Saturday, March 7, 2015

कितना दुर्लभ है व्यथा-बाँट मन हल्का करना

 कितना दुर्लभ है व्यथा-बाँट मन हल्का करना 

कितना दुर्लभ है व्यथा-बाँट मन हल्का करना या कराना ।

आज के व्यस्त जीवन में कोई वेदव्यास या वाल्मीकि पाना ।
जब कोई अपनी व्यथा बाँट चाहता है अपना मन हल्का करना ।
या मदद-सलाह की आस में, चाहता कुछ आ कर सुनाना ।
तो अचानक हमारा रुख बदल सा जाता है ।
ऊबने का भाव अचानक उर में उभर कर आता है ।

व्यस्त जीवन है सभी का, सबका अपना भी सुख-दुख होता है ।
आदि आदि के विचार से श्रोता धीरज खो देता है ।
हालाँके एक पुण्य सा करता जो दुख बँटा मन हल्का कर देता ।
पर यह इतना दुर्लभ के जगती में मानव इस हेतु है रहता तरसता ।
वैसे चाहे हम हर कदम पर पर-दुख सुनते और सुनाते हैं ।
रामायण-महाभारत से ग्रंथ ले कर के पढ़ते और पढ़ाते हैं ।

उनकी पर-दुख की कथाएँ सब बार-बार दोहराते हैं ।
जिनको ना जाना ना जानेंगे उनके लिये भावुक से बन जाते हैं ।
उनके सुख में हँसते खुश होते, दुख में अश्रु बहाते हैं ।
पर जो कोई दुखियारे आ कर अपना कष्ट बताते हैं ।
तो पाँच मिनिट में उकता कर हम अपना मुँह बनाते हैं ।
रहीम के : "रहिमन अँसुआ नयन ढरि...." को बेझिझक दोहराते हैं ।

जाने कैसे हम यह बात बिल्कुल विस्मित कर जाते हैं ।
राम-सिया के कष्टों को ही तो पंडित हमें सुनाते हैं ।
वेदव्यास भी पांडवों के सुख-दुख को बढ़ा-चढ़ा बताते हैं ।
तुलसी-मीरा-सूर-कबीरा के दुख हमको छू जाते हैं ।
पर जीवित परिचित मानव को इस हेतु अक्सर तरसाते हैं ।
पर यही जगत की रीत है सोच स्वयं को समझाते हैं ।

औ पर दुख से अनछुए से बन हम चैन से सो जाते हैं ।
नींद नहीं आए तो रामायण आदि की चौपाइयों को गाते हैं !
या फिल्मी हीरो की व्यथा के गानों को गुनगुनाते हैं ।
या फिर किसी और साधन से अपना मन बहलाते हैं ।

- सरस्वती जोशी

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