Sunday, March 15, 2015

ठोकरें

ठोकरें 
माना मानव-जीवन में ठोकरें भी उपयोगी साबित होती हैं। 
प्राणी को भूलों को सुधार कुछ करने को प्रेरित करती हैं ।
फिरभी इनसे मिली व्यथा कुछ ऐसे घाव बना देती है ।
जो शूल बन कर, हृदय बेध, नासूर सी चुभती रहती हैं ।
जिनकी व्यथा को भूलने का अथक प्रयास निरंतर चलता ।
पर चाहें जितना विस्मित करना, दर्द उतना ही है बढ़ता ।
मानव के मन के इक कोने में जा ये सुधियाँ बसेरा कर लेती हैं ।
औ बार बार स्मृतियों में आ-आ उसकी मुस्कानों को हर लेती हैं ।
काश कोई मरहम ऐसा हर प्राणी को मिल जाए ।
के वह हर ठोकर से ले शिक्षा, उसकी सुधियों को बिसरा पाए ।
सरस्वती जोशी

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