कृतज्ञता या आभार (नेकी कर दरिया में डाल )
कितने अजीब हैं इस जगती के नियम !
ईश्वर ने मानव को बना उर में विभिन्न भावों का संचार किया ।
याद रख उनके लाभ-अलाभ, सहने की क्षमता का भी दान किया ।
कितने अद्भुत गुण-प्रतिभा से कर युक्त उसने उसका सम्मान किया ।
पर जाने क्यों एक कमी रख भेजा, जिससे वह मुक्त नहीं हो पाता ।
हर मानव को सदा-सदा ही बस अपना ही दुख नजर है आता ।
दूजे का कष्ट पर्वत से तिनका, ख़ुद का तिनका भी पर्वत बन जाता ।
कोई कितना भी करे त्याग पर अक्सर एक दिवस ऐसा है आता ।
जब मानव हर परोपकार को कर विस्मित मन से दूर भगाता ।
हाँ ! यह सच है के पर के प्रति भावों से भर-भर, हम अपना समय नहीं खो सकते ।
अपने क्षणभंगुर जीवन के पल हम औरों के व्यर्थ नहीं दे सकते ।
पर अकृतज्ञ से बन कर दूरी दिखलाना क्या आवश्यक है ?
आभार भले ना दिखलाएँ पर मुँह छिपाना क्या आवश्यक है ?
लेकिन अक्सर होता यही, और कितने दिल टूट जाते हैं ।
जिनको मन से चाहा हो वे ही दूर चले जाते हैं ।
इसलिये नहीं के उनको आगे किसी हानि का भय लगता हो ।
केवल अतीत का आभार मानो कोई बोझ सा बन जाता हो ।
जैसे कोई हर आभार उन्हें स्मृतियों में आ सताता हो ।
औ मन की शांति हेतु यह करना आवश्यक हो जाता हो ।
अकृतज्ञ ना कहलाने को, दूरी लेना मज़बूरी बन जाता हो ।
जिसने कभी उपकार किया हो वह प्राणी नहीं सुहाता हो ।
अक्सर यही देखते हैं हालाँके सुनने में विचित्र सा लगता है ।
और हर बार हृदय में बरबस ही एक प्रश्न उठ जाता है :
"भलाई-दूरी या बिछोह में क्या कोई अटूट सा नाता है ?"
पर यह सवाल हम खुल कर के तो कभी पूछ ना पाते हैं ।
ओछी सोच वालों की श्रेणी के भय से हम सहसा डर जाते हैं ।
"नेकी कर दरिया में डाल," जैसी कहावतें बनाते हैं ।
कई बार बस मन ही मन अपनी नेकी का शोक मनाते हैं ।
"क्यों की थी हमने वह नेकी ?" यह सोच-सोच पछताते हैं ।
औ फिर इस तुच्छ विचार के कारण ईश्वर से डर जाते हैं ।
"अब न कभी ऐसा सोचेंगे," इसकी कसमें खाते हैं ।
औ अपनी ही उस की नेकी के बोझ तले दब जाते हैं ।
हे ईश्वर ! कैसी माया है तेरी, है यह कितने रंगों वाली !
मानव-मन के भीतर बैठी विचित्र सी सतरंगी जाली !
सरस्वती जोशी
ईश्वर ने मानव को बना उर में विभिन्न भावों का संचार किया ।
याद रख उनके लाभ-अलाभ, सहने की क्षमता का भी दान किया ।
कितने अद्भुत गुण-प्रतिभा से कर युक्त उसने उसका सम्मान किया ।
पर जाने क्यों एक कमी रख भेजा, जिससे वह मुक्त नहीं हो पाता ।
हर मानव को सदा-सदा ही बस अपना ही दुख नजर है आता ।
दूजे का कष्ट पर्वत से तिनका, ख़ुद का तिनका भी पर्वत बन जाता ।
कोई कितना भी करे त्याग पर अक्सर एक दिवस ऐसा है आता ।
जब मानव हर परोपकार को कर विस्मित मन से दूर भगाता ।
हाँ ! यह सच है के पर के प्रति भावों से भर-भर, हम अपना समय नहीं खो सकते ।
अपने क्षणभंगुर जीवन के पल हम औरों के व्यर्थ नहीं दे सकते ।
पर अकृतज्ञ से बन कर दूरी दिखलाना क्या आवश्यक है ?
आभार भले ना दिखलाएँ पर मुँह छिपाना क्या आवश्यक है ?
लेकिन अक्सर होता यही, और कितने दिल टूट जाते हैं ।
जिनको मन से चाहा हो वे ही दूर चले जाते हैं ।
इसलिये नहीं के उनको आगे किसी हानि का भय लगता हो ।
केवल अतीत का आभार मानो कोई बोझ सा बन जाता हो ।
जैसे कोई हर आभार उन्हें स्मृतियों में आ सताता हो ।
औ मन की शांति हेतु यह करना आवश्यक हो जाता हो ।
अकृतज्ञ ना कहलाने को, दूरी लेना मज़बूरी बन जाता हो ।
जिसने कभी उपकार किया हो वह प्राणी नहीं सुहाता हो ।
अक्सर यही देखते हैं हालाँके सुनने में विचित्र सा लगता है ।
और हर बार हृदय में बरबस ही एक प्रश्न उठ जाता है :
"भलाई-दूरी या बिछोह में क्या कोई अटूट सा नाता है ?"
पर यह सवाल हम खुल कर के तो कभी पूछ ना पाते हैं ।
ओछी सोच वालों की श्रेणी के भय से हम सहसा डर जाते हैं ।
"नेकी कर दरिया में डाल," जैसी कहावतें बनाते हैं ।
कई बार बस मन ही मन अपनी नेकी का शोक मनाते हैं ।
"क्यों की थी हमने वह नेकी ?" यह सोच-सोच पछताते हैं ।
औ फिर इस तुच्छ विचार के कारण ईश्वर से डर जाते हैं ।
"अब न कभी ऐसा सोचेंगे," इसकी कसमें खाते हैं ।
औ अपनी ही उस की नेकी के बोझ तले दब जाते हैं ।
हे ईश्वर ! कैसी माया है तेरी, है यह कितने रंगों वाली !
मानव-मन के भीतर बैठी विचित्र सी सतरंगी जाली !
सरस्वती जोशी
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