Thursday, March 26, 2015

टूटे रिश्तों या पीड़ा के किरचे

टूटे रिश्तों या पीड़ा के किरचे
टूटे रिश्तों या पीड़ा के किरचे जाने क्यों यूँ उर में बस जाते हैं ।
हम प्रयास कर कर उन्हें भुलाने में अपना समय गँवाते हैं ।
पर वे तो वेदमंत्रों से भी अधिक अहम् बनते जाते हैं । 
पूजा में बैठे मानव तक के मानस पर बादल से आ छा जाते हैं !
अश्रु-धार में नेत्र उन्हें बारंबार बहाते हैं ।
पर वे लौट-लौट मन के कोने में आ आ कर छिप जाते हैं ।
मन करता किसी को ना दिखलाएँ पर होठों पर आ ही जाते हैं ।
सीता हो या शकुंतला सबकी व्यथा-कथा बन जाते हैं ।
रामायण, महाभारत या फिर लघु-कथा बन प्रकट होते हैं ।
कभी पाठ, कभी मिसाल रूप में हम भी उन्हें दोहराते हैं ।
समय के साथ और स्मृतियाँ जब लुप्त सी होने लगती हैं ।
तब भी जाने कैसे उनकी यादें आख़िर तक बच ही रहती हैं ।
"भूलो बीती बातों को..." सब हरदम यह दोहराते हैं ।
पर अपनी बारी आने पर ख़ुद को असमर्थ सा पाते हैं ।
जो टूट गये उनके टुकड़े क्यों यूँ मूल्यवान हो जाते हैं !
हम क्यों न उन्हें विस्मित कर अपने पथ पर आगे बढ़ पाते हैं ?
- सरस्वती जोशी

Wednesday, March 25, 2015

जीवन के रंग

जीवन के रंग
विश्व के चित्रपट पर देखते हैं नित्य चित्र इस जीवन का।
जो लगता है चलचित्र सा, देता है आभास जैसे,
हो किस्सा किसी और का, अनजान से राहगीर का ।
जिसको नहीं हम जानते, अपना नहीं हम मानते ।
जाने क्यों न वैसी लगती हमें उसकी कथा,
जिसकी थी हमें अपेक्षा, समझी थी जिसकी व्यथा ।
पर सहसा नेत्रपट खुल जाते हैं ।
उसके अनगिन पात्रों के बीच कहीं ख़ुद को ही खड़ा पाते हैं !
वेदना से भर कर कुछ सहम से हम जाते हैं !
फिर उसमें दिखते हुए किसी भी भग्न-हृदय मानव की,
करके अवहेलना उस पर हँस नहीं हम पाते हैं !
उस चल-चित्र में जीवन के विभिन्न रंग दिख जाते हैं ।
हर रंग का कोई निशाँ हम अपने वसनों पर पाते हैं !
इन रंगों के भ्रमरजाल में कुछ ऐसे खो जाते हैं ।
के अपने-पराए का भान भूल सब रंगों में समा जाते हैं ।
ऐसे ही फँस कर भ्रमित हो संपूर्ण जीवन बिताते हैं ।
जग-कर्ता की इस माया को समझ नहीं हम पाते हैं !
गर कभी भाग्य चमक उठता औ ज्ञान प्रकाश को पाते है ।
जाने क्यों कर अवहेलना, हो मौन कहीं सो जाते हैं ।
जब जगते हैं तो होता है अपनी भूलों का आभास ।
पुन: एक मौका पाने का करने लगते हैं प्रयास ।
पर भूल-सुधार का मौका सबको नहीं मिल पाता है ।
और यूँ ही पछताता मानव छोड़ जगत को जाता है ।
विदा होता इस जगती से, पुन: प्रकट होने की आस में ।
अगली बार सतर्क रहने के मन में बँधे विश्वास में ।
पर "अगली बार" कब होगी, कैसी होगी ?
यह भी तो है नहीं ज्ञात के होगी भी या ना होगी ?
ज्ञात नहीं है यहाँ किसी को, कोई नहीं है जानता ।
फिरभी जाने क्यों मानव, ना सत्य को पहचानता ।
भ्रमित सा उसका मानस, माया को सत्य मानता !
या शायद सब जान कर भी सत्य से दूर भागता !
अंत:करण की आवाज़ को सुनकर भी नहीं जागता ।
- सरस्वती जोशी

Thursday, March 19, 2015

विदुषी गृहलक्ष्मी

विदुषी गृहलक्ष्मी
हूँ तो निर्धन पर तुम्हें संगिनी ! सबसे महँगा प्रेम प्रदान करूँगा ।
तुम मेरी हो जाओ बस मैं,अपना सर्वस्व तुम्हारे नाम करूँगा ।
शादी के अगले ही दिन मैं, "जोएंट" खाता खुला दूँगा ।
खाते की हालत कुछ भी हो मैं, सारी फ़िकर भुला दूँगा ।
कम से कम जाऊँगा दफ्तर, अपना हर पल तुमको दूँगा ।
तुम संग दिन, तुम संग रात, तुम संग सुबहो शाम रहूँगा ।
तुम पूर्ण शिक्षिता, परम विदुषी, गृह-लक्ष्मी हो है यह मुझको ज्ञात ।
कुशल गृहिणी के सब गुण तुममें, अब न कोई चिंता की बात !
हर आये दिन मैं तुमको, नित नये रंग दिखलाऊँगा ।
बहुत प्यार से कर संबोधन, शिष्टाचार निभाऊँगा ।
पति-भक्ति के चक्रव्यूह में, तुम ऐसी मग्न हो जाओगी ।
विस्मित करके रिश्ते सारे, बस पास मेरे ही आओगी ।
करवा-चौथ, तीज गणगौर, आये दिन उपवास रखोगी ।
मेरे मंगल की कर-कर विनती, जाने क्या-क्या आस रखोगी ।
जीवन किधर बीत जाएगा, होगा न इसका तुमको भान ।
हर पल का सदुपयोग किया, कह पाओगी सीना तान ।
गारंटी मेरी के तुम जब, बच्चों को अतीत सुनाओगी ।
गर्व करोगी अपने उपर, तनिक नहीं शरमाओगी ।
मैं नारी स्वतंत्रता का प्रेमी, तुम्हारे हर गुण को मौका दूँगा ।
चिंता ना करना घर-बाहर का, सब भार तुम्हें सौप दूँगा ।
दूँगा मौका हर निर्णय का, मैं ज़रा न ज़िम्मेदारी लूँगा ।
हो मग्न तुममें, घर बैठा, मैं तो बस "आ-राम" करूँगा ।
हूँ तो निर्धन पर तुम्हें संगिनी ! सबसे महँगा प्रेम प्रदान करूँगा ।
- सरस्वती जोशी

मेरी भाभी

मेरी भाभी 
गौर वर्ण, मासूम सी सूरत, 
निश्छल सी है उसकी चितवन । 
लक्ष्मी जैसी भाभी मेरी,
करती हर पल शिव-आराधन । 
परम विनीता, पूर्ण शिक्षिता,
परहित हेतु सदा रत रहती ।
सहिष्णुता मे लगती मानो,
नारी रूप में आई "धरती" ।
सरल हृदय, हँसमुख स्वभाव,
बालक सी उसकी मुस्कान ।
भैया के मानस की ज्योति,
है वह सर्व गुणों की खान ।
- सरस्वती जोशी



For Dr. Lakshmi Sukhwal

Tuesday, March 17, 2015

बेलन-महिमा

बेलन महिमा : घर में "सम्पत" बनाये रखने के अत्यंत महत्वपूर्ण उपकरण "बेलन" की महिमा ! बेलन की महान महिमा तो केवल नारी ही कह सकती है ।
बेलन-महिमा
बेलन-महिमा हर घर गाता । गरम-गरम रोटी खिलवाता ।
लाल, गुलाबी, नीला, पीला, कई रूप धर सकता है।
लकड़ी, लोहा, पीतल सबसे कुछ पल में बन सकता है ।
मोटा, पतला, जैसा घड़लो, काम में तत्पर रहता है ।
दिखने में सुंदर प्यारा औ छिपे कई गुण रखता है ।
गृहणी का शस्त्र कहलाता । घरकों को सही रास्ते पे लाता ।
अगर कमर में दर्द हुआ हो, मंत्रोच्चार कर बेलन घुमाओ ।
सात बार बोलते जाओ । दर्द से अपने निजात पाओ ।
माँ संझा के किला-कोट में देखो तुम बेलन का रूप ।
सास-हस्त में ऊपर उठ कर दिखलाता भीषण स्वरूप ।
गृहिणी की परम शक्ति का यह है कितना सुंदर प्रतीक ।
जो ऊपर उठ जाये तो बहुओं को कर देता ठीक ।
पर गर हाथ बहू के आए । तो घर में कुराम मचाए ।
बेटी को दहेज में देखो ! कभी भूल मत दे देना ।
सास-बहू के महाभारत का तुम अपयश मत ले लेना !
सकल विश्व की नारी एकता का यह बन सकता प्रतीक ।
मानो चाहे ना मानो पर बात हमारी बिल्कुल ठीक ।
बेलन की घटनाओं पर तो बेलन-पुराण लिख सकते हैं ।
यह तो है हर घर की शोभा अखबार भी महिमा कहते हैं ।
केवल लाईक लिख देना तो अमोघ शस्त्र का है अपमान ।
कुछ और नहीं गर कर पाओ तो झुक कर के तो करो प्रणाम ।
बेलन की महान महिमा तो केवल नारी ही कह सकती है ।
क्योंके वह निष्काम भाव से बेलन-भक्ति करती है ।
यह अर्जुन-भीम की कथा नही जो सभी रहस्य समझ पाएँ ।
वेदव्यास के छक्के छूटें जो बेलन की महिमा गाएँ ।
विषय-चयन में आज कहीं पर भूल जरासी कर दी है ।
कंप्यूटर-भक्त सभी हैं पर बेलन-भक्ति की बात चला दी है ।
हे बेलन ! बहुसंख्यक पुरुषों ने माना आपको पीटनहार !
आज सबक देने को उनको हो जाओ तैयार !
आज शाम हे नारी-रक्षक ! जाना उनसे रूठ !
जब घर में रोटी बेलें तो जाना फटसे टूट !
समझा देना उनको चाहे युग कम्प्यूटरजी का आया !
बेलन की सत्ता-महिमा में फर्क नहीं वह कर पाया !
तव यशोगान की नन्ही कविता भी पढ़ नहीं ये पाते !
"बेलन चालीसा" होता तो जाने क्या कर जाते !
- सरस्वती जोशी

माँ की मुस्कुराहट

माँ की मुस्कुराहट
माँ ! मन करता है,
तुझसे फिर मिल पाऊँ !
वह बचपन की हँसी फिरसे जगा, 
जी भर के खिलखिलाऊँ !
तू मुझको "हँसते समय.
लड़कियाँ दाँत नहीं दिखातीं",
का उपदेश दे समझाए !
पर मेरी नादानी पर,
तुझे भी हँसी आ जाए ।
तू मुझे रोकती जाए,
पर स्वयं खिलखिलाए ।
और समय का वह पल,
बस वहीं पर रुक जाए ।
ऐ काश कि ऐसा हो पाए !
माँ तू मेरे पास बैठ,
फिरसे हँसने के नियम बताए ।
औ मेरे साथ मुस्कुराने के प्रयत्न में,
स्वयं नियम वे भूल जाए ।
- सरस्वती जोशी

Sunday, March 15, 2015

माँ की ममता (हर उस माँ को समर्पित जो अपने पुत्र के स्नेह से वंचित हो,

माँ की ममता
(हर उस माँ को समर्पित जो अपने पुत्र के स्नेह से वंचित हो, उसके लिये तरसती हो ! यह वैसे पाश्चात्य सभ्यता की समस्या अधिक है किंतु अब आधुनिकीकरण के सम्मोहन में फँसे बेटे भारत में भी अधिकाधिक इस ओर अग्रसर होने लगे हैं ! भारत में नित नये वृद्धाश्रम व विधवा-आश्रम कम से कम इसी ओर संकेत करते हैं ! काश मेरा अनुमान गलत निकले ! पता नहीं ! पर मुझे ऐसा आभास हुआ इसीलिये यह कविता लिखी है ! मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि यह कविता सदा चर्चित रहे, कभी इसके लिये "सही कहा है", सुनने को न मिले ।)
ओ मेरे खोये सुहाग की शोभा ! मेरे उपवन के वसंत !
क्यों तुमने झटके से यूँ कर दिया इतनी दूर कि फिर मिल भी न पाएँ !
कि हम सागर में तैरते-तैरते ही डूब जाएँ, पर फासले कम न कर पाएँ !
हमने सदा किया है तुमको सच्चे दिल से इतना प्यार !
तुम्हारे पिता से किये वादे याद रख, रचा इक सपनों का संसार !
तुम में ही मगन हो भूल गये, अपनी व्यथाओं का सारा भार !
सोचने लगे कि तुम ही हो, हमारे तप का सारा सार !
रहोगे सदा बन कर हमारे जीवन का एक सुदृढ़ आधार !
थाम कर के हाथ हमारा हर लोगे जीवन का भार ।
लिया था तुमसे हमने मित्र का इक निश्छल सा नाता भी जोड़ !
पर आज तुमने जाने क्यों सहसा, दिये यूँ बंधन सारे तोड़ !
रुख खींच कर अचानक चल दिये तुम हमसे मुँह मोड़ ।
बेरुखी दिखा अनायास ही अचानक हमारा हाथ छोड़ !
वे प्यारी सी भोली यादें, क्या थीं केवल भ्रम की लड़ियाँ ?
क्या केवल स्वप्न-जाल सी थीं वे हँसती-मुसकाती घड़ियाँ ।
अबतो बचा बस पास हमारे, भग्न अवशेषों का इक ढेर !
वे साथ गुज़रे लम्हे हमारे, थे क्या केवल माया के फेर ?
क्यूँ दिखा दिया कोई न अपना, थी सब कल्पना बेकार !
सोच कर देखो एक बार, क्या वह सब कुछ था नि:सार ?
हम तो जुड़े थे तुम्हीं से, किसके भरोसे अब रहें ?
तुमने हमें ठुकरा दिया क्यों ? यह यातना कैसे सहें ?
तुम हमारी प्रिय संतान हो, हमारे जीवन का अरमान हो !
तुम्हीं हमारा मान-सम्मान हो, हमारे इस कुल की शान हो !
या तो तुम हमारे उर में छिपे स्नेह को पूरा समझ पाते नहीं !
या नियति के फेर से, अनजान से बन, हमारी परीक्षा से हिचकिचाते नहीं ।
याद आते बार-बार वे शब्द, जो सदा तुम्हीं कहते रहे :
"सच्चे हितैषी को आवश्यकता नहीं कि वह करे अपना स्नेह साबित ।
उसे ज़रूरत नहीं कि वह बार-बार, करे अपनी हितैषिता प्रचारित ।
उसकी वाणी में, हाव-भाव में, सदा झलकती है भावना कल्याणकारी ।
उससे उठता सौरभ स्वयं ही, समझा देता जब आती समझाने की बारी ।"
पर क्या यह सब है केवल मात्र भ्रम ? क्या संसार का सत्य इतना निर्मम ?
नहीं ! यह संभव नहीं ! कहते हैं : "सत्य तो स्वयं भगवान होता है !"
"साँच को आँच नहीं !" हर ग्रंथ बार-बार यही कहता है ।
तो सत्य एक दिन अवश्य सामने आएगा, अपना दिव्य प्रकाश फैलाएगा ।
उसकी ज्योति के समक्ष तुम्हारा भ्रम का अंधेरा मिट जाएगा ।
पर हाँ ! लगता है, जब वह घड़ी पास हमारे आएगी ।
नियति निर्णय ले लेगी औ फिर देर बहुत हो जाएगी ।
हमारा स्नेह विकल टूटा उर इतनी पीड़ा ना सह पाएगा ।
यह पंछी उड़कर शायद कहीं दूर जा कर बस जाएगा ।
एक अनजान सूने से जगत में, जहाँ से देख तो तुमको पाएगा ।
गर दिखा उदास चेहरा तुम्हारा, तो आँसू भी बहाएगा ।
पर वह फिर से हाथ पकड़ कर,मदद नहीं कर पाएगा ।
दूर कहीं से बेबस सा, बस पीड़ा में घुलता रह जाएगा ।
हमें ज्ञात है उस दिन तुम्हारा निश्छल सा सरल हृदय पिघल जाएगा ।
छोड़ अपनी सारी कटुता को, फिर मूल रूप में आ जाएगा ।
हमें गलत समझने की भूल पर, अवश्य ही बार-बार पछतायगा ।
लेकिन जो तुमने खोया होगा, वह फिर न पाया जायेगा ।
और उस दिन बेटे ! तुम्हारा हृदय कुछ ऐसे प्रश्न पूछ लेगा ।
जिनके उत्तर तो देने होंगे, पर तुमको कष्ट बहुत होगा ।
एक बार फिर आस बाँध हम करते विनती दोनों कर जोड़ :
"बेटे ! सुन ले विनय हमारी, ना यूँ हमसे नाता तोड़ !"
मानो ना मानो मेरी यह इच्छा, "जैसी भी हो भगवद्इच्छा !"
"प्रभु तुम्हें सद्बुद्धि दें, सदा सन्मार्ग पर चलाएँ !
जीवन का हर रोड़ा तुम्हें छोड़ कर, मेरे मारग में आ जाए !"
अपने कुल की लाज आज हम तुम्हारे हाथों में धरते हैं !
इसकी रक्षा का दायित्व तुम्हारा ! हम तुमसे विनती करते हैं !
बस इसी कामना के संग तुमसे आज विदाई लेते हैं !
तुम कहीं रहो, ख़ुश रहना बेटे ! दिल से दुआ हम देते हैं !
- सरस्वती जोशी

ठोकरें

ठोकरें 
माना मानव-जीवन में ठोकरें भी उपयोगी साबित होती हैं। 
प्राणी को भूलों को सुधार कुछ करने को प्रेरित करती हैं ।
फिरभी इनसे मिली व्यथा कुछ ऐसे घाव बना देती है ।
जो शूल बन कर, हृदय बेध, नासूर सी चुभती रहती हैं ।
जिनकी व्यथा को भूलने का अथक प्रयास निरंतर चलता ।
पर चाहें जितना विस्मित करना, दर्द उतना ही है बढ़ता ।
मानव के मन के इक कोने में जा ये सुधियाँ बसेरा कर लेती हैं ।
औ बार बार स्मृतियों में आ-आ उसकी मुस्कानों को हर लेती हैं ।
काश कोई मरहम ऐसा हर प्राणी को मिल जाए ।
के वह हर ठोकर से ले शिक्षा, उसकी सुधियों को बिसरा पाए ।
सरस्वती जोशी

Sunday, March 8, 2015

कब तक बहती ही रहेगी धरती पर यह अश्रु धारा ?

कब तक बहती ही रहेगी धरती पर यह अश्रु धारा ?
जाने क्या ले जाए बहा यह अविरत बहता जल खारा !
शायद सागर के जल में भी इसकी ही बूँदे हैं समाई ।
और फिर विष्णु का निवास होने पर भी उसको मीठा ना कर पाईँ ।
- सरस्वती जोशी
काश नारी के अस्तित्व को भी उचित मान्यता मिल जाए !
काश नारी के अस्तित्व को भी उचित मान्यता मिल जाए !
पुरुष-विहीन नारी केवल पंच तत्व का पुतला नहीं,
इक सजीव सचेतन प्राणी है, इसकी सुध समाज को आ जाए !
चूहे के मरने पर चुहिया तक अशुभ नहीं बन जाती है ।
पर पति या पुत्र विहीन नारी तत्काल यह पद पा जाती है !
कभी परित्यकता, कभी निपूती, कभी विधवा, कभी दुहागिन,
कर्मजली या माँगजली, निपट अभागिन कहलाती है ।
शुभ कार्य हेतु जाते समय गर उसे सामने पा जाते हैं ।
तो मुँह बना घर में घुस जाते, आशंका से घिर जाते हैं ।
पूजा-पाठ-ब्याह-शादी की या उत्सव की घड़ियाँ आती हैं ।
तो उसकी नहीं अपेक्षा कोई, वह अवहेलना ही पाती है ।
पग-पग पर वह मानवी पशु से भी निम्न स्तर पाती है ।
सब कुछ समझ कर भी शांत भाव से एकांत में अश्रु बहाती है ।
जो उसकी असल समस्या है उसको सब बिसरा देते हैं ।
पति-पुत्र के कंधे पर ना जाए तो अभागिन की संज्ञा देते हैं !
उसके ही कर्मफल को दे दोष उसे सरलता से ठुकरा देते हैं ।
हो मूक, ले यह बोझ जीने को विवश उसे बना देते हैं ।
ऊपर से कहते सब : "नहीं नहीं ! अबतो नारी हर पदवी पा सकती है ।
मंत्री अफसर कुछ भी बन कर मोटा वेतन ला सकती है ।"
नारी जीवन की नियति यही यह बात उसे समझा देते हैं ।
औ उसके त्याग-तपस्या पर स्तुतियाँ लिख छपवा देते हैं ।
- सरस्वती जोशी

Saturday, March 7, 2015

कितना दुर्लभ है व्यथा-बाँट मन हल्का करना

 कितना दुर्लभ है व्यथा-बाँट मन हल्का करना 

कितना दुर्लभ है व्यथा-बाँट मन हल्का करना या कराना ।

आज के व्यस्त जीवन में कोई वेदव्यास या वाल्मीकि पाना ।
जब कोई अपनी व्यथा बाँट चाहता है अपना मन हल्का करना ।
या मदद-सलाह की आस में, चाहता कुछ आ कर सुनाना ।
तो अचानक हमारा रुख बदल सा जाता है ।
ऊबने का भाव अचानक उर में उभर कर आता है ।

व्यस्त जीवन है सभी का, सबका अपना भी सुख-दुख होता है ।
आदि आदि के विचार से श्रोता धीरज खो देता है ।
हालाँके एक पुण्य सा करता जो दुख बँटा मन हल्का कर देता ।
पर यह इतना दुर्लभ के जगती में मानव इस हेतु है रहता तरसता ।
वैसे चाहे हम हर कदम पर पर-दुख सुनते और सुनाते हैं ।
रामायण-महाभारत से ग्रंथ ले कर के पढ़ते और पढ़ाते हैं ।

उनकी पर-दुख की कथाएँ सब बार-बार दोहराते हैं ।
जिनको ना जाना ना जानेंगे उनके लिये भावुक से बन जाते हैं ।
उनके सुख में हँसते खुश होते, दुख में अश्रु बहाते हैं ।
पर जो कोई दुखियारे आ कर अपना कष्ट बताते हैं ।
तो पाँच मिनिट में उकता कर हम अपना मुँह बनाते हैं ।
रहीम के : "रहिमन अँसुआ नयन ढरि...." को बेझिझक दोहराते हैं ।

जाने कैसे हम यह बात बिल्कुल विस्मित कर जाते हैं ।
राम-सिया के कष्टों को ही तो पंडित हमें सुनाते हैं ।
वेदव्यास भी पांडवों के सुख-दुख को बढ़ा-चढ़ा बताते हैं ।
तुलसी-मीरा-सूर-कबीरा के दुख हमको छू जाते हैं ।
पर जीवित परिचित मानव को इस हेतु अक्सर तरसाते हैं ।
पर यही जगत की रीत है सोच स्वयं को समझाते हैं ।

औ पर दुख से अनछुए से बन हम चैन से सो जाते हैं ।
नींद नहीं आए तो रामायण आदि की चौपाइयों को गाते हैं !
या फिल्मी हीरो की व्यथा के गानों को गुनगुनाते हैं ।
या फिर किसी और साधन से अपना मन बहलाते हैं ।

- सरस्वती जोशी

Friday, March 6, 2015

अमी-विष भरा यह जीवन

अमी-विष भरा यह जीवन
प्रभु ! तुमने इक बार पिया विष,
तो पूज्य मान कर तुमको,
हर ग्रंथ बढ़ा-चढ़ा कर के,
गुणगान तुम्हारा करता है ।
जब के तुम तो थे अमर नाथ !
तुम्हारा ही रचित किया विष,
वध न तुम्हारा कर सकता है ।
माना के तुमको मिला श्रेय प्रभु !
हर कष्ट भयानक जगती का,
उसकी रक्षा कर देने का ।
पर क्या सच में खतरा था तुमको,
उस विष से कुछ खो देने का ?
मर्त्य लोक का प्राणी तो प्रभु !
कदम-कदम पर अश्रु पोंछ कर,
यह भीषण विष चखता है ।
मीरा या प्रहलाद बना वह,
मान कर प्रसाद तुम्हारा,
शीश चढ़ा कर पी लेता है ।
वैसे भी वह विवश बिचारा,
औ कर भी क्या सकता है !
शक्ति माँगता पी पाने की,
औ तुम्हें याद कर लेता है ।
हास-अश्रु या विष-अमृत के,
जीवन को बस जी लेता है ।
अगले जन्म से मुक्ति हेतु कुछ,
जप-उपासना कर लेता है ।
कहते हैं यह तो सब उसके,
कर्मानुसार ही होता है ।
जैसे जितने कर्म कियें हों,
अमृत या विष मिलता है ।
रोक नहीं पा रहे इसीसे,
एक प्रश्न हम पूछेंगे ।
क्षमा करें अपराध हमारे,
आशा है रुष्ट नहीं होंगे ।
आपने भी कष्ट देखे जीवन में,
बन सुदृढ़ पग-पग पर यहाँ,
भीषण विषों का पान किया ।
दक्ष पुत्री सती को त्यागा,
पिता-पति परित्यकता ने जा,
यज्ञाग्नि में आत्म दाह किया ।
विरह विकल हो कर के आप,
शव ले कर चहुँ ओर गये ।
उसको पूजित करा धरा पर,
शक्ति पीठ स्थापित किये ।
श्याम वर्ण काली भी तो,
किसी कष्ट से होकर पीड़ित,
देह-त्याग गौरी (गणगौर/ गौरल) बन आई ।
तभी उसने सही पदवी,
सच्ची सुहागिनी की पाई ।
मिलन-विरह, सुख-दुख में जैसे,
गोते खाता पृथ्वी का मानव ।
जीवन के विविध विषों का प्रभु !
आपको भी उतना ही अनुभव ।
इसी लिये मैं हाथ जोड़ कर,
माँग रहे वर कर के विनती ।
क्या धरती के मानव को भी प्रभु !
दे दोगे इतनी सी कुछ शक्ति !
या कोई सरल उपाय बतादो,
जो उसके उर में भर दे भक्ति !
औ विष-पानों से मानव को,
दिला सके थोड़ी सी मुक्ति ?
- सरस्वती जोशी

Wednesday, February 25, 2015

संपत मानता है पिता का अहसान ।

हार्दिक बधाई व शुभ कामनाएँ भैया ! 

संपत मानता है पिता का अहसान । 
पर वह केवल पिता हेतु नहीं जन्मा, 
पिता को लेना है जान ।

उसका क्षेत्र असीम जगत में,
सबसे है उसकी पहचान । 
उसकी कलम हर घर में जाती,
सबको अपना कोई मान । 
दुखिया के आँसू हों या फिर,
होए सुखिया की मुस्कान । 
चाहे हो परम ज्ञान का दाता,
या वह जिसमें भरा हुआ अज्ञान । 
सबके घर में झाँक देख वह,
उनके जीवन को लेता पहचान । 
डाल रोशनी आँख खोलता,
पीर बँटाता रख कर ध्यान ।
इसमें कब दिन ढल जाता है,
इसका उसे नहीं है भान । 
बस पर हित हेतु समर्पित जीवन,
हर पल का करता है दान । 
ईश्वर उसकी कलम को इतनी,
दिव्य शक्ति से युत कर दे । 
के वह हर घर में जा जा कर,
जन-जन की पीड़ा हर ले ! 
- सरस्वती जोशी

कन्या-वध / भ्रूण हत्या

कन्या-वध / भ्रूण हत्या
बेटी, कन्या या नारी के भागय की बात आई तो जग कर्ता तक गया हार ।
उसका जीवन-मरण या भू पर आगमन मानव ने ले लिया हाथ ।
रक्षक कब तक्षक बन डस लें वह यह जान नहीं सकती ।
औ विडंबना यह के इसमें जगकर्ता या भाग्यविधाता तक की है ना इक पल भी चलती ।
सृष्टिकर्ता स्वयं यहाँ अपनी सृष्टि से हार रहा है ।
सोनोग्राफी / ईकोग्राफी के यंत्रों को विवश सा हो निहार रहा है ।
बहुत था अभिमान उसको के वह मानव सी सृष्टि रचा रहा है ।
पर आज विवश सा मानव की करनी को देख अश्रु गिरा रहा है ।
अपना क्रोध प्रकट करने को कई कहर भी ढहाता है ।
पर मानव उनको तक कर नियंत्रित अपने मन की बात चलाता है ।
कन्या-वध जैसा जघन्य कृत्य खुले आम कर आता है ।
औ इक पल को भी मन उसका ज़रा नहीं घबराता है ।
वैसे तो जब भी चाहे जग ईश्वर-ईश्वर चिल्लाता है ।
पर कन्या-वध पातक करने में संकोच नहीं दिखाता है ।
ईश्वर का या नर्क-यातना का भय ना उसे सताता है ।
प्रायश्चित करने को इसका मंदिर तक ना जाता है ।
किसी बोझ या पाप-भावना का भय ना उर में लाता है ।
बस चिकित्सकों को धन्यवाद में कुछ सिक्के ले थमाता है ।
औ ऋण या दंड या कष्ट मुक्त सा हँसता सा घर को आता है ।
बोझ-मुक्त सा मान स्वयं को मन में ग्लानि तक ना लाता है ।
वैसे तो पशु-पक्षी तक की रक्षा की गुहार लगाता है ।
कभी ईश तो कभी नर्क का नाम ले-ले डराता है ।
कन्या-वध या भ्रूण-हत्या की बारी आए तो तनिक नहीं विचलित होता ।
ना कोई अपराध-भावना, ना डर यम का ना धर्मराज का,
ना ही बोझ पाप-कर्म का, निर्भय हो घर में है सोता ।
हे प्रभु ! अब तो इतनी नगण्य औ बेबस है जगती की कन्या या नारी ।
उसके अस्तित्व तक पर आन पड़ी है औ है वह बस बेबस बेचारी ।
क्या उसके रक्षक बन कर हरि ! कोई चमत्कार करोगे ?
क्या इस क्रूरता का हल निकाल तुम कन्या /नारी का बेड़ा पार करोगे ?
हे जग रक्षक ! जग के इस बेबस प्राणी पर कब करुणा का संचार करोगे ?
कब तक मान नगण्य उसे शेष-शैया पर निश्चिंत हो विश्राम करोगे ?
-सरस्वती जोशी

Monday, February 23, 2015

अपनत्व की आस

अपनत्व की आस
बचपन तो बीता गौरी का साधारण से घरबार में ।
पर बाप को थी "खाँत" कि ब्याहे किसी ऊँचे परिवार में ।
आखिर उसने एक बड़ा घर भाग दौड़ कर ढूँढ लिया ।
गदगद हो कर पूरे मन से उसने कन्यादान किया ।
जब फेरे हो ससुराल गई तो माँ ने लंबी लिस्ट थमाई ।
"इन सब से तेरा रिश्ता अब से," कह कर बस दे दी थी विदाई ।
हालाँके स्पष्ट नहीं बोली पर उसकी बात समझ में आई ।
"अब से होगा वह घर तेरा ! बहू वहाँ की ! यहाँ की है तू केवल "जाई" ।"
जाने कैसे वह भूल गई के : बेटी उसकी है "ग़रीब की जाई" ।
बस आनंदित थी सोच-सोच : "बड़े घर में है बेटी ब्याही ।"
औ गौरी पहुँच गयी वहाँ पर भूल कर हर रिश्ता पुराना ।
ध्येय जीवन का उसने बनाया : "बस सबका अपनत्व पाना ।"
मान-अपमान की व्याख्या भूली, सब को मन से अपना मान ।
रिश्ते निभाने के नाम पर ही वह होती रही बार-बार कुर्बान ।
सोचा : कभी तो अपनाएँगे समझ कर हमको भी अपना ।
भूल जग मिथ्या माया जाल, बस है यह एक विचित्र सा सपना ।
स्नेह की लौ जला, अपनत्व की आस में, एक ही ध्येय पर अडिग हो अड़ी रही ।
जब कि सबको कितने ही काम थे, औ गौरी तो नगण्य में भी थी नहीं ।
जिनको पिघलना ही नहीं था, वे तो कभी पिघले नहीं ।
गौरी जिंदगी को निचोड़ कर पूरती रही दिये में कि जलता रहे, बुझ न जाए कहीं !
भूली रिश्ता हरि तक का, पर नादानी नज़र न आई कभी ।
ना सोचा के क्षणभंगुर जीवन इसी में न बीत जाए कहीं !
जब होश में आई, औ सत्य आया समझ में, तो देखा इसी में, उमर बीत गई युँही !
कितने ज़रूरी काम, सब रह गये अधूरे, क्या समय को यूँ खोना था सच में सही ?
जीवन का ध्येय अब तो मालूम था उसे, पर पूरा करने का समय तो बचा ही नहीं !
अब होश भी उसको था चुभता हृदय में, काश सत्य का भान होता ही नहीं !
जा पाती जगत से झूठी ही आस ले कर,जीवन को व्यर्थ खोने का अहसास होता नहीं ।
तसल्ली से आँखें मूँद लेती सदा को, खुद को अंधों सा नासमझ तो पाती नहीं !
विचलित सी हो जाती थी वह, इक प्रश्न पूछता था उसका मन !
अपनत्व की आस में तरसते से दौड़ो, क्या बस इसी को कहते हैं नारी-जीवन ?
सरस्वती जोशी

Sunday, February 22, 2015

उपहार

उपहार
आज चाहते तुमको देना कोई सुंदर सा उपहार ।
यही ढूँढने निकले थे और देख लिया सारा बाज़ार । 
यूँ तो कितनी ही चीजें थीं लगती भी थीं सब अनमोल ।
छाँट रहे थे लोग उन्हें पर अपने नोटों से कुछ तोल ।
हमको उनमें छिपा दिखा कुछ उनके नोटों का अभिमान ।
और लगीं वे सौगातें कुछ फीकी-फीकी औ बेजान ।
तुमको देने लायक हो कुछ ऐसा कुछ भी नहीं मिला ।
हँस करके रख पाएँ आगे हो कुछ ऐसा खिला-खिला ।
जब घर लौटे तो मन भीतर से कुछ थोड़ा हुआ उदास ।
क्या भेजें, कैसे कुछ पाएँ, मिल जाता हमको कुछ काश ।
यही सोचते अपने में ही गहराई में डूब गये ।
और देख कर चमक किसी की विस्मित से हम चौंक गये ।
भीतर कहीं बचे थे बाकी थोड़े से मुस्कानों के कण ।
क्यों न भेज दूँ इन्हें बीन कर लगा पूछने मेरा यह मन ।
पड़े रह गये अगर यहीं तो कभी खार से भर जाएँगे ।
और बनेंगे सभी व्यर्थ ये किसी काम ना आएँगे ।
पर कितने थोड़े हैं ये तो सोच यही होता संकोच ।
पर गर तुम अपने हो तो क्या देखोगे तुम इनका बोझ ?
भेज रहे हैं हम तुमको यह अपना छोटा सा उपहार ।
मान हमें अपना तुम देखो कर लेना इसको स्वीकार !
- सरस्वती जोशी

Wednesday, February 18, 2015

कृतज्ञता या आभार (नेकी कर दरिया में डाल )

कृतज्ञता या आभार (नेकी कर दरिया में डाल )
कितने अजीब हैं इस जगती के नियम !
ईश्वर ने मानव को बना उर में विभिन्न भावों का संचार किया ।
याद रख उनके लाभ-अलाभ, सहने की क्षमता का भी दान किया ।
कितने अद्भुत गुण-प्रतिभा से कर युक्त उसने उसका सम्मान किया ।
पर जाने क्यों एक कमी रख भेजा, जिससे वह मुक्त नहीं हो पाता ।
हर मानव को सदा-सदा ही बस अपना ही दुख नजर है आता ।
दूजे का कष्ट पर्वत से तिनका, ख़ुद का तिनका भी पर्वत बन जाता ।
कोई कितना भी करे त्याग पर अक्सर एक दिवस ऐसा है आता ।
जब मानव हर परोपकार को कर विस्मित मन से दूर भगाता ।
हाँ ! यह सच है के पर के प्रति भावों से भर-भर, हम अपना समय नहीं खो सकते ।
अपने क्षणभंगुर जीवन के पल हम औरों के व्यर्थ नहीं दे सकते ।
पर अकृतज्ञ से बन कर दूरी दिखलाना क्या आवश्यक है ?
आभार भले ना दिखलाएँ पर मुँह छिपाना क्या आवश्यक है ?
लेकिन अक्सर होता यही, और कितने दिल टूट जाते हैं ।
जिनको मन से चाहा हो वे ही दूर चले जाते हैं ।
इसलिये नहीं के उनको आगे किसी हानि का भय लगता हो ।
केवल अतीत का आभार मानो कोई बोझ सा बन जाता हो ।
जैसे कोई हर आभार उन्हें स्मृतियों में आ सताता हो ।
औ मन की शांति हेतु यह करना आवश्यक हो जाता हो ।
अकृतज्ञ ना कहलाने को, दूरी लेना मज़बूरी बन जाता हो ।
जिसने कभी उपकार किया हो वह प्राणी नहीं सुहाता हो ।
अक्सर यही देखते हैं हालाँके सुनने में विचित्र सा लगता है ।
और हर बार हृदय में बरबस ही एक प्रश्न उठ जाता है :
"भलाई-दूरी या बिछोह में क्या कोई अटूट सा नाता है ?"
पर यह सवाल हम खुल कर के तो कभी पूछ ना पाते हैं ।
ओछी सोच वालों की श्रेणी के भय से हम सहसा डर जाते हैं ।
"नेकी कर दरिया में डाल," जैसी कहावतें बनाते हैं ।
कई बार बस मन ही मन अपनी नेकी का शोक मनाते हैं ।
"क्यों की थी हमने वह नेकी ?" यह सोच-सोच पछताते हैं ।
औ फिर इस तुच्छ विचार के कारण ईश्वर से डर जाते हैं ।
"अब न कभी ऐसा सोचेंगे," इसकी कसमें खाते हैं ।
औ अपनी ही उस की नेकी के बोझ तले दब जाते हैं ।
हे ईश्वर ! कैसी माया है तेरी, है यह कितने रंगों वाली !
मानव-मन के भीतर बैठी विचित्र सी सतरंगी जाली !
सरस्वती जोशी

Monday, February 16, 2015

सब जोड़ते जग के रिश्तों को

सब जोड़ते जग के रिश्तों को जाने क्यों लगा दो तरफा आस !
जब बदले में दान नहीं पाते तो अश्रु बहाते हो निराश ।
आवश्यक तो नहीं मिले हर याचक को मन चाहा दान ।
ज्ञात है यह बात फिर भी रखते हैं उर में अरमान ।
जो सच में दो तरफा रिश्ते में करता है पूरा विश्वास ।
उसकी सुध तो नहीं हृदय में हालाँके वह हर पल पास ।
काश केवल देने में ही सुख पाने की सोचे बात ।
बदले में कुछ भी ना पाए तो भी हो ना कभी उदास ।
तो मुक्त हुआ पर निर्भरता से वह पा जाए सुख का भंडार ।
कई कष्ट पल में मिट जाएँ, समझ सके जीवन का सार ।
सरस्वती जोशी

Tuesday, January 6, 2015

विपरीतता की मित्रता

विपरीतता की मित्रता
धूप-छाँव, दिन औ रात, मिलन-विरह औ सुख-दुखादि सब हैं कितने विपरीत !
फिरभी कहते हैं : "इनके जोड़े हैं, है इनमें आपस में प्रीत !
स्नेह भाव रखते आपस में इक दूजे का साथ निभाते ।
इक दूजे का मान बढ़ाने की खातिर ही ख़ुद हैं मिट जाते ।"
यह विपरीतता की मित्रता हम कभी ना समझ पाये !
ये भोर और संझा के साये, इनमें कितने रंग समाये ।
प्रभात की लाली से निकलते बाल सूर्य की सुस्मित किरणें ।
उनकेअंतर में पलते कितने मीठे-मीठे सपने ।
खिलती कलियों का मधुर हास । पवन से उनका हास-विलास ।
कड़ी धूप का उष्ण ताप । मुरझाने का उर में संताप ।
मन में छिपे ढेरों अरमान । जो पूरे हुए उनका अभिमान ।
अधूरों को पूरा करने का प्रयास । अस्ताचल को जाते सूरज का त्रास ।
धिर आगे बढ़ता यह अंधकार । जिसमें सिमटेगा यह संसार ।
बस एक किरण करती शक्ति संचार । फिर आयेगी प्रभात की बयार ।
पुन: आयेगा खिलता वसंत । होगा इस पतझर का अंत ।
वही मुरझाया फूल नया बन खिलेगा । उसे उसका सौरभ फिरसे मिलेगा ।
कभी प्रात आता ले सुखद सी बयार ! कभी डूब जाता सूरज करके अंधकार !
पतझर की कृपा से सुहाता वसंत ! जन्म को महत्व दिलाता है अंत !
पर समझ में न आता जो फिरसे था देना । तो क्यों था ज़रूरी जो था उसको लेना ।
कहते हैं यही है प्रभु की माया का खेल । कभी कराती विरह, कभी होता मेल ।
सरस्वती जोशी

Monday, January 5, 2015

वे नव वर्ष के प्रतीक्षा भरे पल

वे नव वर्ष के प्रतीक्षा भरे पल
हर जाती साँस के साथ, हर आती आस के साथ,
हमने किया था इंतज़ार ! हाँ ! हमने किया था बहुत इंतज़ार !
तरसती निगाहों से फोन की ओर देखा था बार-बार !
हर मुबारकवाद को आती घंटी मानो कर रही थी हृदय पर प्रहार !
पूछ रहा था मन : "क्यों जीवन में ऐसे गये हम हार ?"
हर आता शुभ संदेश भी फीका सा लग रहा था ।
मन में तुम्हारा स्वर सुनने का अरमान जग रहा था ।
कितने ही संदेश आये, पर कोई मन को न भा रहा था !
हालाँके वह हर बार शुभ कामना ही ला रहा था ।
लेकिन हुई नहीं पूरी हमारी उम्मीदों की फरियाद !
तुमको नही करना था, तो नही ही किया हमको याद ।
ज्ञात है हमको कि यह है घर-घर की कहनी ।
इस क्षणभंगुर से जीवन में होती नहीं हर घड़ी सुहानी !
सबसे निकटस्थ ही सबसे पहले दूरी ले लेते हैं ।
बहुत चाहने पर भी अक्सर स्नेह घटा ही देते हैं ।
फिर भी आँचल पर आँखों से कुछ बूँदें गिरने ही लगीं ।
ज्ञान के हर रंग को फीका सा करने ही लगीं ।
उर में अतीत की जाने कितनी स्मृतियाँ उभरने सी लगीं ।
मन डूब गया उनमें और रात फिसलने सी लगी !
एक के बाद एक कितने परत खुलते ही रहे ।
नव वर्ष की रात के सब रंग घुलते ही रहे ।
यह तो नहीं कह पाएँगे कि : "वे सारे बीते थे उदास,"
हालाँके साथ में हर बार निकली थी इक गहरी उसाँस ।
लेकिन हम बीच-बीच में कई बार मुस्कुराये !
अतीत के कितने ही वसंत मानो इस बगिया में खिल आये ।
यूँही जाने कब, गीले आँचल में ही, हम नींद में सो गये ।
और तुम से ही जुड़े सुंदर से सपनों में खो गये !
बहुत सुहाने कोमल से थे वे सारे ही प्यारे सपने !
मेरी ममता की छाया में, बैठे थे तुम बन कर अपने ।
पर जगती की माया ने उनको टिकने नहीं दिया !
नव वर्ष की रात बीत गई औ दिन निकल ही गया ।
देखा : नव-वर्ष की तो कई घड़ियाँ गईं निकल !
मन बोला : "उठ ! कर्म पर लग, भूल रात का हर पल ।
अब कुछ भी नया नहीं, न कोई संदेश आयगा ।
न अब कोई तुम्हें मुबारक़वाद भिजायेगा ।"
तब से हम भी औरों की तरह खुद को समझाने में लगे हैं ।
जीवन का सत्य समझ, ख़ुद को मज़बूत बनाने में लगे हैं ।
अब न मन अशांत, न ही कोई इंतज़ार !
"मरुथल में न आता वसंत," दोहरा लेते हैं बार-बार !
सरस्वती जोशी