Sunday, March 8, 2015

कब तक बहती ही रहेगी धरती पर यह अश्रु धारा ?

कब तक बहती ही रहेगी धरती पर यह अश्रु धारा ?
जाने क्या ले जाए बहा यह अविरत बहता जल खारा !
शायद सागर के जल में भी इसकी ही बूँदे हैं समाई ।
और फिर विष्णु का निवास होने पर भी उसको मीठा ना कर पाईँ ।
- सरस्वती जोशी
काश नारी के अस्तित्व को भी उचित मान्यता मिल जाए !
काश नारी के अस्तित्व को भी उचित मान्यता मिल जाए !
पुरुष-विहीन नारी केवल पंच तत्व का पुतला नहीं,
इक सजीव सचेतन प्राणी है, इसकी सुध समाज को आ जाए !
चूहे के मरने पर चुहिया तक अशुभ नहीं बन जाती है ।
पर पति या पुत्र विहीन नारी तत्काल यह पद पा जाती है !
कभी परित्यकता, कभी निपूती, कभी विधवा, कभी दुहागिन,
कर्मजली या माँगजली, निपट अभागिन कहलाती है ।
शुभ कार्य हेतु जाते समय गर उसे सामने पा जाते हैं ।
तो मुँह बना घर में घुस जाते, आशंका से घिर जाते हैं ।
पूजा-पाठ-ब्याह-शादी की या उत्सव की घड़ियाँ आती हैं ।
तो उसकी नहीं अपेक्षा कोई, वह अवहेलना ही पाती है ।
पग-पग पर वह मानवी पशु से भी निम्न स्तर पाती है ।
सब कुछ समझ कर भी शांत भाव से एकांत में अश्रु बहाती है ।
जो उसकी असल समस्या है उसको सब बिसरा देते हैं ।
पति-पुत्र के कंधे पर ना जाए तो अभागिन की संज्ञा देते हैं !
उसके ही कर्मफल को दे दोष उसे सरलता से ठुकरा देते हैं ।
हो मूक, ले यह बोझ जीने को विवश उसे बना देते हैं ।
ऊपर से कहते सब : "नहीं नहीं ! अबतो नारी हर पदवी पा सकती है ।
मंत्री अफसर कुछ भी बन कर मोटा वेतन ला सकती है ।"
नारी जीवन की नियति यही यह बात उसे समझा देते हैं ।
औ उसके त्याग-तपस्या पर स्तुतियाँ लिख छपवा देते हैं ।
- सरस्वती जोशी

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