्थिति को सहने की अपनी विवशता पर, 
चुपचप आँसू बहाती हुई!

मेरे पालनहार, मेरे पिता 
करती उन्हें समर्पित श्रद्धा निज अश्रुओं की धार से ।
उरिण ना हो सकूँ कभी मैं अपने उस पालनहार से ।
नित्य उठ करती रहूँगी मैं उन्हें शत-शत प्रणाम ।
मेरे मन में सदा रहेगा अंकित उनका पावन नाम ।

सरस्वती जोशी

Wednesday, June 25, 2014

न चाहने पर भी बन बेवफा



तुम उसके लिए शोक करते हो जो शोक करने के योग्य नहीं हैं, 
और फिर भी ज्ञान की बाते करते हो| बुद्धिमान व्यक्ति ना जीवित और
 ना ही मृत व्यक्ति के लिए शोक करते हैं|

श्रीमद्भगवद्गीता

कितना अच्छा लगता है जब सुनते हैं ये उपदेश । 
पर जब अपनी बारी आती है तो भूलते सब संदेश । 
लाख रोकने पर भी लफ्ज़ ओठों पे आ ही जाते हैं । 
न चाहने पर भी बन बेवफा, घर की कहानी बयाँ कर जाते हैं । 
गर राम (वन गमन के समय) वाल्मीकि को आपबीती ना सुनाते । 
तो शायद रामायण से ग्रंथ रोशनी में न आते । 
सीता ने भी चाहे अपनी असली पहचान तो छिपाई । 
बन के वनदेवी वन में उमर बिताई । 
पर बहते आँसुओं पे काबू कर नहीं वह पाई । 
अपने बेटों से कहानी घर की जगत को सुनवाई । 
सरस्वती जोशी

Monday, June 23, 2014

आज नभ का एक तारा,

टूटा तारा

आज नभ का एक तारा, टूट कर यह कह गया है :

"किस चमक का गर्व था हम को अजाने में अभी ?
अब जहाँ पहुँचे वहाँ से आएँगे क्या फिर कभी ?
आज सारा गर्व अपने में सिमट कर रह गया है ।...

क्यों नही थे देख पाये पास आता अंत अपना ?
क्यों नहीं हम समझ पाये : है जगत का जाल सपना ।
स्वप्न में भूले हुए ही एक जीवन मिट गया है ।"...

अब यही है साध : "हर पल को पकड़ कर बाँध लें ।
रोक कर आती घड़ी को हम जकड़ कर साध लें ।"
पर मिलेगा क्या यह अवसर ? क्या समय कुछ बच गया है ?...

अब नहीं हारेंगे हिम्मत, आस ना छोड़ेंगे हम ।
चाहे हँस दे हम पे जगती, राह ना मोड़ेंगे हम ।
इक बहाना दें हँसी का, यह तो अब भी रह गया है ।...

गेरे जाओ मुस्कानों की प्यार भरी शीतल फुहार ।
जल-जल कर भी हँसो-हँसाओ, रोको तुम अपने उद्गार ।
जाते-जाते भी जगती से, कुछ करने को मिल ही गया है ।...

आज नभ का एक तारा ...

सरस्वती जोशी

Saturday, June 21, 2014

आज फिर रात हो गयी। and तो इस क्षण को क्यों ना अमर बनायें !

ye maine likha (Sampat sharma ne )
आज का दिन भी चला गया दोस्तों!
सुबह से लेकर आज फिर षाम हो गयी।
आज फिर रात हो गयी।
लग तो ऐसे रहा है कि अभी-अभी तो जागे थे।
अभी-अभी ही कर्मयोग के लिये भागे थे।
पता ही नहीं चला पूरा दिन बीत गया
आज फिर रात हो गयी।
ऐसे ही जिदंगी गुजर जानी है दोस्तों
लोग सच बोलते है चार दिन की कहानी है दोस्तों
साथ तो अपना कर्म ही जाना है।
बाकी सब यही रह जाना है।
जो कुछ कमाया, गवायां सब यही का था
यही वापस लौटाया।
कल फिर सूरज आयेगा....हम सब बोलेगे प्रभात हो गई
षुभ रात्री दोस्तों....आज फिर रात हो गयी - सम्पत षर्मा


(ye didi ne likha hai ) 


रातें तो यूँ ही जाएँगी, इनका काम है आना-जाना ।
 इनको समयाभाव नहीं पर हमको तो अल्प समय में जगत छोड़ कर जाना ।
 इसका अर्थ यह तो नहीं कि हम हताश हो घबरायें ।
 ज्ञात है जीवन क्षण-भंगुर, तो इस क्षण को क्यों ना अमर बनायें ! 
जीव जगत की माया में बस एक ही क्षण में फँसता ।
 पर जगती से मुक्ति में भी उतना ही क्षण लगता ।
 क्षण का अवमूल्यन ना कर यदि उसकी गरिमा समझ सकेंगे । 
तो अपनी क्षण-भंगरता में भी छाप छोड़ जगती छोड़ेंगे ।

सीता वनवास-राजस्थानी में



राजस्थानी में राम व सीता की कथा के कुछ अंश लिखने की प्रेरणा मुझे मेरी माँ श्रीमती केसर कुँवर सुखवाल से मिली थी । मैं उनहें स्वर्गीय नहीं लिख रही हूँ क्योंकि इन पंक्तियों के अंतर में छिपे भावों में वे आज भी जीवित हैं । उनकी इच्छा थी कि इस तरह की सरल-सुबोध, आम व्यक्ति की भावनाओं से युक्त शैली में संपूर्ण रामायण की कथा की रचना हो, पर दुर्भाग्य से समयाभाव के कारण उस समय यह संभव नहीं हो पाया । परंतु उनकी भावनाओं को ध्यान में रखते हुए मैंने यह एक छोटा सा प्रयास किया है । माँ ! यह कविता आप को सादर समर्पित है आप की इस बेटी की ओर से... सरस्वती जोशी



सीता वनवास

अरे चैत महीनो लागियो रे कोई आयो गणगौर तेहवार ।
सीता राणी माथो न्हावियो रे कोई भर ली सिंदूर से माँग ।
पाँच नखाँ के मेहँदी माँड ली रे कोई पाछे ओ वीरा की वाट ।
गौराँ के गेहणा घड़ लिया रे चाँवल का मोती लगाय ।
मन में आई:चूँदड़ ओढ़ लूँ रे पर रुक गयो सीता को हाथ ।
अवध में होती पील्या ओढ़ती रे म्हें तो करती सोला सिणगार ।
रुच-रुच गौरल पूजती रे म्हें तो देराण्यां-जिठाण्याँ के साथ ।
राम जी की छबि मन में आय गई रे आँसूड़ा की निकळी है धार ।

वह दिन चित में आय गयो रे जद निकली वा रामजी के साथ ।
जो महें ऐसा जाणती रे महें तो रह जाती अवध के माँय ।
नित उठ गौराँ ने पूजती रे लेती रामजी की कुशल मनाय ।
याद आई वा दुखद घड़ी जद रावण लेग्यो लंका माँय ।
झुक-झुक रावण केवतो रे: "सीता राणी! मान लो म्हारी वात ।"
दस पग दूरो रेवतो रे वो तो सीता का "सत" सूँ घबराय ।
मनड़ा ही मनड़ा में धूजतो रे: "या तो दे देली म्हाँने सराप ।"

कतरी बेरयाँ मन में आवियो रे म्हें तो कर दूँ विसर्जन प्राण ।
राम दरस की कामना में म्हारा क्यूँ रे अटक्या पिराण ।
क्यूँ ना त्यागी देह जदे ही, क्यूँ ना अगनि में कियो रे सिनान !
आज को दिन नहिं देखती रे जग पूजतो म्हाँने "सती" मान ।

सरस्वती जोशी

बेटी बचाओ



बेटी बचाओ

हर बार जब देखती हूँ : "बेटी बचाओ।",
तो सुन पड़ती है एक विवश नन्ही चीत्कार । 
जो मचा देती अंतर में भीषण हाहाकार ।


कोई कहता: "केवल दादी-बुआ हैं ज़िम्मेदार ।" 
कोई कहता: "यदि माँ चाहे तो कर सकती फौरन उद्धार ।" 
तो क्या भारत की माँएँ बन बैठीं इतनी नादान ? 
खुशी-खुशी दे देती हैं अपनी कन्या का बलिदान ?

है आखिर क्या मज़बूरी उनकी जिसने गौरी को काली बनाया? 
मिटा हृदय के मातृ-भाव को कन्या-बलि का पाठ पढ़ाया ? 
नारी सुलभ कोमल हृदय में ऐसा जघन्य पाप उकसाया ! 
क्यों पुरुष, ससुर-पिता-पति उसको हाथ पकड़ कर रोक न पाया ? 
या वह भी सहमत है लेकिन नारी को निमित्त ठहराया ? 
सरस्वती जोशी
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Friday, June 20, 2014

जाने कब उसके त्याग को समझेगा संसार ।- बेटी

बेटी पर-धन
बेटी को पराये घर होता है जाना ।
उसके कारण परिवार को सिर पड़ता झुकाना ।
पग-पग पर उसके हेतु खर्चे निभाना ।
बस में नहीं पिता के वंश को बढ़ाना ।
हालाँके ये नियम उसने नहीं बनाये ।
पर अनायास ये सब उसके हिस्से में आये ।
समझ नहीं पाती कैसे इन्हें मिटाये ।
"मैं नहीं भार तुम पर..." यह भरोसा दिलाये ।
समझ कर सचाई सदा शांत रहती ।
"जन्म-स्थान भी पराया..." स्वीकार करती । 



पति-गृह में "लक्ष्मी-रूपी दासी", पितृ-गृह में पराई ।
है वह यह नियति ले करके आई ।
है फिरभी वह दोनों की शक्ति ।
करती सदा ही दोनों की भक्ति ।
नदिया सी बहती है दोनों के बीच ।
फैलाती खुशियाँ दोनों को सींच ।
दोनों की प्रतिष्ठा जुड़ी उसके साथ ।
जो खींच ले जरा भी वह अपना हाथ ।
तो भूचाल आ जाय दोनों घरों में ।
ज्ञात है चाहे कहें ना ऊँचे स्वरों में ।
कर्तव्य-पथ पे यूँ ही बहती है आई ।
दोनों तटों को हरियाली दी है सदा ही ।
पर जग मान्यता ना दे कहता है भार ।
जाने कब उसके त्याग को समझेगा संसार ।
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Monday, June 16, 2014

है अभी करना उसे,


कभी-कभी आकर कुछ बादल, 
गीला कर देते हैं आँचल । 
जब सुध आती है प्यारी गुड़िया की, 
जो हँसती तो फूल बिखरते थे, 
चलती तो पायल छमकते थे ।
कोयल का स्वर भर वाणी में, 
लाती थी बहार जीवन में ।
खो गई सहसा कहीं वह,
मरुथल के तपते टीलों में । 
जिसे ढूँढती हूँ बार-बार ।

सहसा दिखती है इक छाया, 
दूर से आती हुई ।
तेज युक्त तपस्विनी सी,
मोहिनी सी मूरत, 
पर म्लान सी सूरत ।
तप्त रेत से झुलसी, 
फीकी सी हँसी । 
मुरझाए गाल, 
रूखे से बाल, 
सहमी सी चाल ।
नज़रों में प्यार, 
सूनी आँखों से,
देख रही थी बार-बार ।
शांत सी मुद्रा में, 
नपे-तुले से कदम बढ़ाती ।
आ रही थी मेरी ओर ।
उदास आँखों से देखती, 
शांत सी मुद्रा में, 
मुझी को ढूँढती सी ।

मुझे फिर से मिल गई, 
मेरी खोई गुड़िया ।
अजीब सा था वह मिलन ।
न रेत की सुध रही न ताप की ।
मानो मरुथल में बरस रही थी,
शीतल सुधा युक्त चाँदनी ।
और खो गईं दोनों, 
एक दूजे में विलीन सी ।
शांत भाव से समा गईं,
खारे से जल के सागर में ।
उठने लगा सीने में ज्वार,
देख नियति के प्रहार ।

सोचने लगी मन में हार: 
कितना भ्रमित है यह संसार !
मानव लेता स्वयं को सर्वोत्तम मान, 
जबकि जीवन के हर पल तक से,
है वह बिल्कुल ही अनजान । 
है अभी करना उसे,
सत्य का जाने कितना ज्ञान !

सरस्वती जोशी

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जीवन का सत्य दिखाएगी?



जीत की तलाश में,
न हारने की आस में,
स्नेह की चिर प्यास में,
जी पाने की अभिलाष में,
टूटे स्वप्नों के भग्नावशेष में,
बिखरे जीवन के अवशेष में,
उन्हें चुन-चुन जोड़ने के प्रयास में,
लीन सी यह ज़िंदगी ।
दिन, महीने, युग बीते,
रहा नहीं कुछ पास में,
खो दिया हर लम्हा,
जाती उदास श्वास में,
जो क्षण भंगुर सी,
ना थी मेरी कभी,
चाहा उसे ही प्यार से ।


अब जब शाम निकट आई,
रात अंधेरी सी छाई,
तो पास आती पद चाप से,
सुध आई उस सहेली की,
जो हाथ पकड़ ले जाएगी,
आगे का मार्ग दिखाएगी ।
पर प्यार से या क्रोध से?
जाने कैसे निभाएगी,
मैंने दिया नहीं कभी, 
स्नेह का इक कण उसे,
चाहे हूँ मैं अब तत्पर,
प्रेम से हाथ मिलाने को,
नत मस्तक हो शीश झुकाने को ।
पर अब वह क्यों अपनायेगी?
क्यों न मान अजनवी मुझको,
गैरों सा ले जाएगी!
हर भूल की सज़ा दिलाएगी,
जीवन का सत्य दिखाएगी?
सरस्वती जोशी

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आशिर्वाद का मीठा अमृत






Mere Mata Pita ko mera sadar naman!
8) मेरी माँ केसर कुँवर सुखवाल को श्रद्धा सहित सादर समर्पित

केसर सा सुरिभत उसका यश कैसे उसके गुण गाऊँ!
उसकी सरल सबल छबि के हित ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ!


मेरी थी पर वह ना केवल हम तक सीमित रह पाती थी!
उसके मन में सबके ही प्रति स्नेह भावना जग जाती थी ।

हर प्राणी का भला चाहके काम निरंतर आती थी ।
रामायण में लीन उसीको भक्ति भाव से गाती थी ।

सुधि ना उसको निज हित की, पर हित में ही खो जाती थी ।
भटके मानव की त्रुटियाँ सब क्षमा दान पा जाती थीं ।

निज हेतु कभी कुछ ना चाहा, पर हित में समय बिताती थी ।
दुखियों के दुख सुन-सुन उनको जीवन की राह दिखाती थी ।

अविरत लीन तपस्या में पर जग को नहीं दिखाती थी ।
भव सागर का मोह जाल भी शांत भाव से अपनाती थी ।

आशिर्वाद का मीठा अमृत मुक्त भाव से छलकाती थी ।
नारी थी या देवी कोई जो इतना सब कर पाती थी !

मुझ में क्षमता नहीं करूँ मैं उसके सभी गुणों का गान ।
सांसारिक वेश में लिपटी वह थी संत गुणों की खान ।

सरस्वती जोशी



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है इक छोटा सा संदेश ।



34) मैंने पुत्र-दिवस "Son's Day" या पुत्री-दिवस "Daughter's Day" नहीं बनाया । 
पर मेरे जीवन के हर पल ने मुझको है बस यही सिखाया । 
नहीं चाहिये "विशेष-दिन" या यशोगान, न ही समारोह की शाम । 
तुम्हीं मेरे "Raison de Vivre", तुम संजीवनी, तुम ही जीवन । 
गर दे पाओ कुछ करुणा के कण, स्नेह भरे कुछ थोड़े क्षण । 
मानव मान सहज सा जीवन, ले पाऊँ तुमसे अपनापन ।
कह पाऊँ जो चाहे यह मन, समझूँगी सफल हो गया जीवन ।


पर यह नहीं कोई आदेश । है इक छोटा सा संदेश । 
क्योंकि तुम्हारे जन्म हेतु मैंने तो प्रभुको दिया वचन : 
निष्काम भाव से करूँ समर्पण, न बदले मे कुछ चाहे मेरा मन । 
सो मान प्रभु का वह अहसान । अपने वचन का रखना है मान ।

सरस्वती जोशी
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क्यूँ घिर आया बादल गहरा !




क्यूँ घिर आया बादल गहरा !

क्यूँ घिर आया बादल गहरा !
क्यूँ फिर से छाया यह कोहरा !
यह रेतीली बंजर भूमि,
क्यूँ इस पर सावन लहराया !
क्यूँ वर्षा ने जल बरसाया !


कितनी बार यूँ ही जल बरसा,
पर न यहाँ हरियाली आई ।
कितने सावन आ-आ निकले,
पर न यहाँ चली पुरवाई ।
गर कोई पौध निकल भी आई,
खिलने से पहले मुरझाई ।

नियति यहाँ की ऐसी ही है,
क्यूँ ये घटाएँ समझ न पाईं !
खोने को अपना अमृत सम जल,
क्यूँ ये घिर-घिर कर लहराईं !

सरस्वती जोशी


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ओ मेरी बगिया के पौधे ...




ओ मेरी बगिया के पौधे सूखा-सूखा क्यूँ रहता है ?

ओ मेरी बगिया के पौधे सूखा-सूखा क्यूँ रहता है ?
आ तुझको सींचूँ उस जल से गंगाजल सा जो बहता है ।


तू मेरे जीवन की थाती, तू मेरा नन्हा संसार,
तू ही मेरे सारे तप का महका-महका सा है सार ।
तेरा यह मुरझाना मेरे अंतर को विचलित करता है ।

कितनी आशा से बोया था, मन में ले कर बड़ी उमंग,
तुझको बढ़ते देख-देख कर, खिल जाता मेरा हर अंग,
देने को अब अपना सौरभ, तरसाता सा क्यूँ रहता है ?

तू मेरा वह नन्हा दीपक, ज्योतिर्मय जिस से आँगन है ।
तुझे स्नेह-कण से सींचूँ, इसी लिये तो यह जीवन है ।
आ आँचल की ओट में लेलूँ, तूफाँ तुझको क्यूँ छूता है ?

डर ना, मेरे उर में वह जल जिसका पारावार नहीं है ।
इसमें है बस अमृत बहता, कहीं नाम को क्षार नहीं है ।
कभी न सूखेगा यह सागर, जो अथाह सा लहराता है ।
ओ मेरी बगिया के पौधे ...

सरस्वती जोशी

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ये मित्रता की कड़ियाँ,



मेरे  मित्रो

ये मित्रता की कड़ियाँ,
ये स्मृतियों की सुंदर लड़ियाँ ।
ये दूर-दूर रह संग-संग बीती,
जीवन की कुछ नन्ही घड़ियाँ ।
ये विचारों के आदान-प्रदान,
ये खट्टी-मीठी सी बातें,
ये रूठने-मनने की सौगातें ।
ये अनजान-अजनवी जन के,
चिर-परिचित से बनते नाते ।
एक लड़ी में बँधे मोतियों से,
जो सब के मन को हैं भाते ।


इतना तो है ज्ञात सभी को,
कभी सभी ना मिल पायेंगे ।
मिलने के सब वादे सच में,
मिथ्या हैं, मिथ्या रह जायेंगे ।
पर मालूम हमें है के जब,
कोई भी कम हो जाएगा ।
चाहे वैसे ना भाया हो,
पर उस दिन सुन आँसू आएगा ।
यह है अलग अनोखा रिश्ता,
इसको सदा निभाएँगे ।
रक्षाबंधन के दिन सब की,
मन से कुशल मनाएँगे ।
सरस्वती जोशी
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प्रणव का नाद

श्री संपतजी की कविता : "जितना पैसा आता गया अपनों से दूर जाता गया," पर मेरी ओर से कुछ शब्द
प्रणव का नाद
धन के मद में था इतराया ।
ज्ञान चक्षु पर कोहरा छाया ।
यह भी विस्मित हुआ कौन मैं,
किस हेतु यहाँ जगती में आया ।
अंधियारे में डूबे-डूबे,
जाने कितना समय गँवाया ।
सहसा एक सबेरा आया:
मोहभंग हो आँख खुली,
मन बोला : "रहा बहुत भरमाया ।"
क्षण में सब परिवर्तित पाया ।
जाने किसने झकझोर दिया,
जगी चेतना, होश में आया ।
सारे रिशते टूटे से थे ।
खुद को निपट अकेला पाया ।
थी समक्ष बस विस्तृत धरती,
औ नीला अंबर लहराया ।
चमक उठे कुछ तारे जिनने,
मुझको मेरा मार्ग दिखाया ।
अविरत चलने को अब मैंने,
आगे को निज कदम बढ़ाया ।
धरती-गगन, लहराता सागर,
बढ़ते कदम रोक ना पाया ।
बढ़ गये निर्बाध गति से,
वे किसी अदृश्य की ओर ।
"अज्ञात में हो जा विलीन,"
मन में मचा हुआ था शोर ।
मैं ही मैं बस और न कोई,
रहा वहाँ पर चारों ओर ।
खाली हाथ, न कुछ भी साथ ।
पर सब अपने से, सब अपना सा,
कोई परायावाद नहीं था ।
मन में कोई विशाद नहीं था ।


बस केवल प्रणव का नाद था ।
औ चमकता दिव्य प्रकाश था ।
सरस्वती जोशी
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कृष्ण प्रेम में रंगी घटाएँ




कृष्ण प्रेम में रंगी घटाएँ

विद्युत के आभूषण युत, 
कर उर में उष्ण वाष्प को संचित ।
कृष्ण प्रेम में रंगी घटाएँ, 
प्रिय मिलन को हो विकलित ।


बढ़ चलीं अंबर की ओर, 
हो मग्न भाव में विभोर ।
प्रिय मिलन का मार्ग कठिन, 
पथ में बाधाएँ अनगिन ।

नील नभ में उठती रहीं, 
पर पथ का अंतर मिटा नहीं । 
हार थकीं मिटा उत्साह, 
मिट गई मिलन की तीव्र चाह ।

सरल नहीं प्रेम की राह, 
उर से निकली विकल आह ।
मंद पड़ा सारा ही जोश, 
इक पल को गरजीं करके रोष ।

नियति को मिलन नहीं स्वीकार, 
सोच उठीं वे बार-बार । 
हृदय से उठी घोर चीत्कार, 
कुछ पल को फिर क्रंदन अपार ।

द्रवित हृदय निकली जलधार, 
रिक्त किया मन का सब भार । 
नयन-नीर टपका धरती पर, 
मिला किसी सरवर में जाकर ।

कुछ पल उदास रहीं चुपचाप, 
पर सह न सकीं विरह संताप ।
फिर कर एकत्रित उत्साह, 
पकड़ी प्रिय की वही राह ।

पुन: उठीं फिर से बरसा जल, 
सर में यह देख मची हलचल ।
कब से चल रहा यही क्रम, 
पर मिल न सका उनको प्रिय निर्मम ।

जाने कब मिल पायेंगी, 
पर अपना प्रेम निभायेंगी ।
प्रिय मिलन हेतु वे जायेंगी,
इसी हेतु मिट जायेंगी ।

सरस्वती जोशी

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क्यों सुनाएँ !

जीवन के शाश्वत सत्य को निराशा के स्वर मे क्यों सुनाएँ ! 

क्यों न जबतक "बुलबुला" है हम उसमें भी शक्ति जगाएँ ? 
क्षणभंगुर ही सही पर जीवन अपना अस्तित्व तो रखता है । 
इन क्षणभंगुरता के अल्प क्षणों में भी जग ज्योतिर्मय कर सकता है । 
सरस्वती जोशी

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उर में उसका मृदु हास रहे ।

जब जीवन नाम ही तप का है, 

तो तप में दुख का अहसास क्यों ? 
तपस्या का परिहास क्यों? 
अवधि का आभास क्यों ? 
कुछ पाने की आस क्यों ? 
"तप सदा सार्थक होता है," 
बस मन में यही विश्वास रहे । 
जो शक्ति दे रहा करने की,
उर में उसका मृदु हास रहे । 
सरस्वती जोशी


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उस दिन जब तन्हाई टूटी,

जाति प्रथा 

जब रिश्तों के भ्रम टूट गये । 
जिनको पक्का अपना माना, 
वे भी पीछे छूट गये । 
तो अनायास ही सुध आई, 
अपने समाज के लोगों की, 
मन को इक राहत मिली, 
अब कमी नहीं थी रिश्तों की । 
भाई, बेटा, चाचा, ताऊ,
हम जो चाहें कह सकते थे । 
और सभी में सरल स्नेह के, 
सुंदर भाव झलकते थे । 
मानों जग ही बदल गया, 
भय न रहा तन्हाई का । 
हर इक बढ़ते हाथ में, 
आभास हुआ था भाई का । 
विधवा हो या परित्यक्ता, 
या हो पति द्वारा ठुकराई ।
हर अबला को संभव है, 
एक कोई रक्षक भाई ।
रिशतों का अभाव नहीं,
पर कहीं कोई दबाव नहीं ।
एक बड़ा परिवार यहाँ, 
कोई स्वार्थ का भाव नहीं ।
जाति प्रथा को बुरा मानते, 
लेख कई पढ़ने में आये । 
पर उस दिन जब तन्हाई टूटी, 
तो असली अर्थ समझ में आये । 
सरस्वती जोशी

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समझी जिसने अनकही कथा ।

Mere ek bhaiya hain Mr. Sampat Sharma, ve Compu. ke visheshagya hain yah tasvir unki or se unke jijaji Late Dr. Vraj Raj Joshi ko ek sneh-bhara present hai. Thanks bhaiya Sampatji !
भैया संपतजी ! 
किन शब्दों में दूँ आज धन्यवाद !
मूक वाणी, हृदय विचलित, 
सारा अतीत आ गया याद । 
पता नहीं के इन नयनों में,
आनंद है या भरा विषाद । 
पर इन टपके अश्रुकणों में,
उस अतीत को हूँ निहारती । 
जिसको विस्मित कर देने को,
जगती मुझको है पुकारती ।
चिरजीवी हो भाई मेरा ! 
जिसको दिखती यह मूक व्यथा । 
दूर बसी इक बहना की,
समझी जिसने अनकही कथा । 
सरस्वती जोशी


Chitrapat

Shri Sampat ji ki kavita " Chitrapat" men meri ankhon ne jo dekha, mere man ne jo samjha, iska editing bhi Sampatji ne hi kiya hai, iske liye unhen hardik dhanyavad.

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