Thursday, March 19, 2015

विदुषी गृहलक्ष्मी

विदुषी गृहलक्ष्मी
हूँ तो निर्धन पर तुम्हें संगिनी ! सबसे महँगा प्रेम प्रदान करूँगा ।
तुम मेरी हो जाओ बस मैं,अपना सर्वस्व तुम्हारे नाम करूँगा ।
शादी के अगले ही दिन मैं, "जोएंट" खाता खुला दूँगा ।
खाते की हालत कुछ भी हो मैं, सारी फ़िकर भुला दूँगा ।
कम से कम जाऊँगा दफ्तर, अपना हर पल तुमको दूँगा ।
तुम संग दिन, तुम संग रात, तुम संग सुबहो शाम रहूँगा ।
तुम पूर्ण शिक्षिता, परम विदुषी, गृह-लक्ष्मी हो है यह मुझको ज्ञात ।
कुशल गृहिणी के सब गुण तुममें, अब न कोई चिंता की बात !
हर आये दिन मैं तुमको, नित नये रंग दिखलाऊँगा ।
बहुत प्यार से कर संबोधन, शिष्टाचार निभाऊँगा ।
पति-भक्ति के चक्रव्यूह में, तुम ऐसी मग्न हो जाओगी ।
विस्मित करके रिश्ते सारे, बस पास मेरे ही आओगी ।
करवा-चौथ, तीज गणगौर, आये दिन उपवास रखोगी ।
मेरे मंगल की कर-कर विनती, जाने क्या-क्या आस रखोगी ।
जीवन किधर बीत जाएगा, होगा न इसका तुमको भान ।
हर पल का सदुपयोग किया, कह पाओगी सीना तान ।
गारंटी मेरी के तुम जब, बच्चों को अतीत सुनाओगी ।
गर्व करोगी अपने उपर, तनिक नहीं शरमाओगी ।
मैं नारी स्वतंत्रता का प्रेमी, तुम्हारे हर गुण को मौका दूँगा ।
चिंता ना करना घर-बाहर का, सब भार तुम्हें सौप दूँगा ।
दूँगा मौका हर निर्णय का, मैं ज़रा न ज़िम्मेदारी लूँगा ।
हो मग्न तुममें, घर बैठा, मैं तो बस "आ-राम" करूँगा ।
हूँ तो निर्धन पर तुम्हें संगिनी ! सबसे महँगा प्रेम प्रदान करूँगा ।
- सरस्वती जोशी

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